नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ हिमखंडों के पिघलने या तापमान बढ़ने की कहानी नहीं रह गया है। यह महासागरों के सबसे ताकतवर शिकारी शार्क तक पहुंच चुका है। हाल ही में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय शोध ने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया है। अध्ययन में पाया गया है कि बढ़ती समुद्री अम्लता (Ocean Acidification) शार्क के दांतों की मजबूती और संरचना को नुकसान पहुंचा रही है। यानी आने वाले समय में समुद्र की सबसे खतरनाक मानी जाने वाली यह मछली अपने ही हथियार तेज धार वाले दांतों से वंचित हो सकती है।
समुद्र क्यों हो रहे हैं खट्टे?
धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और इंसानों द्वारा छोड़ी जा रही कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) गैस का बड़ा हिस्सा समुद्र सोख लेता है। जब यह गैस पानी में घुलती है तो कार्बोनिक एसिड बनाती है, जिससे समुद्र का pH स्तर गिर जाता है। सामान्य तौर पर समुद्र का pH लगभग 8.1 होता है, जो हल्का क्षारीय होता है, लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि साल 2300 तक यह 7.3 तक गिर सकता है, यानी आज से करीब 10 गुना ज्यादा अम्लीय स्थिति। यह प्रक्रिया पहले शंख, सीप और प्रवाल जैसी प्रजातियों के लिए नुकसानदेह मानी जाती थी, क्योंकि उनके खोल कैल्शियम कार्बोनेट से बने होते हैं। लेकिन अब खतरा शार्क जैसे फॉस्फेट खनिज आधारित जीवों तक पहुँच गया है।
दांतों पर दिखा जलवायु संकट का असर
जर्मनी की हेनरिक हाइने यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने ब्लैकटिप रीफ शार्क पर प्रयोग करते हुए यह पता लगाया कि अम्लीय पानी उनके दांतों को धीरे-धीरे खा जाता है। टीम ने एक्वेरियम से एकत्र किए गए 600 से अधिक गिरे हुए शार्क दांतों को दो अलग-अलग पानी के टैंकों में रखा। एक टैंक में पानी का pH 8.2 (वर्तमान स्थिति) था और दूसरे में 7.3 (भविष्य की अनुमानित स्थिति)।
कुछ हफ्तों बाद नतीजे चौंकाने वाले थे
- अम्लीय पानी में रखे दांतों की सतह पर दरारें, छिद्र और टूट-फूट दिखी।
- दांतों की धार और नोकें घिस गईं।
- माइक्रोस्कोप से देखने पर पाया गया कि दांतों का बाहरी आवरण खुरदरा और कमजोर हो गया है।
- दिलचस्प बात यह रही कि दांत थोड़े “बड़े” दिखाई दिए, लेकिन यह वास्तविक फैलाव नहीं था। बल्कि सतह पर बनी अनियमितताओं की वजह से ऐसा प्रतीत हो रहा था।
शार्क के लिए बढ़ता खतरा
पहली नजर में लग सकता है कि अधिक खुरदरे या दांतेदार दांत शिकार पकड़ने में मदद करेंगे, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह गलतफहमी है। कमजोर दांत जल्दी टूट जाते हैं, और अगर हर बार उगने वाले नए दांत भी इसी तरह कमजोर हों, तो शार्क की शिकारी क्षमता घट जाएगी। नतीजा शिकार पकड़ने में मुश्किल, ऊर्जा की कमी और अंततः जीवित रहने की चुनौती। शोधों से यह भी पता चला है कि समुद्री अम्लता शार्क के अंडों के फूटने की दर और घ्राण शक्ति (सूंघने की क्षमता) को भी प्रभावित कर सकती है। इससे वे शिकार की गंध पहचानने में भी असमर्थ हो सकती हैं।
पारिस्थितिकी पर खतरा
शार्क सिर्फ डरावनी शिकारी नहीं हैं। वे समुद्र के पारिस्थितिक संतुलन की रखवाली करती हैं। वे कमजोर और बीमार मछलियों को खाकर समुद्री जीवन की गुणवत्ता बनाए रखती हैं। अगर शार्क कमजोर पड़ गईं, तो पूरी खाद्य श्रृंखला प्रभावित होगी। प्रवाल भित्तियां, छोटी मछलियां और अंततः इंसानों की आजीविका पर असर पड़ेगा।
समाधान: कृत्रिम दांत नहीं, कार्बन नियंत्रण
वैज्ञानिक मजाक में कहते हैं, “शायद भविष्य में शार्क को डेंचर (कृत्रिम दांत) की जरूरत पड़े।” लेकिन असली समाधान तकनीकी नहीं, पर्यावरणीय है। हमें कार्बन उत्सर्जन घटाना होगा, महासागरों को प्रदूषण से बचाना होगा और जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से लेना होगा।



