पिछले तीन-चार दिन से नेपाल में युवा जनाक्रोश के जिस ज्वालामुखी का विस्फोट हुआ है उसने पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है। फ़िलहाल भले ही सेना ने सत्ता संभाली है और बल प्रयोग के साथ-साथ सुलह वार्ताओं से स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश हो रही है; तब भी किसी भी तरह की भविष्यवाणी करना कठिन है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि जो कुछ नेपाल में घट रहा है वह उसी तरह की अराजकता का दोहराव है; जिसके दर्शन बांग्लादेश में और उससे पहले श्रीलंका में हो चुके हैं। क्या हिंसा और अराजकता का यह लावा, भीड़ में शामिल असामाजिक तत्वों की उश्रृखलता भारत के लिए भी भी ऐसा ही जोखिम पैदा कर सकती है? कुछ सामरिक विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि चाहे बांग्लादेश हो या नेपाल, चीन या अमेरिका की गुप्तचर संस्थाएं जिन्हें डीप स्टेट कहा जा सकता है, कोई साज़िश रच रही हैं, ताकी दक्षिण एशिया को अस्थिर कर सके और भारत के तेजी से बढ़ते आर्थिक विकास को बाधित कर सके।
हमारी समझ में ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना नादानी या शरारत ही कही जा सकती है। भारत की तुलना भूमिबद्ध नेपाल से या बांग्लादेश और श्रीलंका से क़तई ठीक नहीं। सारे छोटे पडोसी आर्थिक रुप से दिवालिया और विदेशी उधार के बोझ से दबे हुए है। उनकी तकनीकी क्षमता बहुत सीमित है और खाद्यान्न से लेकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा तक के लिए वह चीन या भारत पर निर्भर रहे हैं। नेपाल और श्रीलंका विदेशी मुद्रा को कमाने के लिए पर्यटन उद्योग पर लगभग पूरी तरह निर्भर है और किसी भी तरह की राजनैतिक अस्थिरता और सामाजिक वैमनस्य इस अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ देता है। भारत दुनिया की चौथी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है और तेल के मामले में ही विदेशी स्रोतों पर निर्भर है। उसकी तकनीकी और वैज्ञानिक क्षमता ख़ासकर आईटी के मामले में या इन्फ्रास्टैक्चर (बुनियादी ढांचे) निर्माण सुधार के मामले में विख्यात है। सस्ती प्राणरक्षक दवाइयों और डिजिटल भुगतान की प्रणाली के साथ-साथ हरित ऊर्जा-सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन के मामले में वह अग्र-गण्य है। भारत की अर्थव्यवस्था की चूलें कोई भी अन्तर्राष्ट्रीय साज़िश आसानी से नहीं हिला सकती।
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भारत एक संघीय व्यवस्था है जिसमें कोई भी एक राजनैतिक दल सभी सूबों की सरकारों पर इस वक्त क़ाबिज़ नहीं। सत्ता के विभाजन के विषय में भी यह नहीं कहा जा सकता कि उच्च न्यायपालिका या नौकरशाही पूरी तरह से न्यस्त स्वार्थों की पक्षधर है। यह सच है कि भारत में भी कष्टदायक आर्थिक विषमता है और सामाजिक उत्पीड़न समाप्त नहीं किया जा सका है। दलित आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिलायें सभी अपने को कही न कही किसी न किसी रुप में असुरक्षित महसूस करते हैं। पर फिर इस बात को एक बार फिर रेखांकित करने की ज़रूरत है कि भ्रष्टाचार से अकूत कमाई करने के बाद अश्लील जीवनशैली अपनाने वाले नेपाल जैसे श्रेष्ठी वर्ग का कुरूप सहोदर भारत में नहीं दिखता। मुठ्ठी भर पूंजीपति भले ही अर्थव्यवस्था पर हावी हो लेकिन राजनीति में प्रभावशाली भी सार्वजनिक रुप से स्वदेश में विनयशील मुद्रा ही प्रदर्शित करते हैं।

(विदेश संबंधों के जानकार, प्रसिद्ध शिक्षाविद,फूड क्रिटिक और इतिहासकार)



