नई दिल्ली: हमारी नदियों को साफ और जीवित रखने के लिए अब तक हम केवल बड़े-बड़े सीवरेज नेटवर्क और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) जैसी भारी-भरकम मशीनों पर निर्भर थे। लेकिन क्या सिर्फ कंक्रीट और बिजली से चलने वाली मशीनें हमारी नदियों को पूरी तरह स्वस्थ बना सकती हैं? जवाब है—नहीं। नदियों के पुनरुद्धार के लिए एक ऐसे दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो आधुनिक इंजीनियरिंग और प्रकृति दोनों को एक साथ लाए।
इसी सोच के साथ, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) ने अपनी रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है। मिशन अब प्रदूषण नियंत्रण के साथ-साथ नदियों के पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) को सुधारने और उनके प्राकृतिक प्रवाह (E-Flows) को बनाए रखने के लिए प्रकृति आधारित समाधान (Nature-based Solutions – NbS) को मुख्यधारा में शामिल कर रहा है।
इतिहास और वर्तमान रुख: एक तुलनात्मक विश्लेषण
नदियों की सफाई के इतिहास को देखें, तो भारत और वैश्विक स्तर पर तकनीकों में भारी बदलाव आया है:
| पैमाना | पारंपरिक इतिहास (Conventional Approach) | वर्तमान रुख (Current Trend – NbS) |
| मुख्य तकनीक | केवल कंक्रीट के बड़े STP और बिजली से चलने वाली मशीनें। | पारंपरिक STP के साथ-साथ ‘कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड’ और पौधों का उपयोग। |
| ऊर्जा की खपत | अत्यधिक बिजली और भारी ईंधन की आवश्यकता। | बेहद कम ऊर्जा (Low-energy) और सौर या प्राकृतिक बहाव पर आधारित। |
| रखरखाव खर्च | मशीनों की टूट-फूट और केमिकल के कारण भारी सालाना खर्च। | नाममात्र का खर्च, क्योंकि पौधे और पत्थर खुद काम करते हैं। |
| अतिरिक्त लाभ | केवल पानी साफ होता है, आसपास जैव-विविधता नहीं पनपती। | चिड़ियों, तितलियों और स्थानीय पौधों के लिए नया आशियाना बनता है। |
दो नए पायलट प्रोजेक्ट: दिल्ली के नालों का प्राकृतिक इलाज
NMCG ने ‘सस्टेनेबल रिवर रिजुवेनेशन’ (SRR) कार्यक्रम के तहत दिल्ली में यमुना नदी में गिरने वाले दो बड़े नालों को साफ करने के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं:
- शास्त्री पार्क नाला (Shastri Park Drain)
- कैलाश नगर नाला (Kailash Nagar Drain)
इन दोनों नालों की कुल उपचार क्षमता लगभग 10 MLD (मिलियन लीटर प्रतिदिन) है। ये प्रोजेक्ट पूरी तरह से ‘कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड्स’ (यानी कृत्रिम रूप से विकसित किए गए दलदल) पर आधारित हैं। यह प्रणाली किसी कारखाने की तरह नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक जंगल या झील की तरह काम करती है।
यह कैसे काम करता है? (आसान भाषा में)
- पत्थरों की दीवारें (Stone Masonry): सबसे पहले पानी की गति को धीमा करने और उसे रोकने के लिए पत्थरों के ढांचे बनाए जाते हैं।
- रॉक फिल्टर्स (Rock Filters): बड़े और छोटे पत्थरों की परतों से पानी को गुजारा जाता है, जिससे उसमें तैरने वाला कचरा और मिट्टी छन जाती है।
- जलीय वनस्पति (Aquatic Vegetation): खास तरह के जलीय पौधे पानी में घुले हानिकारक तत्वों (जैसे नाइट्रोजन और फास्फोरस) को भोजन के रूप में सोख लेते हैं।
- फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremediation): कुछ विशेष प्रजाति के पौधे पानी से जहरीली भारी धातुओं (Heavy Metals) को अवशोषित कर लेते हैं और उन्हें निष्क्रिय बना देते हैं।
इससे पानी में ऑक्सीजन का स्तर (Dissolved Oxygen) बढ़ता है और जैविक प्रदूषण कम होता है।
जमीनी स्तर पर क्या काम हुआ?
दोनों ही साइटों पर काम तेजी से चल रहा है:
- कैलाश नगर नाला: यहाँ साइट को साफ करने, कीचड़ निकालने (Desludging) और गाद हटाने (Desilting) का काम पूरा हो चुका है। वर्तमान में ईंटों की लाइनिंग का काम चल रहा है, जिसके बाद पत्थरों के फिल्टर लगाए जाएंगे।
- शास्त्री पार्क नाला: यहाँ शुरुआती सफाई और कीचड़ निकालने का काम प्रगति पर है। इसके बाद पत्थरों के ढांचे और औषधीय पौधे लगाने का काम शुरू होगा।
खतौली में काली नदी का पुनरुद्धार
NMCG इस प्रयोग को केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रख रहा है। उत्तर प्रदेश के खतौली में काली नदी (जो गंगा की एक सहायक नदी है और जिसमें भारी मात्रा में घरेलू और फैक्ट्रियों का गंदा पानी गिरता है) को साफ करने के लिए भी एक ‘कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड’ प्रोजेक्ट लागू किया गया है। इसका उद्देश्य नदी के प्रदूषित पानी को गंगा में मिलने से पहले ही, उसके स्रोत के पास ही प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं से साफ करना है।
अधिकारियों के लिए ट्रेनिंग और क्षमता निर्माण
प्रकृति आधारित समाधानों को जमीन पर उतारने के लिए कुशल इंजीनियरों और विशेषज्ञों की जरूरत होती है। इसके लिए NMCG ने अपने नॉलेज शेयरिंग एंड डेवलपमेंट सेंटर (KSDC) के माध्यम से अगस्त 2025 से मार्च 2026 के बीच 6 बड़े ट्रेनिंग प्रोग्राम आयोजित किए।
इन कार्यक्रमों में 100 से अधिक अधिकारियों को प्रशिक्षित किया गया, जिनमें शामिल थे:
- यमुना टास्क फोर्स के इंजीनियर
- उत्तराखंड की जिला गंगा समितियां (DGC)
- राज्य स्वच्छ गंगा मिशन (SMCGs) के अधिकारी
- वन विभाग और सिंचाई विभाग के प्रतिनिधि
इस ट्रेनिंग का मुख्य उद्देश्य अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच आपसी तालमेल बढ़ाना था ताकि भविष्य में पूरे गंगा बेसिन में ऐसे इको-फ्रेंडली मॉडल खुद से बनाए जा सकें।
NMCG का यह कदम यह साबित करता है कि नदियों को साफ करने के लिए हमें प्रकृति के खिलाफ जाकर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मिलकर काम करना होगा।



