छत्तीसगढ़: माओवादी हकीकत में उस परजीवी पौधे की तरह हैं, जिसके साथ रहने का दावा करते हैं, उसी को खत्म करने का काम करते हैं। जल, जंगल जमीन का नारा देने वाले, आदिवासियों की सुरक्षा करने का ढोंग करने वाले हकीकत में अब तक सबसे ज्यादा आदिवासी समाज को ही क्षति पहुंचाए हैं।
हार्ड कोर माओवादियों का स्ट्रक्चर ठीक उसी तरह है, जैसे पुलिस प्रशासन का है। सामान्य प्रशासन का काम जनताना सरकार देखती हैं, जिसका गठन 2004 में किया गया था। यह सामान्य जन और हार्डकोर माओवादियों के बीच एक पुल का भी काम करती है। माओवादियों ने अपने प्रभुत्व वाले पूरे क्षेत्र को सात भागों में बांट रखा है।
माओवादियों के सात प्रदेश
ये सात भाग इनकी नजर में सात प्रदेश हैं। इन सातों प्रदेशों को जोनल क्षेत्र कहा जाता है और यहां के लिए जोनल कमेटियां गठित हैं। इन सबके लिए नीति का निर्धारण केन्द्रीय कमेटी करती है। इस केंद्रीय कमेटी में पहले 42 से 43 उच्च स्तरीय माओवादी हुआ करते थे। अब 12 बचे हैं।
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इस वर्ष मारे गये केंद्रीय कमेटी के सदस्य
पहले पुलिस छोटे स्तर के माओवादियों को ही मार पाती थी, इस वर्ष उच्च स्तर के माओवादियों को मारने में ज्यादा सफलता हाथ लगी है। इस वर्ष ही सेंट्रल कमेटी के छह सदस्य मारे जा चुके हैं। इसी साल जनवरी में रामचंद्र रेड्डी उर्फ चंद्रन्ना, मई में पार्टी के महासचिव नंबाला केशव राव, जून में सुधाकर और गजराला रवि ऊर्फ उदय मारे जा चुके हैं। अभी इसी सप्ताह झारखंड का सहदेव मारा जा चुका है।
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अभी सबसे ज्यादा तेलंगाना व आंध्र के माओवादी हैं केंद्रीय कमेटी
इस समय अभी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से आठ केन्द्रीय कमेटी के सदस्य मुपल्ला लक्ष्मण राव ऊर्फ गणपति, मल्लोजुल्ला वेणुगोपाल ऊर्फ सोनू, तिप्पिरी तिरूपति ऊर्फ देवजी, पशुनुरू नरहरि ऊर्फ विश्वनाथ, कादरी सत्यनारायण रेड्डी ऊर्फ कोसा, मल्ला राजिरेड्डी ऊर्फ संग्राम, पाका हनुमंथु ऊर्फ गणेश और कट्टा रामचंद्र ऊर्फ राजूदादा शामिल है। वहीं झारखंड के दो सदस्य मिसिर बेसरा ऊर्फ सुनील, अनल दा ऊर्फ पथिराम मांझी हैं। छत्तीसगढ़ के दो माओवादी मज्जीदेव ऊर्फ रामधीर और हिडमा केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं।
प्रदेशों में मंत्री की तरह काम देखते जोनल कमेटियों के सदस्य
इनकी सात जोनल कमेटियों में दंडकारण्य, नार्थ तेलंगाना, साऊथ तेलंगाना, नल्लामल्ला, आंध्र-उड़ीसा बार्डर, कोयिल-कैमूर, बालाघाट हैं। इन सातों जोनल को जिलों में विभक्त किया गया है, जहां प्रमुख सचिव नियुक्त होता है। यह एसपी रैंक का अधिकारी होता है। जोनल की व्यवस्था देखने के लिए भी एक कमेटी होती है, जिसे मंत्री कह सकते हैं। यह महासचिव की निगरानी में होते हैं और अपने-अपने जोनल के लिए प्रस्ताव पास करते हैं।
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पहचान बहुत मुश्किल है
लाल आतंक यानि माओवादियों की पहचान बहुत मुश्किल है। वर्दी पहन लिये तो माओवादी, खोल दिये तो आदिवासी। इस चक्कर में पड़कर माओवादियों के खिलाफ लड़ाई लड़ना पुलिस के लिए कठिन रहता है। हालांकि कांटे से कांटा निकालने की पद्धति पर चल रही फोर्स ने इस समय बहुत कुछ शांत कर दिया है। गृहमंत्री अमित शाह ने मार्च 2026 तक इसे समाप्त करने की घोषणा कर दी है।
एलओएस काम करता है थाने की तरह
पुलिस विभाग के थाने की तरह एलओएस होता है। एक एलओएस में 12 से 16 माओवादी होते हैं। जैसे थाने के इंचार्ज को थानाध्यक्ष, एसएचओ अथवा एसओ कहा जाता है, वैसे ही एलओएस के इंचार्ज को कमांडर कहते हैं। उनका थाने की तरह एक इलाका सीमित होता है। कमांडर अपने इलाके में ही सीमित रहता है। एलओएस के माओवादी छोटे हथियार, भरमार बंदूक लेकर चलते हैं। इसका मुख्य काम अपने क्षेत्र में छोटी-छोटी घटनाओं को अंजाम देना होता है।
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बड़ी घटनाओं को अंजाम देने के लिए होती है मलिट्री
इसके साथ ही बड़ी घटनाओं को अंजाम देने के लिए जब कंपनी या माओवादी मलिट्री के लोग आते हैं तो उनके लिए रास्ता क्लीयर करना, खुफिया का काम करना। एलओएस का काम होता है। कंपनी के माओवादी हैवी हथियार एके-47 आदि से लैस होते हैं। हर जिले में एक मलिट्री कंपनी होती है, जो आवश्यकता पड़ने पर बड़ी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए निकलती है और इनका मार्गदर्शन एलओएस करते हैं।
एलओएस अर्थात थाने में न्यूनत संख्या होती थी 12
जब एलओएस में माओवादियों की संख्या 12 से कम हो जाती है तो उस एलओएस को तोड़ दिया जाता है। वैसे अब तो अधिकांश एलओएस में चार से पांच तक ही माओवादियों की संख्या रह गयी है। तीन या चार थानों के ऊपर एसडीओपी अथवा सीओ होता है। वह राज्य लोक सेवा आयोग से आया हुआ अधिकारी होता है। वैसे ही तीन या चार एलओएस को मिलाकर एरिया कमेटी बनती है।
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एसडीओपी रैंक का अधिकारी होता है सचिव
इसके एसडीओपी रैंक के अधिकारी को सचिव कहते हैं। यह अपने अधीन सभी एलओएस पर नजर रखता है। एरिया कमांडर के अंडर में रहने वाले हार्डकोर माओवादियों के पास उच्च स्तर के हथियार होते हैं। मध्यम श्रेणी की घटनाओं (छोटी-मोटी आगजनी की घटनाएं, एक-दो मर्डर के मामले आदि) को अंजाम देने के लिए ये एलओएस के क्षेत्र में जाते हैं। एरिया कमांडर की सुरक्षा व्यवस्था भी अच्छी होती है। उनके साथ एक-47 होल्डर आठ से दस माओवादी साथ चलते हैं।
एस.पी. रैंक का अधिकारी होता है डिविजनल सचिव
इसके बाद जिला रैंक का एक डिविजन होता है। इसका एसपी रैंक का एक अधिकारी, जिसके अधिकारी को डिविजनल सचिव कहते हैं। यह जिला स्तरीय अधिकारी होता है। इसकी सुरक्षा के लिए 35 से 45 तक ए के 47 होल्डर सुरक्षा गार्ड होते थे, जो अब तीन से चार तक सीमित हो गया है। यह कई भाषाओं का ज्ञाता भी होता है।
एरिया कमांडर के लिए अनिवार्य योग्यता है तीन भाषाओं का ज्ञान
एरिया कमांडर या उससे ऊपर के अधिकारियों के लिए भी स्थानीय भाषा के साथ ही अंग्रेजी और हिंदी का अच्छा ज्ञाता होना जरूरी है। उच्चाधिकारी अधिकांशत: तेलंगाना के ही हैं। इसके बावजूद ये लोग अच्छी तरह से स्थानीय भाषाओं को बोल लेते हैं, जिससे वहां के स्थानीय लोगों में घुलमिल जाते हैं। फरमान भी अधिकांशत: वहीं से जारी होते हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र में तेलंगाना से जारी आदेशों को सिर्फ लागू कराया जाता है।
दंडकारंय समिति में अधिकांश उच्च पदाधिकारी तेलंगाना के
दंडकारंय समिति में भी अधिकांश लोग तेलंगाना के हैं, क्योंकि छत्तीसगढ़ के माओवादियों को निम्न सोच का माना जाता है। इन्हें नीचे स्तर पर ही रखा जाता है। डिविजनल के ऊपर जोनल कमेटी है, जिसमें 20 से 23 लोग होते हैं। इसका भी एक सचिव होता है, जो डीआईजी रैंक का होता है। इसके बाद केंद्रीय कमेटी होती है, जो महत्वपूर्ण निर्णयों और पूरे साल के काम का खाका खींचती है।
सबसे मजबूत माना जाता है दंडकारंय समिति को
माओवादियों के सात प्रदेशों में सबसे मजबूत दंडकारंय समिति को ही माना जाता रहा है। यहां पर सभी माओवादियों के उच्च पदाधिकारियों की निगाहें हमेशा से रही है। यहां वसूली का मुख्य साधन तेंदू पत्ता है। एक बार सरकार ने जब हितग्राहियों के खाते में तेंदू पत्ता का पैसा डालने का फैसला किया तो माओवादियों की सह पर ही बस्तर संभाग में आदिवासी समाज ने जबरदस्त प्रदर्शन कर दिया।
सामान्य प्रशासन का काम देखता है जनताना सरकार
सामान्य प्रशासन का काम जनताना सरकार देखती है। उत्तर बस्तर यानि माओवादियों के हिसाब से दंडकारण्य वन क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों का प्रशासन देखने लिए इसका गठन 2004 में किया गया था। इसका काम माओवादी विचारधारा का प्रचार प्रमुख, विवाद का सलटाना, हार्डकोर माओवादियों और सामान्य जन के बीच पुल का काम करना होता है।
प्रचार का काम माझा पार्टी के जिम्मा
माझा पार्टी माओवादियों की विचारधारा का प्रचार करने के लिए गठित की गयी, जो गांवों में जाकर लोकगीत के माध्यम से अपनी विचारधारा का प्रचार करती है। यह जनताना सरकार के अंडर में काम करती है। गांव के बाहर माझा पार्टी जाती थी और गांव के लोग वहां इकट्ठा हो जाते थे। वहां गीत गाये जाते और माओवादी विचारधारा का प्रचार होता।
2018 के बाद से ही भर्ती है बंद
पहले माओवादियों का इतना दबदबा हुआ करता था, कि हर परिवार से एक व्यक्ति को माओवादी बनाने के लिए उठा ले जाते थे। कोई कुछ नहीं कह सकता था। यदि कोई चाहे तो इसके बदले उसे प्रति वर्ष चंदा देना पड़ता था, लेकिन 2018 के बाद से ही माओवादियों के कैंप में भर्ती लगभग बंद हो गयी है।



