(पेरिस/नई दिल्ली)
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है, या फिर हम अतीत की गलतियों से सबक लेने में एक बार फिर नाकाम रहे हैं? यह सवाल इस समय अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों, इतिहासकारों और कूटनीतिज्ञों के जेहन में सबसे ऊपर तैर रहा है। वजह है फ्रांस के उसी ऐतिहासिक और भव्य वर्साय महल (Palace of Versailles) में हस्ताक्षरित हुआ एक नया 14-सूत्रीय दस्तावेज, जिसने एक सदी पुराने जख्मों और विवादों की यादें ताजा कर दी हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने फ्रांस के इसी ऐतिहासिक महल में एक नए शांति समझौते पर दस्तखत किए हैं। लेकिन जिस समझौते को दुनिया में अमन की नई सुबह के तौर पर पेश किया जा रहा था, उसे वैश्विक राजनीति के कई गंभीर पारखी ‘वर्साय 2’ (Versailles 2) करार दे रहे हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि ठीक इसी स्थान पर साल 1919 में प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त करने वाली ‘वर्साय की संधि’ पर हस्ताक्षर किए गए थे—एक ऐसी संधि जो अपनी कठोर शर्तों, अपमानजनक फैसलों और विनाशकारी परिणामों के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
इस नए समझौते को लेकर जहां अमेरिका के भीतर और बाहर यह आलोचना हो रही है कि वाशिंगटन ने ईरान को उसकी अपेक्षा से कहीं अधिक रियायतें दे दी हैं, वहीं दूसरी तरफ भू-राजनीतिक विश्लेषक चेतावनी दे रहे हैं कि इस समझौते के छिपे हुए प्रभाव आने वाले समय में पूरे पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के समीकरणों को हिलाकर रख सकते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: 1919 में यहीं हस्ताक्षरित हुई थी वर्साय की संधि. Source: Bettmann / Bettmann Archive
इतिहास का आईना: क्या थी 1919 की वर्साय संधि?
इस नए समझौते के निहितार्थों को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा और यह देखना होगा कि आखिर 1919 की वर्साय संधि क्या थी और क्यों इसे दुनिया की सबसे विवादित संधियों में से एक माना जाता है।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) की विभीषिका के बाद विजयी मित्र राष्ट्रों (मुख्य रूप से अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन) ने पराजित जर्मनी को पूरी तरह घुटनों पर लाने का मन बना लिया था। पेरिस शांति सम्मेलन के बाद 28 जून 1919 को वर्साय के ‘हॉल ऑफ मिरर्स’ में जिस संधि पत्र पर हस्ताक्षर कराए गए, उसने शांति स्थापना से कहीं अधिक प्रतिशोध की भावना को हवा दी।
- एकतरफा और थोपी गई संधि: इस संधि की सबसे बड़ी खामी यह थी कि इसकी शर्तें तय करने में जर्मनी की कोई भूमिका या राय नहीं ली गई थी। जर्मनी के प्रतिनिधियों को सिर्फ और सिर्फ अंतिम दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए बुलाया गया था। यही कारण था कि पूरे जर्मनी में इसे एक ‘थोपा हुआ फैसला’ (Diktat) माना गया, जिसने जर्मन अवाम के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंचाई।
- भूगोलीय और सैन्य पंगुता: इस संधि के तहत जर्मनी को अपनी मुख्य भूमि के एक बहुत बड़े हिस्से (लगभग 13 प्रतिशत क्षेत्र) से हाथ धोना पड़ा। उसकी सीमाओं को सिकोड़ दिया गया और दूसरे राज्यों पर किसी भी तरह के नियंत्रण या कब्जे की सख्त पाबंदी लगा दी गई। इतना ही नहीं, जर्मन सेना के आकार को बेहद सीमित कर दिया गया ताकि वह भविष्य में कभी सिर न उठा सके।
- विजेता राष्ट्रों का स्वार्थ: इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि यह संधि किसी दीर्घकालिक शांति की स्थापना के लिए नहीं, बल्कि विजेता राष्ट्रों द्वारा अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने और जर्मनी से अपनी पुरानी शत्रुता का बदला लेने के इरादे से बनाई गई थी।
जब लाचारी बनी तानाशाही का ईंधन
वर्ष 1919 में युद्ध की मार से बेहाल जर्मनी आर्थिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह असहाय था। उसके पास इस कठोर और अपमानजनक संधि को मजबूरी में स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। लेकिन इस लाचारी ने जर्मन समाज के भीतर गुस्से और प्रतिशोध के एक ऐसे बारूद को जन्म दिया, जिसे फटने में ज्यादा वक्त नहीं लगा।
हिटलर का उदय और राष्ट्रवाद का उन्माद: जर्मनी की इस लाचारी और राष्ट्रीय अपमान को एडोल्फ हिटलर ने अपनी सत्ता की सीढ़ी बना लिया। उसने वर्साय की संधि को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। हिटलर ने जर्मन लोगों के मन में सुलग रही बदले की भावना को हवा दी, उग्र राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया और लोकतांत्रिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकते हुए खुद को जर्मनी का क्रूर तानाशाह स्थापित कर लिया।
हिटलर की पूरी विदेश नीति का एकमात्र लक्ष्य वर्साय की संधि की बेड़ियों को तोड़ना और खोए हुए जर्मन गौरव को वापस पाना बन गया। इस संधि के तहत जर्मनी से छीने गए क्षेत्रों (विशेष रूप से पोलैंड के गलियारे में स्थित भूभाग) को वापस लेने की उसकी इसी बेलगाम महत्वाकांक्षा का नतीजा था कि 1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया। यही वह चिंगारी थी जिसने द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की और आगे चलकर दुनिया ने एक ऐसा विनाश देखा जिसकी कल्पना भी नहीं की गई थी।
वर्साय महल का वह हॉल जहां कूटनीतिक समझौतों ने दुनिया का नक्शा बदला. Source: Fine Art / Corbis via Getty Images
‘वर्साय 2’: अमेरिका-ईरान समझौता और आज की चुनौतियां
अब सवाल उठता है कि 2026 के इस दौर में अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14-सूत्रीय समझौते की तुलना 1919 की उस विनाशकारी संधि से क्यों की जा रही है? क्या वाकई परिस्थितियां वैसी ही हैं?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि भले ही इस बार की बातचीत का स्वरूप अलग हो, लेकिन जिस जगह (वर्साय महल) पर यह समझौता हुआ है और इसकी जो अंदरूनी शर्तें निकलकर सामने आ रही हैं, वे इतिहास के उसी ढर्रे की याद दिलाती हैं। हालांकि, इस बार आलोचना का रुख थोड़ा अलग है:
- अमेरिका की अत्यधिक रियायतें: जहां 1919 में जर्मनी को पूरी तरह दबा दिया गया था, वहीं इस नए समझौते के आलोचकों का कहना है कि अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के सामने जरूरत से ज्यादा घुटने टेक दिए हैं। आलोचकों के मुताबिक, तेहरान को दी गई इन अप्रत्याशित रियायतों से उसके हौसले बढ़ सकते हैं।
- पश्चिम एशिया में असंतुलन की आशंका: कूटनीति के जानकारों का मानना है कि इस समझौते से पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के क्षेत्रीय संतुलन में भारी असंतुलन पैदा हो सकता है। इजरायल और सऊदी अरब जैसे पारंपरिक अमेरिकी सहयोगियों की चिंताओं को दरकिनार कर किया गया कोई भी समझौता क्षेत्र में शांति लाने के बजाय एक नए और अधिक हिंसक शीत युद्ध की शुरुआत कर सकता है
- अपेक्षा से परे परिणाम: जिस तरह 1919 के नीति-नियंताओं ने सोचा था कि वे जर्मनी को कमजोर कर दुनिया को सुरक्षित बना रहे हैं, लेकिन परिणाम बिल्कुल उलटा निकला; ठीक उसी तरह आज के रणनीतिकार इस समझौते को एक बड़ी कामयाबी मान रहे हैं, जबकि इसके अनपेक्षित और प्रतिकूल परिणाम भविष्य में सामने आ सकते हैं।
क्या इतिहास से सबक सीखेगा वैश्विक नेतृत्व?
वर्साय महल की दीवारें इस बात की गवाह हैं कि बंद कमरों में बैठकर, जमीन की हकीकत को नजरअंदाज कर और केवल तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए की गई कूटनीति हमेशा बैकफायर करती है। शांति समझौते कभी भी एकतरफा दबाव या अत्यधिक तुष्टिकरण के संतुलन पर नहीं टिक सकते।
यदि अमेरिका-ईरान समझौते में भी क्षेत्रीय ताकतों की चिंताओं और भविष्य के खतरों को नजरअंदाज किया गया है, तो यह ‘वर्साय 2’ की अवधारणा सच साबित हो सकती है। दुनिया एक और बड़े क्षेत्रीय या वैश्विक टकराव को झेलने की स्थिति में नहीं है। अब देखना यह होगा कि क्या आज का वैश्विक नेतृत्व इतिहास की उन गलतियों से कुछ सीख सका है जो 1919 में इसी महल की गिल्ट-सजी छतों के नीचे की गई थीं, या फिर हम एक बार फिर एक नए और अज्ञात संकट की ओर कदम बढ़ा चुके हैं।



