नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन की वजह से पृथ्वी के बर्फीले इलाके तेजी से बदल रहे हैं। एक ताजा वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि दुनिया भर के ज्यादातर ग्लेशियर (Glacier) हर साल इतनी तेजी से पतले हो रहे हैं कि उनकी मोटाई में कमी एक क्रेडिट कार्ड जितनी हो जाती है। यह रिसर्च कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ विक्टोरिया (UVic) के वैज्ञानिकों ने की है, जिसमें मशीन लर्निंग की मदद से ग्लेशियर्स के नीचे हो रहे कटाव का गहराई से विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन से न सिर्फ वर्तमान स्थिति का पता चलता है, बल्कि भविष्य में इन बर्फीली संरचनाओं के प्रभाव पर भी रोशनी पड़ती है।
ग्लेशियर्स का कटाव: कितना तेज और कहां हो रहा है?
वैज्ञानिकों ने पाया कि धरती पर मौजूद लगभग 1.8 लाख से ज्यादा ग्लेशियर्स में से 99 प्रतिशत हर साल 0.02 से लेकर 2.68 मिलीमीटर तक पतले हो रहे हैं। यह दर इतनी है कि अगर आप इसे देखें, तो यह एक सामान्य क्रेडिट कार्ड की मोटाई के बराबर है। सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके वे हैं जहां बड़ी-बड़ी बर्फ की चादरें मौजूद हैं, जैसे अलास्का, कनाडाई आर्कटिक क्षेत्र, ग्रीनलैंड, स्कैंडिनेविया और दक्षिणी एंडीज। इन जगहों पर ग्लेशियर्स न सिर्फ पिघल रहे हैं, बल्कि नीचे की जमीन को भी तराश रहे हैं, जिससे घाटियां गहरी हो रही हैं और मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है। यह अध्ययन नेचर जियोसाइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जहां शोधकर्ताओं ने बताया कि ग्लेशियर्स का कटाव मापना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। ग्लेशियर्स के नीचे पहुंचना मुश्किल होता है, इसलिए वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट डेटा, डिजिटल मॉडल्स और जलविज्ञान संबंधी जानकारी का इस्तेमाल किया। मशीन लर्निंग एल्गोरिदम को ट्रेन करके उन्होंने 85 प्रतिशत ग्लेशियर्स के लिए कटाव की दर का अनुमान लगाया।
कटाव के पीछे छिपे कारण: तापमान से लेकर जियोथर्मल हीट तक
रिसर्च से यह भी सामने आया कि ग्लेशियर्स के पिघलने की रफ्तार सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग पर निर्भर नहीं है। कई फैक्टर मिलकर इसे प्रभावित करते हैं, जैसे:
- तापमान का बढ़ना: गर्म होती हवा और पानी ग्लेशियर्स को तेजी से पिघलाते हैं।
- नीचे बहता पानी: ग्लेशियर्स के बेस में पानी की मात्रा कटाव को बढ़ावा देती है।
- चट्टानों का प्रकार: इलाके की रॉक स्ट्रक्चर कितनी मजबूत है, यह तय करता है कि कटाव कितना होगा।
- पृथ्वी की आंतरिक गर्मी: जियोथर्मल हीट भी बर्फ को अंदर से कमजोर करती है।
ये फैक्टर मिलकर ग्लेशियर्स को न सिर्फ छोटा कर रहे हैं, बल्कि पूरे लैंडस्केप को बदल रहे हैं। उदाहरण के लिए, पिघलते ग्लेशियर्स से निकलने वाली तलछट नदियों में बहकर समुद्र तक पहुंचती है, जो समुद्री जीवन को प्रभावित करती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह रिसर्च? पर्यावरण और मानव जीवन पर असर
ग्लेशियर्स का तेज कटाव सिर्फ बर्फ की कहानी नहीं है, यह पूरी धरती के इकोसिस्टम से जुड़ा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह जानकारी:
- भू-प्रबंधन में मदद करेगी: ग्लेशियर्स से बनी घाटियों और मिट्टी की सुरक्षा के लिए प्लानिंग आसान हो जाएगी।
- परमाणु अपशिष्ट स्टोरेज: लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए सही जगह चुनने में सहायक।
- तलछट और पोषक तत्वों की मॉनिटरिंग: ये तत्व कृषि और जल स्रोतों को प्रभावित करते हैं, खासकर हिमालय जैसे इलाकों में जहां करोड़ों लोग ग्लेशियर-आधारित नदियों पर निर्भर हैं।
- इसको भी पढ़ें: Perseids Meteor Showers: 12-13 अगस्त को दिखेगा चमकता नजारा
क्लाइमेट चेंज के दौर में यह स्टडी चेतावनी की तरह है। अगर तापमान बढ़ना जारी रहा, तो ग्लेशियर्स का पिघलना और तेज हो सकता है, जिससे बाढ़, सूखा और समुद्र स्तर में वृद्धि हो सकती हैं।
अगर आप क्लाइमेट चेंज से जुड़ी ऐसी खबरें पढ़ना चाहते हैं, तो कमेंट में बताएं। क्या आपको लगता है कि भारत के हिमालयी ग्लेशियर्स पर भी इसका असर पड़ रहा है?



