Global Warming से उबरते हुए पृथ्वी फिसल सकती है हिमयुग में!

Global Warming: वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि पृथ्वी का तापमान मुख्य रूप से चट्टानों के प्राकृतिक अपक्षय से संतुलित रहता है। बारिश वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) सोखती है और इसे सतह पर मौजूद चट्टानों, खासकर सिलिकेट वाली जैसे ग्रेनाइट, तक पहुंचाती है।

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नई दिल्ली: कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड (यूसीआर) के वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के कार्बन सर्कुलेशन सिस्टम में एक गंभीर कमी की पहचान की है। उनके अनुसार, यह कमी बताती है कि कैसे ग्रह के तापमान में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव हो सकते हैं और मौजूदा ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के दौर के बाद दुनिया अचानक ठंडी होकर हिमयुग की ओर बढ़ सकती है। यह अध्ययन साइंस जर्नल में छपा है और इसमें पृथ्वी के जलवायु नियंत्रण तंत्र की अस्थिरता पर जोर दिया गया है।

पुरानी समझ क्या थी?

वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि पृथ्वी का तापमान मुख्य रूप से चट्टानों के प्राकृतिक अपक्षय से संतुलित रहता है। बारिश वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) सोखती है और इसे सतह पर मौजूद चट्टानों, खासकर सिलिकेट वाली जैसे ग्रेनाइट, तक पहुंचाती है। समय के साथ ये चट्टानें टूटती हैं, और कार्बन के साथ कैल्शियम समुद्र में बह जाता है। वहां ये सीप, मूंगा और चूना पत्थर की संरचनाएं बनाते हैं, जो कार्बन को लंबे समय के लिए जमा कर लेती हैं। जैसे-जैसे ग्रह गर्म होता है, अपक्षय की रफ्तार बढ़ती है, ज्यादा CO2 हटता है, और तापमान नीचे आता है। शोधकर्ता एंडी रिडगवेल कहते हैं, “गर्मी बढ़ने पर चट्टानें तेजी से CO2 सोखती हैं और ग्रह को ठंडा करती हैं।”

लेकिन सिस्टम में कहां है खामी?

हालांकि, प्राचीन भूगर्भीय रिकॉर्ड बताते हैं कि पृथ्वी के शुरुआती हिमयुग इतने भयानक थे कि पूरा ग्रह बर्फ की परत से ढक गया था। सिर्फ चट्टानों का अपक्षय ही इसकी पूरी व्याख्या नहीं कर पाता। वैज्ञानिकों का कहना है कि महासागरों में कार्बन का जमा होना भी इस खेल में बड़ा रोल निभाता है।

नई रिसर्च क्या बता रही है?

यूसीआर टीम ने पाया कि CO2 बढ़ने और गर्मी फैलने पर पोषक तत्व जैसे फॉस्फोरस ज्यादा मात्रा में समुद्रों में पहुंचते हैं। ये तत्व प्लैंकटन के विकास को बढ़ावा देते हैं, जो सूरज की रोशनी से CO2 ग्रहण करते हैं। प्लैंकटन की मौत के बाद उनका अवशेष कार्बन सहित समुद्र तल पर बैठ जाता है, जो कार्बन को स्थायी रूप से लॉक कर देता है। लेकिन गर्म समुद्रों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे फॉस्फोरस तल में दबने की बजाय दोबारा पानी में घुल जाता है। इससे एक चेन रिएक्शन शुरू होता है: ज्यादा पोषक तत्व, ज्यादा प्लैंकटन, ज्यादा कार्बन जमा, और ज्यादा ठंडक। यह लूप पृथ्वी को संतुलन की बजाय अत्यधिक शीतलता की तरफ धकेल सकता है।

थर्मोस्टेट में गड़बड़ी की तरह?

शोधकर्ता इसे घर के एयर कंडीशनर से जोड़कर समझाते हैं। मान लीजिए आप कमरे को 25 डिग्री पर रखना चाहते हैं, लेकिन बाहर की गर्मी बढ़ने पर AC जरूरत से ज्यादा ठंडा कर देता है। रिडगवेल कहते हैं, पृथ्वी का थर्मोस्टेट कभी-कभी ओवरकूलिंग कर देता है।” प्राचीन काल में वायुमंडलीय ऑक्सीजन कम होने से यह सिस्टम और ज्यादा अनियंत्रित था, जिससे भयंकर हिमयुग आए। आज ऑक्सीजन ज्यादा है, इसलिए लूप कमजोर है, लेकिन फिर भी यह अगले हिमयुग को थोड़ा पहले ला सकता है।

क्या ग्लोबल वार्मिंग के बाद आएगा हिमयुग?

हां, वैज्ञानिकों का मॉडल कहता है कि प्राकृतिक सिस्टम अंततः ठंडक लाएगा, लेकिन यह इतना धीमा होगा कि मौजूदा जलवायु से निपटने में मदद नहीं करेगा। रिडगवेल की राय है, अगला हिमयुग 50 हजार साल बाद हो या 2 लाख साल बाद, हमें अभी वार्मिंग रोकने पर फोकस करना चाहिए। प्राकृतिक कूलिंग हमारी जिंदगी में नहीं आएगी। अध्ययन में डोमिनिक हुल्से जैसे शोधकर्ता भी शामिल हैं, जो इस अस्थिरता पर जोर देते हैं।

आज के लिए क्या सबक?

यह रिसर्च हमें याद दिलाती है कि पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था जटिल है। ग्लोबल वार्मिंग से लड़ने के लिए हमें कार्बन उत्सर्जन कम करना, हरित ऊर्जा अपनाना और पर्यावरण संरक्षण पर जोर देना होगा। प्राकृतिक प्रक्रियाएं भरोसेमंद नहीं हैं, क्योंकि वे बेहद सुस्त हैं। अगर हम अभी नहीं चेते, तो भविष्य की पीढ़ियां और ज्यादा मुश्किलों में पड़ सकती हैं। वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि हमें अपनी गतिविधियों को बदलना होगा, वरना गर्मी का यह दौर लंबा खिंच सकता है।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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