नई दिल्ली: उष्णकटिबंधीय जंगलों में विदेशी और आक्रामक पौधों का प्रसार पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रहा है और स्थानीय समुदायों की आजीविका को प्रभावित कर रहा है। डेनमार्क के आरहस विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए गए एक नए शोध में यह खुलासा हुआ है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में लगभग 10,000 विदेशी पौधों की प्रजातियां पाई गई हैं। विशेष रूप से द्वीप इन पौधों के लिए हॉटस्पॉट बन गए हैं, जहां कई स्थानों पर विदेशी पौधों की संख्या मूल प्रजातियों से अधिक हो गई है। यह अध्ययन नेचर रिव्यूज बायोडायवर्सिटी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
भारत में लैंटाना का कहर
भारत में लैंटाना कैमारा नामक विदेशी पौधा पश्चिमी घाट के जंगलों में तेजी से फैल रहा है। मूल रूप से ट्रॉपिकल अमेरिका का यह पौधा 17वीं सदी में यूरोप लाया गया और बाद में पुर्तगालियों द्वारा भारत में फैलाया गया। आज यह भारत में लगभग तीन करोड़ हेक्टेयर, ऑस्ट्रेलिया में 40 लाख हेक्टेयर और हवाई में 1.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुका है। पश्चिमी घाट में यह पौधा इतना हावी हो गया है कि सोलिगा जैसे आदिवासी समुदायों को अपनी पारंपरिक आजीविका छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
पारिस्थितिकी और मानव जीवन पर प्रभाव
आक्रामक पौधे, जैसे लैंटाना, मूल खाद्य पौधों को दबा देते हैं, जिससे हिरण जैसे शाकाहारी जानवरों की संख्या घट रही है। इसका असर बाघ और तेंदुआ जैसे शिकारियों पर भी पड़ता है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ रहा है। स्थानीय समुदायों, खासकर गरीब और प्रकृति पर निर्भर लोगों के लिए यह स्थिति मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ा रही है। इन पौधों के कारण लोगों का प्रकृति के साथ संबंध भी कमजोर हो रहा है, जिससे उनकी सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
विदेशी पौधों का इतिहास और कारण
विदेशी पौधों का प्रसार कोई नई बात नहीं है। यह प्रक्रिया कृषि के शुरुआती दौर से चली आ रही है, लेकिन औपनिवेशिक काल और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक व्यापार के विस्तार ने इसे तेज कर दिया। जंगलों की कटाई, प्रदूषण और भूमि उपयोग में बदलाव जैसे कारकों ने इन पौधों के फैलाव को और बढ़ावा दिया है। जलवायु परिवर्तन ने भी इस समस्या को गंभीर बना दिया है। अमेजन जैसे जंगलों में बढ़ती आग, तापमान में वृद्धि और पेड़ों की कटाई ने मूल पौधों को कमजोर कर दिया है, जिससे विदेशी घास और झाड़ियां तेजी से फैल रही हैं।
जलवायु परिवर्तन की भूमिका
जलवायु परिवर्तन के कारण उष्णकटिबंधीय जंगल और सवाना क्षेत्र कमजोर हो रहे हैं। बढ़ते कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) के स्तर से कुछ विदेशी झाड़ियां और पेड़ तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके अलावा, विदेशी घास आग को बढ़ावा देती हैं, जो मूल पौधों की पुनर्जनन प्रक्रिया को रोकती हैं। इससे जंगलों का प्राकृतिक चक्र बाधित हो रहा है और पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी नुकसान हो रहा है।
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सकारात्मक उपयोग और प्रबंधन के उपाय
हालांकि सभी विदेशी पौधे हानिकारक नहीं हैं। कुछ पौधे पारिस्थितिकी तंत्र को लाभ पहुंचा सकते हैं और स्थानीय समुदायों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, लैंटाना से फर्नीचर और हस्तशिल्प बनाए जा रहे हैं, प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा से बायोचार उत्पादन हो रहा है, और जलकुंभी से व्यावसायिक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि बड़े शाकाहारी जानवर, जैसे भैंस और हाथी, इन पौधों के प्रसार को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित कर सकते हैं। इसके अलावा, “प्रकृति-आधारित समाधान” अपनाकर इन पौधों को प्रबंधित किया जा सकता है।
भविष्य के लिए रणनीति
आक्रामक पौधे केवल खतरा नहीं, बल्कि अवसर भी प्रदान करते हैं। इनके नकारात्मक और सकारात्मक प्रभावों को समझकर, स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर प्रभावी प्रबंधन रणनीतियां बनाना जरूरी है। सरकारों, वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों को मिलकर इन पौधों के प्रसार को नियंत्रित करने और उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए काम करना होगा। यह न केवल जैव विविधता की रक्षा करेगा, बल्कि उन समुदायों की आजीविका को भी सुरक्षित रखेगा जो इन जंगलों पर निर्भर हैं।



