क्यों और कैसे हिलती धरती, जानिए मिनटों में

रूस के सुदूर पूर्व कामचटका प्रायद्वीप पर बुधवार सुबह जो धरती कांपी, उससे पूरा प्रशांत महासागर हिल उठा। तो बात विस्तार से पैरों तले की हलचल पर...

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नई दिल्ली: कामचटका प्रायद्वीप (Kamchatka Peninsula) पर बुधवार, 30 जुलाई धरती हिली। रिक्टर स्केल (Richter Scale) पर इसकी तीव्रता 8.8 रही। झटके इतने तेज थे कि पूरा प्रशांत क्षेत्र कांप उठा। कंपन उत्तरी व दक्षिणी महाद्वीप तक ने महसूस किया। सूनामी का खतरा हर तरफ पसरा है। तबाही की तस्वीरें खबर करती हैं कि नुकसान किस कदर हुआ। और यह भी बताती हैं कि भूकंप सबसे जोखिम वाली प्राकृतिक आपदाओं में से एक है। इसकी आंतरिक प्रकृति में ही तबाही का राज छिपा है। मसलन, भूकंप तुरंत व बड़े भूभाग को विध्वंस करता है। इसमें बर्बादी को रोकने का वक्त नहीं मिल पाता। अभी तक इसका पूर्वानुमान लगाने में भी हम कामयाब नहीं हो सके हैं। चूंकि भूकंप का आना धरती की आंतरिक बनावट से तय होता है तो शुरुआत यहीं से…

रहस्यों से भरी रत्नगर्भा
वह धरती, जिस पर हम हैं, रत्नों से ज्यादा रत्नों के रहस्य से भरी है। हीरा, कोयला, सोना, लोहा सरीखे रत्न धरती के गर्भ से मिलते हैं। हम इनसे तो परिचित हैं, लेकिन धरती का हृदय रहस्यमयी है। इसमें एक-दूसरे के प्रबल शत्रु पानी व अग्नि एक साथ रह लेते हैं। 
धरती की इस अज्ञात दुनिया में समय-समय पर वैज्ञानिकों ने झांका है। फिर भी, पूरी तरह दृश्य यह किसी को नहीं हो सकी है। अभी तक की जो प्रामाणिक जानकारी है, उसमें मोटे तौर पर बाहर से धरती का आकार गोल है। इसके केंद्र से सतह तक की दूरी मतलब त्रिज्या करीब 6,370 किमी है। यह लंबाई एक समान नहीं है। प्रकृति के हिसाब से इसे तीन भागों में बांटा गया है।
मजे की बात यह इसे सीधे-सीधे देख पाना मुमकिन नहीं है। अंतरिक्ष की तरह इसमें सेटेलाइट टाइप का कोई उपग्रह नहीं भेजा सकता। इसकी जानकारी हमें चट्टानों व ज्वालामुखी सरीखे प्रत्यक्ष स्रोत और तापमान, घनत्व, दबाव, गुरुत्वाकर्षण बल, चुंबकीय क्षेत्र व भूकंपीय तरंग सरीखै अप्रत्यक्ष स्रोत हैं। इसके अलावा धरती की उत्पत्ति पर आए सिद्धांत भी अंदर की बनावट पर रोशनी डालते हैं।
इन सबके आधार पर सबसे ऊपर, जो हमें दिखता है और जिस पर हमारी सारी गतिविधियां सीमित हैं, उसे भूपर्पटी (Crust) कहते हैं। यह भंगुर है। मतलब इसमें जल्द टूट जाने की प्रवृत्ति है। सारे महाद्वीप, सभी महासागर धरती के इसी हिस्से में स्थित हैं। महासागरों के नीचे इसकी औसत मोटाई 5 किमी है, महाद्वीप पर 30 किमी। पर्वत श्रेणियों के नीचे यह 70 किमी तक मोटी है।

साभार: एनसीईआरटी

पर्पटी के नीचे का हिस्सा प्रावार (Mantle) है। यह मोहो असांतत्य (Moho Discontinuity -MD) या मोहरोविसिक असांतत्य से शुरू होकर 2,900 किमी तक जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि MD क्या है? असल में यह वह काल्पनिक रेखा है, जो पर्पटी को मैंटल से अलग करती है। इसका नाम क्रोएशियन भू-भौतिकविद् एंड्रिया मोहरोविसिक (1857-1936) के नाम पर रखा गया है।
प्रावार का ऊपरी हिस्सा दुर्बलता मंडल (Asthenosphere) है। इसका विस्तार 400 किमी तक है। ज्वालामुखी फटने से जो लावा निकलता है, उसका स्रोत यही है। भूपर्पटी और प्रावार के ऊपरी भाग को मिलाकर स्थलमंडल (Lithosphere) कहते हैं। इसकी मोटाई 10 किमी से 200 किमी के बीच है। प्रावार का विस्तार दुर्बलता मंडल के बाद भी है। इसे निम्न प्रावार कहते हैं।
धरती का अंतिम हिस्सा क्रोड (Core) है। 2,900 किमी के बाद इसका विस्तार होता है। इसके भी दो हिस्से हैं। ऊपरी हिस्सा बाह्य क्राेड, जो तरल है। जबकि ठोस अवस्था वाले पृथ्वी का केंद्र आंतरिक क्रोड। क्रोड निकिल व लोहे जैसे भारी पदार्थों से बना है, इसे निफे भी कहते हैं।

साभार: एनसीईआरटी

महाद्वीपीय विसरण सिद्धांत (Continental Drift Theory)
धरती की संरचना समझने के बाद हम महाद्वीपीय विसरण पर बात करते हैं। जर्मन वैज्ञानिक अल्फ्रेड वेगनर 1912 में यह सिद्धांत लेकर आए। इसके अनुसार, सभी महाद्वीप पहले एक बड़े भूखंड से जुड़े हुए थे। यह बात कोई 22.5 करोड़ साल पहले की है। सारा भूखंड बड़े महासागर से घिरा हुआ था। महाद्वीप को पैंजिया और महासागर को पैंथालसा कहा गया। 20 करोड़ साल पहले पैंजिया बंटा और लॉरेशिया और गोंडवाना लैंड नामक दो बड़े भूखंड बने।
लॉरेशिया में आज का उत्तरी अमेरिका और यूरेशिया शामिल था और गौंडवाना लैंड में भारत, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और अंटार्कटिका। 
अलग होने के बाद यह दोनों महाद्वीप धरती की सतह के सापेक्ष विपरीत दिशाओं में गति करने लगे। गति की वजह से समय के साथ दोनों महाद्वीप अनेक भूखंडों में टूट गए। कुछ परिस्थितियों में इन गतिशील खंडों ने टकराकर एवं सम्मिलित होकर फिर से विशाल भूखंडों का निर्माण किया।
वैगनर के इस सिद्धांत ने पृथ्वी विज्ञान संबंधी अनुसंधान को नई दिशाएं दी। वैगनर का विचार भूकंप व ज्वालामुखी, पर्वतों व घाटियों के निर्माण समेत दूसरी भूगर्भीय क्रियाओं को समझने में मददगार बना। महाद्वीपीय विसरण की संकल्पना आगे चलकर प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत का आधार बनी।

प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत (Plate Tectonics Theory)
कनाडा के जॉन टुजो विल्सन ने 1965 में प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत दिया। हालांकि, सिद्धांत को देने वाले में विल्सन का नाम प्रमुख है, पर इसमें कई अन्य के विचारों को भी जगह मिली है जिनमें हैरी हैस, होम्स आदि भी हैं। यह सिद्धांत भूपर्पटी व प्रावार की ऊपरी सतह यानि स्थल मंडल की गतियों को समझने में सहायक बना। इसने महाद्वीपीय विसरण सिद्धांत की जगह ली। 
विल्सन के मुताबिक, स्थल मंडल विवर्तनिक प्लेट कहलाने वाली छोटी प्लेटों में टूटा है। यह सब एक-दूसरे के अलावा प्रावार के सापेक्ष धीमे-धीमे गतिमान हैं। माना जाता है कि इन प्लेटों के नीचे की पर्त आंशिक रूप से तरल है। इसी से इन प्लेटों को गति मिलती है। स्थल मंडल के नीचे स्थित प्रावार क्षेत्र भी रासायनिक रूप से चट्टानों की तरह है, किंतु ऊष्मा और दाब से इसमें स्थायी परिवर्तन हो गया और यह स्थलमंडल का हिस्सा नहीं रहा।
विल्सन जो स्थल मंडल के टूटकर प्लेट बनने की बात करते हैं, उसमें सात बड़ी और कई छोटी प्लेट बनीं। यही Tectonics Plate हैं। बड़ी प्लेटें पृथ्वी के 94 फीसदी हिस्से को घेरे हैं। बाकी 6 फीसदी छोटी प्लेटों से बना है। इनमें से कुछ प्लेट एक-दूसरे की ओर, कुछ एक-दूसरे से दूर और कुछ एक-दूसरे से सटकर चलती हैं।तुर्किये का ज्यादातर हिस्सा आनातोलियाई प्लेट पर स्थित है। इसके बायीं ओर अरेबियन प्लेट है और दक्षिण व दक्षिण-पश्चिम में अफ्रीकन प्लेट। उत्तर दिशा में यूरेशियन प्लेट है। इस तरह आनातोलियाई प्लेट तीन प्लेटों के बीच में घंसी है।
चूंकि यह सब आपस में टकरा रही हैं, इसलिए चारों प्लेट में तनाव की स्थिति बनी रहती है। इसीलिए यह पूरा क्षेत्र भूकंप के लिहाज से काफी संवेदनशील बन जाता है। यही वजह है कि यहां बड़े-बड़े भूकंप आते हैं। 
हमारा भूभाग एशियन प्लेट पर स्थित है, जो पास की यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। प्लेटों के टकराने से हिमालय का प्रादुर्भाव भी हो रहा है। इस तरह, देखा जाए तो अपने यहां हिमालय में होने वाली हलचल के कारण और दूसरा, अंदरूनी फाल्ट की वजह से भूकंप आते हैं।

सात बड़ी विवर्तनिक प्लेट

  • पैसिफिक प्लेट (सबसे बड़ी)।
  • अफ्रीकन प्लेट।
  • यूरेशियन प्लेट।
  • ऑस्ट्रेलियन प्लेट।
  • नार्थ अमेरिकन प्लेट।
  • अंटार्कटिक प्लेट।
  • साउथ अमेरिकन प्लेट।

दस छोटी विवर्तनिक प्लेट

  • फिलपींस प्लेट।
  • जुआन डे फुका प्लेट।
  • कोकोस प्लेट।
  • कैरेबियन प्लेट।
  • नस्का प्लेट।
  • स्काटिया प्लेट।
  • सोमाली प्लेट।
  • अरेबियन प्लेट।
  • इंडियन प्लेट।
  • आनातोलियाई प्लेट।

प्लेटों की गति
प्लेटों का आकार स्थिर न होकर लगाकर बदल रहा है। इसमें कुछ छोटी हो रही हैं, कुछ बड़ी। प्लेट सीमा में होने वाला यह परिवर्तन पर्वतों, कटक एवं गहरी सागरीय खाड़ियों से तय होता है। प्लेट सीमा तीन प्रकार के होती हैं;

  • अभिसारी या विध्वंसक सीमा।
  • अपसारी या रचनात्मक सीमा।
  • रूपांतरित सीमा।

अभिसारी सीमा
इसमें प्लेटें एक-दूसरे के पास आती हैं। इसे तीन तरह से देखा जा सकता है;

  1. महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण: महासागरीय प्लेटें जब महाद्वीपीय प्लेटों के सामने होती हैं तब अधिक घनत्व वाली महासागरीय प्लेट हल्की महाद्वीपीय प्लेट के नीचे सरककर अवरोहण क्षेत्र का निर्माण करती है।
  2. महासागरीय-महासागरीय अभिसरण: महासागर की नई प्लेट की तुलना में पुरानी प्लेट अधिक घनत्व की और ठंडी होती है। इसलिए जब दो महासागरीय प्लेटें समीप आती हैं तब पुरानी प्लेट नई प्लेट के नीचे चली जाती है या डूब जाती है। प्लेटों की इस उथल-पुथल से खाड़ियों का निर्माण होता है। मसलन, जब तेजी से घूमने वाली प्रशांत प्लेट धीमी गति वाली फिलीपंस प्लेट के नीचे गई, तो मैरियाना खाई  (मैरियाना ट्रैंच) बनी। सभी महासागरों में सबसे गहरी चैलेंजर डीप के दक्षिणी सिरे पर स्थित मैरियाना खाई की गहराई (11,000 मीटर) विश्व के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई (समुद्र तल से 8854 मीटर) से भी अधिक है।
  3. महाद्वीपीय-महाद्वीपीय अभिसरण: जब दो महाद्वीपीय प्लेटें मिलती हैं तब महाद्वीपीय चट्टानों की हल्की प्रवृत्ति और अधोमुखी गति का प्रतिरोध करने के कारण इनमें से कोई भी एक-दूसरे के नीचे नहीं खपती। इसके बदले भूपटल बगल में या ऊपर उठ जाती है। पांच करोड़ साल पहले यूरोपियन प्लेट, इंडियन प्लेट के ऊपर उठ गई थी। नतीजतन हिमालय पर्वत और तिब्बती पठार अपने वर्तमान स्वरूप में आए। यह सब बीते एक करोड़ वर्षों के दौरान हुआ, जो अभी भी जारी है।

अपसारी सीमा
जब प्लेट एक-दूसरे से दूर जाती हैं, तब अपसारी सीमा का निर्माण होता है। इस प्रकार अपसारी सीमा धीमे से फैलती हुई विभ्रंश (रिफ्ट) घाटी बनाती है। जब दो संलग्न प्लेटें एक दूसरे से दूर जाती हैं तब प्रावार ऊपर की ओर उठ कर आंशिक पिघल कर बेसाल्टिक लावा बनाता है। अपसारी सीमा का एक उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक या मेढ़ (मिड अटलांटिक रिज) है।

रूपांतरित सीमा
महाद्वीपों और महासागरों को ढोने या वहन करने वाली विवर्तनिक प्लेटें हमेशा धीमी गति से चलती रहती हैं। प्लेटों की गति समुद्रों, पर्वतों और ज्वालामुखियों का निर्माण करती है। सामान्यतया प्लेट सीमा समुद्रों या महाद्वीपों से संलग्न क्षेत्रों में पाई जाती है। कुछ प्लेटें धरती पर पाई जाती हैं जो प्रायः पर्वतों या ज्वालामुखीय द्वीप के चाप से चिन्हित होती है।
सेन आंद्रेज भ्रंश, जो पश्चिमी और उत्तरी कैलिफोर्निया (अमेरिका) से करीब 1,300 किलोमीटर की लंबाई में फैला है, वह पैसिफिक प्लेट और नार्थ अमेरिकी प्लेट के मध्य रूपांतरित प्लेट है। इसके पश्चिम व पैसिफिक प्लेट में स्थित सभी भूखंड धीरे-धीरे उत्तर-पूर्व में गति करते हैं। पूर्व में गति करने वाले सभी पिंड प्लेट विवर्तनिकी के प्रभाव से दक्षिण-पूर्व में गति करते हैं। कैलिफोर्निया के पार इनकी फिसलने या सरकने की दर लगभग 33 से 37 मिमी प्रति वर्ष है। वार्षिक मापन या किसी व्यक्ति के जीवन काल के सामने यह विस्थापन महत्वपूर्ण नहीं है। लाखों वर्षों के बाद होने वाले विशाल विस्थापन की कल्पना से ही कुछ चित्र स्पष्ट हो पाएगा।

नई खोज
वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के नीचे आंशिक रूप से पिघली चट्टान की नई परत की खोज की है। यह खोज इस बहस पर विराम लगा सकती है कि टेक्टोनिक प्लेट कैसे गति करती है। शोधकर्ताओं ने पहले समान गहराई पर पिघले हुए धब्बों की पहचान की थी, लेकिन ऑस्टिन में टेक्सास विश्वविद्यालय के नए अध्ययन ने पहली बार परत की प्लेट टेक्टोनिक्स में इसके हिस्से का खुलासा किया। निष्कर्ष नेचर जियोसाइंस पत्रिका में प्रकाशित हुए थे। पिघली हुई परत सतह से लगभग 100 मील नीचे है और एस्थेनोस्फीयर का हिस्सा है।

आइए, मूल बात भूकंप पर
इस बार बात करने से पहले एक प्रयोग करते हैं। इससे चीजें ज्यादा स्पष्ट होंगी। इसमें एक रंगीन कागज की छोटी-सी गोली लें और इसे पानी के आधे भरी गिलास में रख दें। अब धीमी आंच पर पानी गरम करें। इस प्रक्रिया में आप देखेंगे कि पानी की गर्म परतों के साथ कागज की गोली ऊपर उठती हैं, ठंडे पानी की परतों में नीचे बैठती है। 
धरती के अंदर का पिघला हुआ मैग्मा भी इसी तरह का व्यवहार करता है। इसी से धरती की सतह में बदलाव होता है। असल में सभी प्लेटें प्रावार पर टिकी हैं। पिघला प्रावार गतिमान भी है। इस पर तैरती प्लेटों को भी गति मिलती है। इससे प्लेटों में टक्कर या खिंचाव आता है। धरती के अंदर होने वाली इस हलचल से ऊर्जा पैदा होती है। इस ऊर्जा से निकलने वाली तरंगे सभी दिशाओं में फैलकर भूकंप लाती हैं।

तीव्रता में तनिक भर बदलाव से ऊर्जा बनती मारक
शोध के आंकड़े बताते हैं कि 5 तीव्रता वाले भूकंप से 200 टन टीएनटी ऊर्जा निकलती है। जब भूकंप की तीव्रता बढ़कर छह होती है, तो ऊर्जा भी बढ़कर 6,270 टन टीएनटी हो जाती है। इसी तरह, 7 तीव्रता पर 1.99 लाख टन टीएनटी ऊर्जा निकलती है और 8 मैग्निट्यूड पर 62.7 लाख टन टीनएटी ऊर्जा। इसका अर्थ यह भी है कि मैग्निट्यूड यानी तीव्रता में एक इकाई में बदलाव होने पर ऊर्जा 30 गुना बढ़ जाती है। 

उद्गम केंद्र व अधिकेंद्र
वह स्थान जहां से ऊर्जा निकलती है, भूकंप का उद्गम केंद्र (Focus) कहलाता है। इसे अवकेंद्र  (Hypocentre) भी कहा जाता है।
यहां से ऊर्जा तरंगें अलग-अलग दिशाओं में चलती हुई पृथ्वी की सतह तक पहुंचती हैं। धरती की सतह का वह स्थान, जो उद्गम केंद्र के सबसे नजदीक है, अधिकेंद्र  (Epicentre) कहलाता है। अधिकेंद्र पर ही सबसे पहले धटका महसूस होता है। अधिकेंद्र उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर (90 के कोण पर) होता है।

भूकंपीय तरंगें (Earthquake waves)
हर भूकंप स्थलमंडल (Lithosphere) में ही आते हैं।भूकंपमापी यंत्र (Seismograph) सतह पर पहुंचने वाली भूकंपीय तरंगों को दर्ज करता है। यह तरंगे दो तरह की हैं; भूगर्भीय तरंगें (Body waves) व धरातलीय तरंगें (Surface waves)। भूगर्भीय तरंगें उद्गम केंद्र से ऊर्जा के मुक्त होने के दौरान पैदा होती है और पृथ्वी के अंदरूनी भाग से होकर सभी दिशाओं में आगे बढ़ती हैं। इन तरंगों के धरातलीय शैलों से टकराने पर नई तरंगें पैदा होती हैं, जिन्हें धरातलीय तरंगें कहा जाता है। यह तरंगें धरातल के साथ चलती हैं। 
तरंगों का वेग अलग-अलग घनत्व वाले पदार्थों से गुजरने पर बदल जाता है। अधिक घनत्व वाले पदार्थों में तरंगों का वेग अधिक होता है। पदार्थों के घनत्व में भिन्नताएं होने से परावर्तन (Reflection) एवं आवर्तन (Refraction) होता है। इससे इन तरंगों की दिशा भी बदलती है।
भूगर्भीय तरंगें भी दो प्रकार की होती हैं। इन्हें पी तरंगें व एस तरंगें कहा जाता है। पहली वाली तेजी से चलने वाली तरंग है और धरातल पर सबसे पहले यही पहुंचती हैं। इन्हें प्राथमिक तरंगे भी कहते हैं। पी तरंगे ध्वनि तरंग ही होती हैं। यह गैस, तरल व ठोस से गुजर सकती हैं। एस तरंगें धरातल पर कुछ समय अंतराल के बाद पहुंचती हैं। यह द्वितीयक तरंगें कहलाती हैं। इनके बारे में खास बात यह है कि यह केवल ठोस माध्यम में ही चलती हैं।
इस गुण ने वैज्ञानिकों को भूगर्भीय संरचना समझने में मदद की। परावर्तन से तरंगें प्रतिध्वनित होकर वापस लौट आती हैं, जबकि आवर्तन से तरंगें कई दिशाओं में चलती हैं। भूकंपलेखी पर बने आरेख से तरंगों की दिशा-भिन्नता का अनुमान लगाया जाता है। धरातलीय तरंगें भूकंपलेखी पर अंत में अभिलेखित होती हैं। ये तरंगें ज्यादा विनाशकारी होती हैं। इनसे शैल विस्थापित होती हैं और इमारतें गिर जाती हैं।

भूकंपीय तरंगों का फैलाव
जैसे ही भूकंपीय तरंगे फैलती हैं, शैलों में कंपन पैदा होता है। पी तरंगों से कंपन की दिशा तरंगों की दिशा के साथ-साथ होती है। यह गति की दिशा में ही पदार्थ पर दबाव डालती है। दबाव से पदार्थ के घनत्व में फर्क आता है और शैलों में संकुचन व फैलाव हो जाता है। 
दूसरी तरंगें संचरण गति के समकोण दिशा में कंपन पैदा करती हैं। एस तरंगें ऊर्ध्वाधर तल में, तरंगों की दिशा के समकोण पर कंपन पैदा करती हैं। यह जिस पदार्थ से गुजरती हैं उसमें उभार व गर्त बनाती हैं। धरातलीय तरंगें सबसे अधिक विनाशकारी समझी जाती हैं।

छाया क्षेत्र का उद्भव
भूकंप लेखी यंत्र पर दूर से आने वाली भूकंपीय तरंगें दर्ज होती हैं। धरती पर कुछ ऐसी जगहें भी हैं, जहां कोई भी भूकंपीय तरंग दर्ज नहीं हुई हैं। ऐसे इलाकों को भूकंपीय छाया क्षेत्र (Shadow zone) कहते हैं। भूकंपीय घटनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि एक भूकंप का छाया क्षेत्र दूसरे भूकंप के छाया क्षेत्र से सर्वथा भिन्न होता है।

प्रकृति के हिसाब से कई तरह के भूकंप

  • अमूमन विवर्तनिक (Tectonic) भूकंप ही आते हैं। यह भूकंप भ्रंश तल के किनारे चट्टानों के सरकने से पैदा होते हैं।
  • ज्वालामुखी फटने से जो झटका लगता है, उसको भी एक विशिष्ट वर्ग का विवर्तनिक भूकंप समझा जाता है। यह भूकंप ज्यादातर सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्रों तक ही सीमित रहते हैं।
  • खनन क्षेत्रों में कभी-कभी भूमिगत खानों की छत ढह जाती है। इससे हल्के झटके महसूस किए जाते हैं। इन्हें नियात (Collapse) भूकंप कहा जाता है।
  • कभी-कभी परमाणु व रासायनिक विस्फोट से भी भूमि में कंपन होती है। इस तरह के झटकों को विस्फोट (Explosion) भूकंप कहते हैं।
  • जो भूकंप बड़े बांध वाले क्षेत्रों में आते हैं, उन्हें बांध जनित भूकंप कहा जाता है।

भूकंप की माप
भूकंपीय तीव्रता का मापन रिक्टर स्केल  (Richter scale) पर होता है। यह भूकंप के दौरान मुक्त हुई ऊर्जा से संबंधित है। इस मापनी पर भूकंप की तीव्रता शून्य से 10 तक दर्ज होती है। वहीं, आघात की तीव्रता गहनता (Intensity scale) को इटली के भूकंप वैज्ञानिक मरकेली (Mercalli) के नाम पर जाना जाता है। यह झटकों से हुई प्रत्यक्ष हानि से तय होती है। इसकी माप 1 से 12 तक है।

भूकंप का असर

  • जमीन का हिलना।
  • धरातलीय विसंगति।
  • भूस्खलन व पंकस्खलन (Mudslide)।
  • मृदा द्रवण (Soil liquefaction)।
  • धरातल का एक तरफ झुकना।
  • हिमस्खलन।
  • धरातलीय विस्थापन।
  • बांध व तटबंध के टूटने से बाढ़।
  • आग लगना।
  • इमारतों का टूटना तथा ढांचों का ध्वस्त होना।
  • वस्तुओं का गिरना।
  • सुनामी।

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