परंपरा और तकनीक को जोड़ेगा आदि संस्कृति का बीटा संस्करण

इसका उद्देश्य केवल परंपरा का संरक्षण ही नहीं, बल्कि जनजातीय शिल्पकारों को वैश्विक बाज़ारों से जोड़कर आजीविका भी सुनिश्चित करना है।

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नई दिल्ली: जनजातीय कार्य मंत्रालय ने आदि संस्कृति का बीटा संस्करण लॉन्च कर दिया है। यह परंपरा को तकनीक से जोड़ने में मदद करेगा। यह लॉन्चिंग नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आदि कर्मयोगी अभियान पर राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुई। यह आदिवासी कलारूपों, विरासत के संरक्षण, आजीविका को सक्षम बनाने और भारत के जनजातीय समुदायों को दुनिया से जोड़ने के लिए एक अग्रणी डिजिटल शिक्षण मंच है। इसकी शुरुआत जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने की। 

क्या है आदि संस्कृति

आदि संस्कृति की कल्पना जनजातीय समुदायों की संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने और उसे बढ़ावा देने, और जनजातीय कारीगरों के बनाए उत्पादों तक दुनिया भर की पहुंच प्रदान करने वाले एक ऑनलाइन बाज़ार के लिए दुनिया के पहले डिजिटल विश्वविद्यालय के रूप में की गई है।

1.आदि विश्वविद्यालय (डिजिटल ट्राइबल आर्ट अकादमी)

 वर्तमान में आदिवासी नृत्य, चित्रकला, शिल्प, संगीत और लोककथाओं पर 45 इमर्सिव पाठ्यक्रम प्रदान कर रहा है। आदि सम्पदा (सामाजिक-सांस्कृतिक भंडार): पांच विषयों पर 5,000 से अधिक संकलित दस्तावेजों का संग्रह, जिसमें चित्रकला, नृत्य, वस्त्र एवं वस्त्र, कलाकृतियाँ और आजीविका शामिल हैं।

2. आदि हाट (ऑनलाइन बाज़ार)

 वर्तमान में ट्राइफेड के साथ जुड़ा हुआ, यह आदिवासी कारीगरों के लिए एक समर्पित ऑनलाइन बाज़ार के रूप में विकसित होगा, जिससे स्थायी आजीविका और प्रत्यक्ष उपभोक्ता पहुँच संभव होगी।

3. राज्य टीआरआई के साथ तालमेल से निर्माण

आदि संस्कृति का निर्माण राज्य जनजातीय अनुसंधान संस्थानों (टीआरआई) के साथ घनिष्ठ साझेदारी में किया जा रहा है, जिससे इसके विकास में जमीनी स्तर की भागीदारी, प्रामाणिकता और तालमेल सुनिश्चित हो सके। इसके पहले चरण में, आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश के टीआरआई ने जनजातीय कलाकृतियों के दस्तावेजीकरण, विषयवस्तु संग्रह और डिजिटल मानचित्रण में योगदान दिया है। इस सामूहिक प्रयास ने एक ऐसे मंच की नींव रखी है जो भारत की जनजातीय विरासत की विविधता और समृद्धि को दर्शाता है।

जनजातीय भाषाओं में बात करेगा AI

इस अवसर पर जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने जनजातीय भाषाओं के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)-आधारित अनुवादक, आदि वाणी की पूर्व में की गई शुरूआत का जिक्र किया और आशा व्यक्त की कि ऐसे उपकरण जल्द ही लोकतांत्रिक मंचों और संस्थानों में उपयोगी साबित होंगे।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि शिक्षा से संपदा और हाट तक – आदि संस्कृति संरक्षण, ज्ञान-साझाकरण और सशक्तिकरण का एक समग्र मंच है। यह जनजातीय समुदायों, उनकी संस्कृति और विरासत के बारे में विविध ज्ञान प्रदान करता है और कला रूपों के भंडार के रूप में कार्य करता है। इसके शुभारंभ के साथ, अब कोई भी जनजातीय संस्कृति, विरासत और आजीविका के खजाने से जुड़ सकता है।”

जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव अनंत प्रकाश पांडे ने कहा कि आदि संस्कृति, विकसित भारत @2047 के लिए सांस्कृतिक संरक्षण और जनजातीय सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने लोगों से इस पोर्टल का उपयोग करने का आग्रह किया, जो अब सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है। उन्होंने इसके निरंतर संवर्धन के लिए फीडबैक साझा करने का भी आग्रह किया।

मंत्रालय ने पुष्टि की है कि आदि संस्कृति का विस्तार चरणबद्ध तरीके से और अधिक पाठ्यक्रमों, संग्रहों और बाज़ार एकीकरण के साथ किया जाएगा। दीर्घकालिक दृष्टिकोण इस प्लेटफ़ॉर्म को एक जनजातीय डिजिटल विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करना है, जो प्रमाणन, उन्नत शोध के अवसर और परिवर्तनकारी शिक्षण मार्ग प्रदान करेगा।

संरक्षण, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण को एक साथ लाकर, आदि संस्कृति भारत के जनजातीय समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की रक्षा और उसका उत्सव मनाने के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, साथ ही उन्हें डिजिटल ज्ञान अर्थव्यवस्था में सक्रिय भागीदार के रूप में सशक्त भी बनाया गया है।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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