उत्तर-पश्चिमी हवाओं के छोटे बदलाव, Asian Monsoon पर बड़ा असर

नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में छपी एक स्टडी के मुताबिक, पिछले हिमयुग में जब पृथ्वी का मौसम ठंडा था, तब तापमान में अचानक वृद्धि होती थी। इन गर्म दौरों को इंटरस्टेडियल और ठंडे दौरों को स्टेडियल कहते हैं। इस शोध से पता चला कि इन गर्म अवधियों में Asian Monsoon कमजोर हो जाता था।

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नई दिल्ली: आज की दुनिया में जलवायु के बदलते पैटर्न और मानसून की अनिश्चितताओं को समझना हर किसी के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। एक ताजा रिसर्च से पता चला है कि पूर्वी एशिया में गर्मियों का मानसून (Asian Monsoon) हमेशा एक ही तरीके से काम नहीं करता। इसमें काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। ये बदलाव मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी हवाओं, जिन्हें वेस्टर्ली जेट्स भी कहते हैं, की मामूली शिफ्टिंग से जुड़े होते हैं। यह अध्ययन चीन की जियाओतोंग यूनिवर्सिटी, ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे और दुनिया भर के वैज्ञानिकों की टीम ने मिलकर किया है। रिसर्च बताती है कि पिछले आइस एज के दौरान अचानक आने वाली गर्मी की लहरें, जिन्हें डैन्सगार्ड-ओशगर (डीओ) इवेंट्स कहा जाता है, पूर्वी एशियाई मानसून को हर जगह एक समान तरीके से प्रभावित नहीं करतीं।

डैन्सगार्ड-ओशगर इवेंट्स की हकीकत क्या है?

नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में छपी इस स्टडी के मुताबिक, पिछले आइस एज में जब पृथ्वी का मौसम ज्यादातर ठंडा रहता था, तब बीच-बीच में तापमान में तेज उछाल आता था। इन गर्म पीरियड्स को इंटरस्टेडियल कहते हैं, जबकि ठंडे दौर को स्टेडियल। अगर गर्मी लंबे समय तक टिकी रहे तो वो लॉन्ग इंटरस्टेडियल, और अगर सिर्फ थोड़े वक्त के लिए तो शॉर्ट इंटरस्टेडियल। इन इवेंट्स के समय पूर्वी एशिया का मानसून अलग-अलग रिएक्शन दिखाता था, जो बताता है कि जलवायु कितनी जटिल हो सकती है।

रिसर्च का तरीका कैसा रहा?

वैज्ञानिकों ने दो मुख्य मेथड्स का इस्तेमाल किया। पहला, स्पेलियोथेम रिकॉर्ड्स यानी गुफाओं में जमा होने वाली चूने की परतों का परीक्षण। इनमें पानी की बूंदों से जुड़े आइसोटोप, जैसे डेल्टा ऑक्सीजन-18 संरक्षित रहते हैं, जो पुराने समय की वर्षा और मानसून की तीव्रता के बारे में बताते हैं। दूसरा, आइसोटोप-इनेबल्ड क्लाइमेट मॉडल – एक एडवांस कंप्यूटर सिमुलेशन जो मानसून की गतिविधियों और उत्तर-पश्चिमी हवाओं के मूवमेंट को बारीकी से ट्रैक करता है।

स्टडी के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?

  • शॉर्ट इंटरस्टेडियल का असर: रिसर्च में सामने आया कि छोटे गर्म दौर में उत्तर-पश्चिमी हवाएं और ज्यादा उत्तर दिशा में शिफ्ट हो जातीं। इससे पश्चिमी पैसिफिक से नमी सीधे पूर्वी एशिया पहुंचती, जिससे दक्षिण-पूर्वी चीन में मानसून की बारिश का पैटर्न बदल जाता। यहां डेल्टा ऑक्सीजन-18 वैल्यू में उतनी गिरावट नहीं दिखी जितनी उम्मीद की जाती थी।
  • पुरानी थ्योरी को झटका: पहले वैज्ञानिक मानते थे कि वेस्टर्ली हवाएं सिर्फ दो मोड में काम करतीं – स्टेडियल में दक्षिण की तरफ और इंटरस्टेडियल में उत्तर की तरफ। लेकिन ये नई स्टडी दिखाती है कि ये हवाएं एक कंटिन्यूअस स्पेक्ट्रम पर मूव करती हैं। गर्मी की इंटेंसिटी के हिसाब से उनकी पोजिशन बदलती रहती है, जो मानसून को और जटिल बनाती है।
  • क्षेत्रीय अंतर: दक्षिण-पूर्वी चीन में मानसून और इन हवाओं का इंटरैक्शन सबसे ज्यादा नजर आता है। भारत और दक्षिण-पश्चिम चीन जैसे इलाकों में ये बदलाव सीधे अटलांटिक की करंट्स से लिंक होते हैं, जो ग्लोबल क्लाइमेट को प्रभावित करते हैं।

टलांटिक करंट्स का ग्लोबल कनेक्शन

स्टडी में ये भी खुलासा हुआ कि अटलांटिक ओशन की डीप और सरफेस करंट्स इन इवेंट्स को कंट्रोल करने में अहम रोल प्ले करतीं। जब ये करंट्स स्ट्रॉन्ग होतीं, तो उत्तरी गोलार्ध में गर्मी तेजी से फैलती। कमजोर होने पर ठंडा पीरियड लंबा खिंच जाता। इससे साफ है कि पूर्वी एशियाई मानसून सिर्फ लोकल फैक्टर्स पर नहीं टिका; ये अटलांटिक की एक्टिविटीज से भी जुड़ा होता है, जो पूरी दुनिया की जलवायु को जोड़ती है।

जहां हाई-रेजोल्यूशन डेटा कम उपलब्ध

अभी ये रिसर्च दक्षिण-पूर्वी चीन के छोटे से एरिया पर फोकस्ड है, जहां हाई-रेजोल्यूशन डेटा कम उपलब्ध है। अगर यहां से ज्यादा डेटा इकट्ठा किया जाए, तो मानसून की प्रेडिक्शन और बेहतर हो सकती है। ये जलवायु परिवर्तन से निपटने और पानी के संसाधनों को मैनेज करने में मददगार साबित होगा। कुल मिलाकर, ये नई खोज बताती है कि पूर्वी एशियाई समर मानसून सिर्फ सिंपल नॉर्थ-साउथ शिफ्ट नहीं है। बल्कि ये उत्तर-पश्चिमी हवाओं की फाइन मूवमेंट्स और अटलांटिक करंट्स का कॉम्बिनेशन है। पुराने रिकॉर्ड्स को समझकर हम भविष्य के मौसम पैटर्न्स का बेहतर अंदाजा लगा सकते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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