नई दिल्ली: पिछले कुछ दशकों में धरती पर हरियाली में तेजी से इजाफा हुआ है। उपग्रह चित्रों और वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि विश्व के दो-तिहाई हिस्सों में वनस्पति और हरे-भरे क्षेत्रों में वृद्धि हुई है। यह खबर सुनने में सकारात्मक लगती है, क्योंकि अधिक पेड़-पौधे पर्यावरण को बेहतर बनाने, ऑक्सीजन बढ़ाने और जलवायु संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। लेकिन चीनी विज्ञान अकादमी के शिनजियांग इंस्टीट्यूट ऑफ इकोलॉजी एंड जियोग्राफी के ताजा शोध ने एक चौंकाने वाला सच सामने लाया है। ‘कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट’ पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, बढ़ती हरियाली कई क्षेत्रों में मिट्टी की नमी को कम कर रही है, जो भविष्य में जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन का कारण बन सकता है।
शोध कैसे हुआ?
वैज्ञानिकों ने 1982 से 2100 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जिसमें उपग्रहों से प्राप्त डेटा और 12 अलग-अलग अर्थ सिस्टम मॉडल्स का उपयोग किया गया। इस व्यापक अध्ययन से हरियाली और मिट्टी की नमी के बीच संबंध को समझने में मदद मिली। शोधकर्ताओं ने पाया कि हरियाली बढ़ने के बावजूद मिट्टी की नमी पर इसका प्रभाव क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग है।
शोध के प्रमुख निष्कर्ष
अध्ययन में सामने आया कि विश्व के 65.82% हिस्सों में वनस्पति की मात्रा बढ़ी है। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि इनमें से लगभग आधे क्षेत्रों में मिट्टी की नमी में कमी देखी गई है। वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को “हरियाली-सूखापन” (ग्रीनिंग-ड्राइंग) पैटर्न का नाम दिया है। यह समस्या खासकर उन क्षेत्रों में ज्यादा देखी गई, जहां पानी की उपलब्धता पहले से ही सीमित है। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में हरियाली के साथ मिट्टी की नमी में भी वृद्धि हुई है, जिसे “हरियाली-नमी” (ग्रीनिंग-वेटिंग) पैटर्न कहा गया है। ऐसे क्षेत्रों में भारतीय उपमहाद्वीप, उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्से और दक्षिणी साहेल (अफ्रीका) शामिल हैं।
कहां है सबसे ज्यादा असर?
‘हरियाली-सूखापन’ पैटर्न का प्रभाव मध्य अफ्रीका, मध्य एशिया, पूर्वी ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के मध्य व उत्तरी हिस्सों में स्पष्ट रूप से देखा गया है। इन क्षेत्रों में बढ़ती हरियाली मिट्टी से पानी का संतुलन बिगाड़ रही है। इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में हरियाली के साथ नमी में वृद्धि हुई है, वहां जलवायु और मिट्टी की स्थिति पहले से ही अनुकूल थी।
हरियाली क्यों बन रही है नमी की दुश्मन?
आम धारणा है कि पेड़-पौधे मिट्टी की नमी को संरक्षित करते हैं, लेकिन यह हमेशा सच नहीं है। जब पानी की कमी वाले क्षेत्रों में वनस्पति तेजी से बढ़ती है, तो पेड़-पौधे अपने विकास और प्रस्वेदन (ट्रांस्पिरेशन) के लिए मिट्टी से बड़ी मात्रा में पानी खींचते हैं। प्रस्वेदन के दौरान पौधे पानी को वायुमंडल में छोड़ते हैं, जिससे मिट्टी धीरे-धीरे सूखने लगती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पानी की कमी वाले इलाकों में अत्यधिक वनस्पति मिट्टी की नमी को तेजी से कम कर सकती है, जिससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।
संभावित खतरे क्या हैं?
यदि यह ‘हरियाली-सूखापन’ पैटर्न अनियंत्रित रहा, तो कई गंभीर समस्याएं सामने आ सकती हैं:
जल संकट: पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता और कम हो सकती है।
कृषि पर प्रभाव: मिट्टी की नमी फसलों के लिए जरूरी है। नमी कम होने से फसल उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
जलवायु असंतुलन: सूखी मिट्टी ज्यादा गर्मी सोखती है, जिससे स्थानीय जलवायु गर्म हो सकती है।
सामाजिक-आर्थिक दबाव: पानी की कमी से सामुदायिक और आर्थिक तनाव बढ़ सकता है।
आगे क्या करें?
यह शोध पर्यावरण संरक्षण के लिए एक नई दिशा देता है। हरियाली बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; इसे जल और मिट्टी की स्थिति के साथ संतुलित करना होगा। कुछ जरूरी कदम इस प्रकार हैं:
संतुलित वनरोपण: पानी की कमी वाले क्षेत्रों में स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुकूल पेड़-पौधे लगाएं।
जल संरक्षण: वर्षा जल संचयन, ड्रिप इरिगेशन और भूजल पुनर्भरण जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना।
मिट्टी प्रबंधन: मल्चिंग और जैविक खेती के जरिए मिट्टी की नमी को बनाए रखना।
नीतिगत बदलाव: पर्यावरणीय योजनाओं में जल और मिट्टी की उपलब्धता को प्राथमिकता देना।
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संतुलन है जरूरी
यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि प्रकृति में संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। हरियाली बढ़ाना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन अगर यह मिट्टी की नमी और जल संसाधनों को नुकसान पहुंचाए, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव हानिकारक हो सकता है। पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें केवल पेड़ लगाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि पानी और मिट्टी की सेहत को भी प्राथमिकता देनी होगी। यह शोध सरकारों, नीति निर्माताओं और पर्यावरणविदों के लिए एक चेतावनी है कि हरियाली को टिकाऊ बनाने के लिए हमें सोच-समझकर कदम उठाने होंगे।



