नई दिल्ली: भारत की डिजिटल क्रांति एक नया मोड़ लेने के लिए तैयार है। इस बार यह लक्षित है मैदानी इलाके के विकसित तंत्र के साथ दूरदराज क्षेत्र में रहने वाले लोग। PIB के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल से जून 2025 तक भारत में 1,002.85 मिलियन इंटरनेट ग्राहक हैं। यह संख्या देश में डिजिटल क्रांति की सफलता को दर्शाती है। हालांकि देश के दूरदराज क्षेत्रों में अभी भी इंटरनेट की सीमित पहुँच है। जिस कारण सरकार सैटेलाइट इंटरनेट पर फोकस कर रही है। हालांकि देखना यह है कि सरकार सैटेलाइट इंटरनेट का रेग्युलेशन कैसे करती है और क्या कदम उठाती है..
क्या है सैटेलाइट इंटरनेट..?
सैटेलाइट इंटरनेट, भूस्थिर कक्षाओं (GSO) या गैर-भूस्थिर कक्षाओं (NGSO) में स्थित उपग्रहों के माध्यम से प्रदान की जाने वाली इंटरनेट सेवा है। इस तकनीक के जरिए उन दूरदराज के गांवों, पहाड़ी इलाकों और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी पहुँचा जा सकता है, जहाँ स्थलीय इंटरनेट सेवाओं को पहुँचाना मुश्किल या आर्थिक रूप से अव्यावहारिक है।
सैटेलाइट इंटरनेट के लिए भारत में कौन करेगा रेग्युलेशन…
सरकार ने सेटेलाइट कम्यूनिकेशन (सैटकॉम) को कंट्रोल करने के लिए एक नियामक ढाँचा पेश किया है, जिसका उद्देश्य सेफ्टी और स्पेक्ट्रम मेनेजमेंट के साथ नवाचार को संतुलित करना है। सरकार के अनुसार हाल में किए गए नीतिगत उपाय निजी क्षेत्र की भागीदारी और कुशल स्पेक्ट्रम उपयोग के लिए एक वातावरण तैयार कर रहे हैं, जिससे सैटेलाइट इंटरनेट को अपनाने का मार्ग खुल रहा है।
संस्थाएं जो भारत में संचार व्यवस्था से संबंधित हैं…
- दूरसंचार विभाग (DoT)
एकीकृत लाइसेंस व्यवस्था के तहत यह सैटेलाइट-आधारित संचार सेवाओं को नियंत्रित करता है। दूरसंचार अधिनियम, 2023 इसे स्पेक्ट्रम आवंटित करने और उपग्रह-आधारित सेवाओं को विनियमित करने का अधिकार देता है।
- भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI)
मई 2025 में, ट्राई ने सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन पर अपनी सिफारिशें जारी कीं। ट्राई की सिफ़ारिश है कि उपग्रह स्पेक्ट्रम आवंटन पांच वर्षों की अवधि के लिए किया जाए, जिसे बाज़ार की स्थितियों के आधार पर दो अतिरिक्त वर्षों तक बढ़ाने का विकल्प दिया जा सकता है।
- भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe)
यह संस्थान गैर-सरकारी संस्थाओं (NGE) की अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देने और उनकी निगरानी का काम करता है। यह इसरो और निजी संस्थाओं के बीच एक इंटरफ़ेस के रूप में कार्य करता है। जिससे ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी के लिए भारत के उपग्रह संसाधनों के उपयोग सहित अंतरिक्ष-आधारित गतिविधियों के विकास में सहायता मिलती है।
- न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL)
NSIL अंतरिक्ष विभाग के अंतर्गत एक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र का उद्यम (CPSE) है। इसरो की कमर्शियल बॉडी के रूप में, NSIL वर्तमान में 15 इन-ऑर्बिट संचार उपग्रहों का संचालन कर रहा है।
सैटकॉम के लिए कक्षाओं में बदलाव..
भारत का सैटकॉम इको-सिस्टम पारंपरिक भूस्थिर उपग्रहों (GEO) से हटकर अगली पीढ़ी की निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) और मध्यम पृथ्वी कक्षा (MEO) प्रणालियों को अपना रहा है। LEO उपग्रह 400 से 2,000 किलोमीटर की ऊँचाई पर परिक्रमा करते हैं, जिससे वे कम देर में, उच्च बैंडविड्थ और अधिक विश्वसनीय कवरेज प्रदान कर सकते हैं। माना जा रहा यह बदलाव देशभर में तेज और अधिक विश्वसनीय इंटरनेट कनेक्टिविटी लाएगा।
सैटकॉम के लिए सरकारी पहलें…
सरकार ने स्वचालित और सरकारी अनुमोदन मार्गों के माध्यम से अंतरिक्ष क्षेत्र में 100% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति देकर प्राइवेट पार्ट्नर्शिप को बढ़ावा दिया है। इसके अलावा जून 2025 में, स्टारलिंक को भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएँ शुरू करने का लाइसेंस मिला। अप्रैल 2025 तक, 10 से अधिक उपग्रह ऑपरेटरों ने भारत में सेवाएँ प्रदान करने में रुचि दिखाई है, जो ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- अन्य पहल-
इसके अलावा सरकार ने इन्क्लूसिव डिजिटल कनेक्टिविटी के लिए कई पहलें शुरू की हैं। द्वीप क्षेत्रों के लिए व्यापक दूरसंचार विकास योजना (CTDP) ने अंडमान और निकोबार के साथ-साथ लक्षद्वीप में सेटेलाइट बैंडविड्थ को बढ़ाया है। नेशनल ब्रॉडबैंड मिशन 2.0 (NBM 2.0) का उद्देश्य शेष 1.7 लाख गांवों तक ब्रॉडबैंड पहुँचाना है; NBM 2.0 के प्रमुख घटक भारतनेट परियोजना और प्रधानमंत्री वाई-फाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफेस (PM-WANI) है।
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) ने भी आपदा वाले राज्यों को समय पर पूर्व चेतावनी देने के लिए एक GIS-आधारित निर्णय सहायता प्रणाली विकसित की है, जो इंटरनेट कनेक्टिविटी का उपयोग करती है।
भारत के प्रमुख ब्रॉडबैंड-आधारित उपग्रह
भारत के पास 19 ऑपरेशनल संचार उपग्रहों का बेड़ा है, जिनमें GSAT-19, GSAT-29, GSAT-11 और GSAT-N2 जैसे उच्च-थ्रूपुट उपग्रह (HTS) शामिल हैं। ये उपग्रह उन्नत स्पॉट-बीम तकनीक का उपयोग करके कम सेवा वाले क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ाने, उड़ान के दौरान संचार और आपदा प्रबंधन में सहायता के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। ये उपग्रह मिलकर भारत की उपग्रह-आधारित ब्रॉडबैंड अवसंरचना की रीढ़ हैं और भारतनेट जैसे भू-आधारित नेटवर्क के पूरक हैं।

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निष्कर्ष
विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप, सैटेलाइट इंटरनेट डिजिटल कनेक्टिविटी का एक प्रमुख प्रवर्तक बनकर उभरा है। यह दूरस्थ और वंचित क्षेत्रों तक विश्वसनीय पहुँच प्रदान करता है और रक्षा एवं आपदा प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों को सशक्त बनाता है। एचटीएस के संचालन से लेकर निजी भागीदारी को सक्षम करने तक, भारत अंतरिक्ष-आधारित संचार में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत कर रहा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि कनेक्टिविटी का लाभ प्रत्येक नागरिक तक पहुँचे।




