Startup Conclave
लखनऊ: भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धती अब आधुनिक विज्ञान के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही है। परंपराग चिकित्सा पद्धति में इस्तेमाल होने वाली औषधियों का भी मॉडर्न दवा की तरह प्रयोगशाला में अध्ययन किया जा रहा है। इसका असर यह हुआ कि अब न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धति का मान बढ़ा है। इसकी झलक लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) स्टार्टअप कॉन्क्लेव में दिखी। जहां पहली बार एक मंच पर शोध संस्थान, स्टार्टअप और नीति निर्माताओं ने दिखाया कि कैसे प्रयोगशाला से निकल कर हर्बल फार्मूला से बनी दवाएं सीधे मरीज तक पहुंच रही है।
लखनऊ स्थित सीएसआईआर की तीन प्रमुख प्रयोगशालाएं वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (एनबीआरआई), सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिनल एंड एरोमैटिक प्लांट्स (सीमैप) और सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडआरआई) ने 13 महत्वपूर्ण हर्बल दवाएं विकसित की हैं। इनमें डायबिटीज की दवा बीजीआर-34, रक्त कैंसर के लिए अर्जुन की छाल से बनी पैक्लिटैक्सेल और फैटी लीवर व लीवर कैंसर के लिए पिक्रोलिव प्रमुख हैं।
बीजीआर-34 : लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति विज्ञान संस्थान (एनबीआरआई) और सीमैप ने छह प्रमुख जड़ी-बूटियों दारुहरिद्रा, गिलोय, विजयसार, गुड़मार, मंजिष्ठा और मेथी से विकसित किया है। यह दवा न केवल ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मदद करती है बल्कि लंबे समय में डायबिटीज रिवर्सल की दिशा में भी कारगर मानी जा रही है।
एमिल फार्मास्युटिकल्स के कार्यकारी निदेशक डॉ. संचित शर्मा ने कहा, “दुनिया अब केवल डायबिटीज कंट्रोल नहीं बल्कि डायबिटीज रिवर्सल पर जोर दे रही है। बीजीआर-34 जैसे भारतीय फार्मूले आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का मेल है और यही भविष्य में डायबिटीज-मुक्त समाज का आधार बन सकते हैं।’
लखनऊ में आयोजित कांक्लेव केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि यह ‘प्रयोगशाला से जनमानस तक’ की अवधारणा का बेहतरीन उदाहरण है। इस क्षेत्र में नए स्टार्टअप आने से हर्बल दवाओं को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिलेगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी प्रदर्शनी का निरीक्षण किया और वैज्ञानिकों को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
यह आयोजन ऐसे समय में हुआ है जब दुनियाभर में प्राकृतिक और हर्बल उपचारों की मांग बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास इस क्षेत्र में वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित फार्मूलों के जरिए विश्व बाजार में नेतृत्व करने का बड़ा अवसर है। डॉ. संचित शर्मा के शब्दों में, “यह केवल दवा नहीं, बल्कि विज्ञान और परंपरा का ऐसा मॉडल है जो आने वाले वर्षों में वैश्विक हेल्थकेयर एजेंडा तय कर सकता है।’
दरअसल एनबीआरआई और सीमैप जैसी संस्थाएं औषधीय पौधों की उन्नत किस्मों पर भी शोध कर रही हैं। इससे किसानों को बेहतर उत्पादन और अधिक आय का अवसर मिलेगा। वहीं, मरीजों को सस्ती और दुष्प्रभाव रहित दवाएं मिलेंगी।



