नई दिल्ली: भारत सरकार ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में परमाणु, क्रिटिकल और रणनीतिक खनिजों की खनन परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी के लिए जनसुनवाई की अनिवार्यता से छूट दे दी है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 8 सितंबर 2025 को जारी अपने नए कार्यालय ज्ञापन (ओएम) में यह घोषणा की। मंत्रालय का कहना है कि ये परियोजनाएं राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ी हैं, इसलिए इन्हें तेजी से मंजूरी देने की जरूरत है। इस फैसले से देश की ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में प्रगति को गति मिलने की उम्मीद है, लेकिन पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
नई नीति का आधार और खनिजों की परिभाषा
खनिज और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2023 के तहत परमाणु और रणनीतिक खनिजों की श्रेणियों को फिर से परिभाषित किया गया है। इस अधिनियम की पहली अनुसूची के भाग-बी में परमाणु खनिजों जैसे यूरेनियम, थोरियम, मोनाजाइट, पिचब्लेंड, इल्मेनाइट, रूटाइल, जिरकॉन और सिलिमेनाइट को शामिल किया गया है। वहीं, भाग-डी में 24 क्रिटिकल और रणनीतिक खनिजों की सूची है, जिनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट, रेयर अर्थ तत्व (यूरेनियम और थोरियम को छोड़कर), टंग्स्टन, टाइटेनियम, वैनाडियम, पोटाश, फॉस्फेट, गैलियम, इंडियम, मोलिब्डेनम, नियोबियम, सेलेनियम, टेल्यूरियम, रेनियम, प्लेटिनम समूह के तत्व, बेरिलियम, कैडमियम, टिन और जिरकोनियम शामिल हैं। ये खनिज भारत की भविष्य की ऊर्जा, रक्षा और हाई-टेक उद्योगों के लिए रीढ़ की हड्डी माने जा रहे हैं।
जनसुनवाई से छूट का कारण
पर्यावरण मंत्रालय ने अपने ताजा ओएम में बताया कि यह छूट रक्षा मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अनुरोध पर दी गई है। रक्षा मंत्रालय ने 4 अगस्त 2025 को एक प्रस्ताव में कहा कि रेयर अर्थ तत्व (आरईई) का उपयोग रक्षा क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। ये तत्व रडार, सोनार, लेजर, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, प्रिसीजन-गाइडेड हथियार और स्थायी चुंबकों के निर्माण में जरूरी हैं। भारत में इन खनिजों का भंडार सीमित है और वैश्विक आपूर्ति जोखिम भरी है, इसलिए इन्हें रणनीतिक संसाधन मानते हुए जनसुनवाई से छूट देने की मांग की गई। इसी तरह, परमाणु ऊर्जा विभाग ने 29 अगस्त 2025 को पत्र लिखकर बताया कि बीच सैंड खनिजों से प्राप्त थोरियम परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे चरण के लिए महत्त्वपूर्ण है, जबकि यूरेनियम पहले चरण के लिए जरूरी है। विभाग ने देश में इन खनिजों के नए भंडारों का तेजी से दोहन करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के तहत जनसुनवाई से छूट की मांग की गई।
ईआईए 2006 और जनसुनवाई का महत्त्व
पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिनियम, 2006 विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए बनाया गया था। इसके तहत परियोजनाओं को स्क्रीनिंग, स्कोपिंग और जनसुनवाई जैसी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। जनसुनवाई इस प्रक्रिया का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें स्थानीय समुदायों और हितधारकों की राय ली जाती है। यह सुनिश्चित करता है कि परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों की चिंताओं को सुना जाए और परियोजना प्रस्ताव में शामिल किया जाए। हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ी परियोजनाओं को पहले भी इस प्रक्रिया से छूट दी जाती रही है। अब परमाणु, क्रिटिकल और रणनीतिक खनिजों की खनन परियोजनाओं को भी इसी श्रेणी में शामिल कर लिया गया है।
तेजी से मंजूरी के लिए पुरानी व्यवस्था
मंत्रालय ने 13 मार्च 2025 को एक और ओएम जारी किया था, जिसमें क्रिटिकल और रणनीतिक खनिजों की परियोजनाओं को “आउट ऑफ टर्न” यानी प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी देने की व्यवस्था की गई थी। इसका उद्देश्य रक्षा, हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, परिवहन और भारत की ‘नेट जीरो’ 2070 की प्रतिबद्धता जैसे क्षेत्रों में प्रगति को गति देना है। नए ओएम में यह भी स्पष्ट किया गया कि इन परियोजनाओं की समीक्षा केंद्रीय स्तर पर होगी, चाहे खनन क्षेत्र का आकार कुछ भी हो।
पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव पर ध्यान
हालांकि जनसुनवाई से छूट दी गई है, लेकिन मंत्रालय ने कहा कि इन परियोजनाओं की पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) और पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) रिपोर्ट में स्थानीय समुदायों पर प्रभाव, सामाजिक ढांचे (जैसे स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा), रोजगार के अवसर और शिकायत निवारण तंत्र जैसे बिंदुओं को शामिल करना अनिवार्य होगा। विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति इनकी गहन समीक्षा करेगी और उपयुक्त पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार की जाएगी। परियोजना प्रस्तावकों को इन योजनाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय और अन्य संसाधन उपलब्ध कराने होंगे।
भविष्य की राह और चुनौतियां
यह फैसला भारत की रणनीतिक और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक बड़ा कदम है। क्रिटिकल और रणनीतिक खनिजों की उपलब्धता हाई-टेक उद्योगों, रक्षा उपकरणों और स्वच्छ ऊर्जा के लिए जरूरी है। हालांकि, जनसुनवाई से छूट देने का निर्णय पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों को लेकर बहस छेड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं को तेजी से लागू करने के साथ-साथ पारदर्शिता और सामाजिक जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।



