नई दिल्ली: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने जलवायु परिवर्तन के बीच एक अहम खुलासा किया है। सितंबर 2025 से ला नीना (LA Nina) की वापसी की संभावना है, जो आमतौर पर समुद्र और वातावरण में ठंडक लाती है। लेकिन इस बार डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में चौंकाने वाली बात सामने आई है कि इसके बावजूद वैश्विक तापमान सामान्य से अधिक रहेगा। यह खबर मौसम, कृषि, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन के लिए बड़े बदलावों की ओर इशारा करती है।
एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) की मौजूदा स्थिति
मार्च 2025 से प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्री सतह का तापमान सामान्य स्तर पर बना हुआ है, जिसे ENSO की तटस्थ स्थिति कहा जाता है। इस दौरान न तो एल नीनो और न ही ला नीना का प्रभाव हावी रहा। लेकिन डब्ल्यूएमओ का ताजा अनुमान बताता है कि सितंबर से नवंबर 2025 के बीच ला नीना बनने की 55% संभावना है, जबकि तटस्थ स्थिति बने रहने की 45% संभावना है। अक्टूबर से दिसंबर तक ला नीना की संभावना बढ़कर 60% हो जाएगी, और एल नीनो का बनना लगभग नामुमकिन होगा।
ला नीना का मतलब और इसका प्रभाव
ला नीना एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्री सतह का तापमान सामान्य से नीचे चला जाता है। इसके साथ हवाओं का रुख, वायुमंडलीय दबाव और वर्षा के पैटर्न में बदलाव आता है। ला नीना और एल नीनो के प्रभाव आमतौर पर एक-दूसरे के विपरीत होते हैं:
एल नीनो: समुद्र का तापमान बढ़ता है, जिससे कई इलाकों में गर्मी और सूखा पड़ता है।
ला नीना: समुद्र का तापमान घटता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़, तो कहीं कम वर्षा और सूखे की स्थिति बनती है।
तापमान और वर्षा पर असर
डब्ल्यूएमओ की ग्लोबल सीजनल क्लाइमेट अपडेट के अनुसार, सितंबर से नवंबर 2025 तक उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से ज्यादा रहेगा। बारिश का पैटर्न मध्यम स्तर की ला नीना जैसी स्थिति दर्शाएगा। इसका मतलब है कि कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ेगा, जबकि अन्य इलाकों में कम बारिश के कारण सूखा पड़ सकता है। खासकर भारत जैसे देशों में मानसून के पैटर्न पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
क्यों जरूरी हैं ये पूर्वानुमान?
ला नीना और एल नीनो जैसे मौसमी चक्र सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं हैं। इनका प्रभाव खेती, ऊर्जा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसे क्षेत्रों पर पड़ता है। डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्ट साओलो ने कहा कि सटीक मौसमी पूर्वानुमान आपदाओं से निपटने और संसाधनों के प्रबंधन में मदद करते हैं।
- कृषि: किसान फसल चयन, बुआई और सिंचाई की बेहतर योजना बना सकते हैं।
- ऊर्जा: बिजली उत्पादन और खपत को संतुलित करने में सहायता मिलती है।
- स्वास्थ्य: गर्मी, बाढ़ या सूखे से होने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए पहले से तैयारी हो सकती है।
- आपदा प्रबंधन: बाढ़, तूफान या सूखे से निपटने के लिए रणनीति बनाई जा सकती है।
जलवायु परिवर्तन का बढ़ता दबाव
ला नीना और एल नीनो प्राकृतिक घटनाएं हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इनके असर को और जटिल बना दिया है। वैश्विक तापमान में लगातार वृद्धि के कारण चरम मौसमी घटनाएं जैसे बाढ़, सूखा और हीटवेव अब पहले से ज्यादा तीव्र और बार-बार हो रही हैं। डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में नॉर्थ अटलांटिक ऑसिलेशन और इंडियन ओशन डाइपोल जैसे अन्य जलवायु कारकों को भी ध्यान में रखा गया है, जो मौसम के पैटर्न को प्रभावित करते हैं। इन सभी का संयुक्त विश्लेषण सटीक और क्षेत्रीय स्तर पर उपयोगी पूर्वानुमान देता है।
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क्या है आगे का रास्ता?
सितंबर से नवंबर 2025 तक वैश्विक तापमान सामान्य से ऊपर रहेगा, और बारिश का पैटर्न मध्यम ला नीना जैसी स्थिति दिखाएगा। अक्टूबर से दिसंबर तक ला नीना का प्रभाव और मजबूत होगा, जिससे कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़, तो कहीं सूखे की स्थिति बन सकती है। भारत जैसे देशों को मानसून की अनिश्चितताओं और बाढ़-सूखे के जोखिम से निपटने के लिए पहले से तैयारी करनी होगी।




