जल संकट: नीतियां बदलनी होंगी, तभी बचेगा भारत का कल

भारत का जल संकट केवल मानसून की कमी नहीं, बल्कि एक गहरा संरचनात्मक असंतुलन है। हमारी कृषि नीतियां, ऊर्जा के नए विकल्प (एथेनॉल) और डिजिटल विकास (AI) अनजाने में हमारे मीठे जल संसाधनों को तेजी से खत्म कर रहे हैं। भविष्य की समृद्धि अब केवल तेल नहीं, बल्कि पानी की उपलब्धता से मापी जाएगी।

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नई दिल्ली: गर्मियों की तपिश के साथ ही देश के कई इलाकों में सड़कों पर खाली मटकों के साथ प्रदर्शन करती भीड़ अब एक भयावह वार्षिक दृश्य बन चुकी है। हम चर्चा करते हैं—सूखती नदियां, खाली जलाशय और गिरते भूजल स्तर की। लेकिन, क्या हम उस पानी की चर्चा करते हैं जो हमें दिखाई नहीं देता?

हर वस्तु, जिसे हम इस्तेमाल करते हैं—भोजन से लेकर कपड़ों और बिजली तक—उसमें पानी की एक विशाल ‘अदृश्य मात्रा’ छिपी होती है। इसे ही ‘वर्चुअल वॉटर’ (आभासी जल) या ‘वॉटर फुटप्रिंट’ (जल पदचिह्न) कहा जाता है। भारत में जल संकट महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक ‘संरचनात्मक संकट’ है जो कृषि, उद्योग और शहरीकरण की गलत नीतियों से जन्मा है।

क्या भारत वाकई पानी की कमी वाला देश है?

यह एक आम धारणा है कि भारत में पानी की भारी कमी है, लेकिन वैज्ञानिक और हाइड्रोलॉजिकल (जल-विज्ञान) आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। भारत का संकट ‘जल की अनुपलब्धता’ (Scarcity of Water) का नहीं, बल्कि ‘जल के कुप्रबंधन’ (Mismanagement of Water) का है।

1. आंकड़ों का विरोधाभास: उपलब्धता बनाम प्रबंधन

भारत में वार्षिक वर्षा लगभग 4,000 अरब घन मीटर (BCM) होती है। इसमें से उपयोग योग्य जल संसाधन (Utilizable Water Resources) लगभग 1,123 BCM हैं। विडंबना यह है कि हम इस उपलब्ध जल का एक बड़ा हिस्सा या तो समुद्र में बह जाने देते हैं या फिर प्रदूषण के कारण इसे अनुपयोगी बना देते हैं। समस्या पानी की कमी नहीं, बल्कि पानी को सहेजने और उसका न्यायसंगत उपयोग करने की क्षमता की है।

2. असंतुलित वितरण: समय और भूगोल का तालमेल नहीं

भारत का जल वितरण समय और स्थान के आधार पर अत्यधिक असमान है:

  • भौगोलिक विषमता: जहां पूर्वोत्तर भारत और हिमालयी क्षेत्र जल की अधिकता से जूझते हैं, वहीं राजस्थान और पश्चिमी भारत सूखे की मार झेलते हैं। मानसून के दौरान भी, कुछ क्षेत्रों में भारी बाढ़ आती है, जबकि कुछ क्षेत्र पानी की एक बूंद के लिए तरसते हैं।
  • मौसमी निर्भरता: भारत का लगभग 80% जल केवल 3-4 महीनों के मानसून काल में प्राप्त होता है। बाकी के 8-9 महीनों के लिए हमारे पास भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।

3. सीमित भंडारण क्षमता: प्राचीन ज्ञान से आधुनिक दूरी तक

ऐतिहासिक रूप से, भारत की सभ्यताएं जल भंडारण में अग्रणी थीं। चोल और विजयनगर साम्राज्यों से लेकर दिल्ली सल्तनत तक, बावड़ियों, अहार-पाइन (बिहार) और जोहड़ों का जाल बिछाया गया था।

  • आधुनिक भूल: हमने बड़े बांधों और कंक्रीट के ढांचे पर इतना अधिक भरोसा कर लिया कि हमने पारंपरिक तालाबों और जल निकायों के रखरखाव को उपेक्षित कर दिया। आज ये तालाब अतिक्रमण और कचरे की भेंट चढ़ चुके हैं, जिससे वर्षा जल को जमीन में उतरने (Recharge) का मौका ही नहीं मिलता।

4. भूजल का अत्यधिक दोहन: ‘अदृश्य बैंक’ का खाली होना

भूजल भारत की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है, लेकिन हम इसका उपयोग ‘बचत’ की तरह करने के बजाय ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ को तोड़ने की तरह कर रहे हैं।

  • खतरनाक स्थिति: ‘सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड’ (CGWB) के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में भूजल निकालने की दर 100% से अधिक है। इसका मतलब है कि हम जितना पानी बारिश से जमीन में जा रहा है, उससे कहीं अधिक पंप करके निकाल रहे हैं।
  • आर्थिक भूल: मुफ्त बिजली की राजनीति ने किसानों को ट्यूबवेल चलाने के लिए प्रेरित किया, जिससे बिना सोचे-समझे ‘वाटर-गज़लिंग’ (पानी सोखने वाली) फसलों जैसे धान और गन्ने की खेती उन क्षेत्रों में भी की गई जहाँ जल का स्तर बहुत नीचे है।

 विकास की ‘अदृश्य’ लागत: एथेनॉल और AI

दुनिया भर की सरकारें और टेक कंपनियां जिस विकास को ‘हरित’ (Green) और ‘स्मार्ट’ (Smart) बता रही हैं, उसके पीछे मीठे पानी की एक भारी कीमत चुकाई जा रही है। एथेनॉल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इसके दो सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं।

1. एथेनॉल ब्लेंडिंग: हरित ऊर्जाका नीला‘ (जल) संकट

पेट्रोल आयात का खर्च बचाने और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए भारत सरकार ने ‘E20 लक्ष्य’ (पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाना) तय किया है। ऊपरी तौर पर यह एक शानदार कदम लगता है, लेकिन इसका जल-अर्थशास्त्र (Water Economics) चिंताजनक है:

  • फसलों पर निर्भरता: भारत में एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने के रस/शीरे (Molasses) और चावल से बनाया जाता है। ये दोनों ही फसलें ‘वाटर-गज़लिंग’ (Water-guzzling) यानी अत्यधिक पानी सोखने वाली श्रेणी में आती हैं।
  • चौंकाने वाले आंकड़े: 1 लीटर एथेनॉल के उत्पादन में 1,500 से 3,000 लीटर तक पानी खर्च होता है। इसका सीधा मतलब है कि जब हम अपनी गाड़ी में एथेनॉल मिला हुआ पेट्रोल डालते हैं, तो हम अनजाने में हजारों लीटर भूजल को ईंधन के रूप में जला रहे होते हैं।
  • खाद्य सुरक्षा बनाम ऊर्जा सुरक्षा: यदि भूजल का उपयोग एथेनॉल बनाने वाली फसलों के लिए किया जाता रहा, तो भविष्य में पीने के पानी और गेहूं-दाल जैसी आवश्यक खाद्य फसलों के लिए पानी कम पड़ जाएगा। यह एक तरह से “पीने का पानी छीनकर गाड़ियों को पिलाने” जैसी स्थिति है।

2. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): डिजिटल दुनिया की भौतिकप्यास

हमें लगता है कि AI और इंटरनेट ‘क्लाउड’ (बादलों) में मौजूद हैं, लेकिन उनकी जड़ें जमीन पर स्थित विशालकाय ‘डेटा सेंटरों’ में होती हैं। ये डेटा सेंटर 24 घंटे काम करते हैं और भयानक गर्मी पैदा करते हैं।

  • कूलिंग का खेल: इन सर्वरों को पिघलने से बचाने और ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी का इस्तेमाल ‘कूलिंग टावरों’ में किया जाता है। यहाँ पानी प्रति kWh (किलोवाट-घंटा) बिजली खपत पर 0.2 से 1.8 लीटर तक वाष्पीकृत (Evaporate) हो जाता है।
  • AI की ‘ट्रेनिंग’ प्यास: किसी बड़े AI मॉडल (जैसे ChatGPT बनाने वाले जनरेटिव मॉडल) को प्रशिक्षित करने में 5 से 10 लाख लीटर शुद्ध मीठे पानी की खपत हो सकती है।
  • उपयोगकर्ता की खपत: एक अनुमान के अनुसार, जब आप AI चैटबॉट से लगभग 20 से 50 सवाल पूछते हैं, तो डेटा सेंटर में उसे प्रोसेस करने के लिए लगभग 500 मिलीलीटर (आधा लीटर) पानी खर्च हो जाता है। डिजिटल दुनिया जितनी स्मार्ट हो रही है, वह प्राकृतिक संसाधनों की उतनी ही बड़ी ‘प्यासी’ बनती जा रही है।

इतिहास और तुलनात्मक विश्लेषण: कहाँ चूके हम?

भारत का जल प्रबंधन का इतिहास न केवल गौरवशाली है, बल्कि यह वर्तमान संकट का समाधान भी पेश करता है। हमारे पूर्वज यह समझते थे कि पानी एक सीमित संसाधन है, जिसे केवल ‘उपयोग’ नहीं, बल्कि ‘पूजा’ जाना चाहिए।

1. विरासत का वैभव: तकनीक और आस्था का संगम

हड़प्पा सभ्यता से लेकर मध्यकालीन भारत तक, हमने जल संचयन में महारत हासिल की थी:

  • हड़प्पा और ढोलावीरा: लगभग 4,500 साल पहले ढोलावीरा के निवासियों ने रेगिस्तानी इलाके में विशाल कृत्रिम तालाबों और जल-भंडारण प्रणालियों का निर्माण किया था, जो मानसून के पानी को संजोने के लिए इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना थे।
  • चोल और विजयनगर: दक्षिण भारत के चोल राजाओं ने सिंचाई के लिए तालाबों का ऐसा नेटवर्क बनाया था जो आज भी कई जगहों पर जल स्तर को बनाए रखने में मदद करता है। उन्होंने पानी को ‘जन-संपत्ति’ के रूप में देखा।
  • अहार-पाइन और बावड़ियाँ: बिहार और उत्तर भारत में ‘अहार-पाइन’ (वर्षा जल को खेतों तक ले जाने की प्रणाली) और पश्चिमी भारत की ‘बावड़ियाँ’ (Stepwells) केवल वास्तुकला नहीं, बल्कि सामुदायिक जल-भंडार थे। ये बावलियाँ न केवल भूजल को रिचार्ज करती थीं, बल्कि गर्मियों में पानी का मुख्य स्रोत भी थीं।

2. परंपरा बनाम आधुनिकता: सामुदायिक नियंत्रण का अंत

इतिहास का सबसे दुखद मोड़ तब आया जब हमने ‘समुदाय-आधारित’ प्रबंधन को छोड़कर ‘केंद्रीकृत’ मॉडल अपना लिया:

  • औपनिवेशिक विरासत: ब्रिटिश शासन के दौरान, पारंपरिक सामुदायिक प्रणालियों को नजरअंदाज करके बड़े बांधों और नहरों पर ध्यान केंद्रित किया गया। इससे स्थानीय ज्ञान और तालाबों के रखरखाव की जिम्मेदारी खत्म हो गई।
  • तकनीकी निर्भरता: हमने स्थानीय पारिस्थितिकी को समझने के बजाय बड़े कंक्रीट के ढांचे (Big Dams) पर भरोसा किया। इन बड़े बांधों ने पानी तो दिया, लेकिन तालाबों और छोटी नदियों के प्राकृतिक बहाव और रिचार्ज तंत्र को नष्ट कर दिया।

3. फसल का चयन: संसाधनों का आत्मघातीआवंटन

वर्तमान समय में हमारी सबसे बड़ी चूक ‘फसल चयन’ (Crop Selection) में है। हम अपनी पारिस्थितिकी के विपरीत जाकर खेती कर रहे हैं:

  • मराठवाड़ा का उदाहरण: महाराष्ट्र का मराठवाड़ा क्षेत्र पानी की भारी किल्लत से जूझता है। यहाँ गन्ने की खेती करना, जो कि एक बेहद पानी सोखने वाली फसल है, संसाधन प्रबंधन के नजरिए से आत्मघाती है। गन्ना लगभग 14 महीने के चक्र में प्रति हेक्टेयर 22.5 लाख लीटर पानी पी जाता है।
  • तुलनात्मक तुलना: यदि उसी क्षेत्र में हम चने जैसी कम पानी वाली फसल (जो महज 4 लाख लीटर पानी में तैयार हो जाती है) को बढ़ावा दें, तो हम न केवल पानी बचाएंगे बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी सुरक्षित रखेंगे। यह संसाधनों के गलत आवंटन का सबसे बड़ा उदाहरण है।

नीतिगत बदलाव: समाधान की राह

यदि हम 21वीं सदी के ‘जल-संकट’ को ‘जल-समृद्धि’ में बदलना चाहते हैं, तो हमें अपने नीतिगत ढांचे को ‘आपूर्ति-आधारित’ (Supply-based) से हटाकर ‘मांग-आधारित और संरक्षण-केंद्रित’ (Demand-based and Conservation-focused) बनाना होगा। इसके लिए निम्नलिखित कदम अनिवार्य हैं:

1. जल पदचिह्न ऑडिट (Water Footprint Audit)

वर्तमान में उद्योगों और नई विकास परियोजनाओं को मंजूरी देते समय हम अक्सर पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करते हैं, लेकिन ‘जल पदचिह्न’ उसमें उपेक्षित रहता है।

  • अनिवार्यता: हर नई औद्योगिक इकाई या बड़ी विकास परियोजना को यह प्रमाणित करना होगा कि वह अपने उत्पादन के दौरान कितना पानी खपत करेगी और उसे पुनः चक्रित (Recycle) कैसे करेगी। इसके लिए एक ‘जल-संवैधानिक ऑडिट’ अनिवार्य होना चाहिए।

2. फसल विविधीकरण (Crop Diversification)

हमारी कृषि नीति लंबे समय से चावल, गेहूं और गन्ने के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है, जो अत्यधिक पानी मांगती हैं।

  • नीतिगत प्रोत्साहन: सरकार को MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) के ढांचे में बदलाव करना होगा। बाजरा, ज्वार, रागी और दलहन जैसी कम पानी वाली ‘स्मार्ट फसलों’ को अधिक समर्थन मूल्य देकर किसानों को फसल चक्र बदलने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। यह न केवल पानी बचाएगा, बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधारेगा।

3. सूक्ष्म सिंचाई (Micro-Irrigation) का अनिवार्य विस्तार

सिंचाई के पुराने तरीकों (बाढ़ आधारित सिंचाई) में पानी की भारी बर्बादी होती है।

  • नीति: ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर सिस्टम को केवल एक सब्सिडी वाला विकल्प न रखकर, विशेष रूप से जल-तनाव वाले (Water-stressed) क्षेत्रों में ‘अनिवार्य नीति’ बनाना होगा। साथ ही, कृषि में ‘सौर पंप’ के साथ ‘ड्रिप सिंचाई’ को जोड़ना एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

4. जल बजटिंग (Water Budgeting)

जिस तरह देश का एक केंद्रीय बजट होता है, उसी तरह हर राज्य, जिले और पंचायत का एक ‘जल बजट’ होना चाहिए।

  • स्थानीय नियोजन: जल बजटिंग का अर्थ है—किसी क्षेत्र में उपलब्ध कुल वर्षा जल और भूजल का आकलन करना और फिर उसी के अनुसार यह तय करना कि उस क्षेत्र में कौन सी फसल उगाई जाएगी और कितना उद्योग लगाया जा सकता है। जिस क्षेत्र में पानी कम है, वहां पानी सोखने वाली औद्योगिक गतिविधियों पर स्वतः ही नियंत्रण लग जाएगा।

निष्कर्ष: 21वीं सदी की चुनौती

जल संकट गर्मियों की कोई मौसमी खबर नहीं, बल्कि 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण विकासात्मक चुनौती है। भविष्य की दुनिया में किसी देश की समृद्धि उसके ‘ऊर्जा भंडारों’ से नहीं, बल्कि उसके ‘जल भंडारों’ से आंकी जाएगी। समय आ गया है कि हम विकास की परिभाषा में ‘पानी’ को एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में जोड़ें।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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