भारत की बढ़ी ताकत: नई पिनाका तकनीक से दुश्मन थर-थर कांपेगा

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 8 जुलाई, 2026 को ओडिशा के चांदीपुर से 'लंबी दूरी के निर्देशित पिनाका रॉकेट' (LRGR Pinaka) का सफल परीक्षण किया। इसने 60 किलोमीटर की न्यूनतम मारक क्षमता के मानकों को पूरा करते हुए अपने लक्ष्य पर सटीक निशाना साधा।

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चांदीपुर (ओडिशा): भारत ने रक्षा के क्षेत्र में एक और बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है। भारतीय सेना के बेड़े में शामिल ‘पिनाका रॉकेट’ अब पहले से कहीं ज्यादा घातक और लंबी दूरी तक मार करने वाला बन गया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 8 जुलाई, 2026 को ओडिशा के चांदीपुर में स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) से इस लंबी दूरी के निर्देशित रॉकेट (LRGR – Long Range Guided Rocket) पिनाका का सफल उड़ान परीक्षण किया।

इस परीक्षण की सबसे खास बात यह रही कि रॉकेट ने सेना द्वारा तय किए गए 60 किलोमीटर की न्यूनतम मारक क्षमता (Minimum Range) के कड़े मानकों को पूरा करते हुए सीधे और सटीक निशाने पर वार किया। आइए इस ब्लॉग में आसान भाषा में समझते हैं कि यह परीक्षण भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है और पिनाका का इतिहास क्या रहा है।

उड़ान पथ का किया पूरी सटीकता से पालन

परीक्षण के दौरान इस नए पिनाका रॉकेट ने पहले से तय किए गए रास्ते (उड़ान पथ) का पूरी सटीकता के साथ पालन किया। इसने हवा में किसी भी तरह के भटकाव के बिना अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेद दिया। चांदीपुर रेंज में तैनात अत्याधुनिक ट्रैकिंग उपकरणों (जैसे रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सिस्टम और टेलीमेट्री) ने उड़ान भरने से लेकर लक्ष्य पर टकराने तक, रॉकेट की हर सेकंड की गतिविधि पर पूरी नजर रखी और इसके सारे आंकड़े दर्ज किए।

डीआरडीओ की इन प्रयोगशालाओं ने मिलकर किया विकास

इस स्वदेशी और आधुनिक रॉकेट को तैयार करने के पीछे देश के वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत है। इस लंबी दूरी के निर्देशित पिनाका रॉकेट का डिजाइन और विकास मुख्य रूप से डीआरडीओ की पुणे स्थित प्रयोगशाला आयुध अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (ARDE) ने किया है। इसमें उच्च ऊर्जा सामग्री अनुसंधान प्रयोगशाला (HEMRL) ने भी सहयोग दिया है। इसके अलावा, हैदराबाद की दो प्रमुख प्रयोगशालाओं—रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (DRDL) और अनुसंधान केंद्र इमारत (RCI) ने भी इस रॉकेट को आधुनिक गाइडेंस (दिशा-निर्देशन) तकनीक देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पुराने लॉन्चर से ही हुआ नया धमाका

इस परीक्षण की एक और बड़ी खूबी यह रही कि इस नए और लंबी दूरी के रॉकेट को दागने के लिए किसी नए ट्रक या लॉन्चर की जरूरत नहीं पड़ी। इसे भारतीय सेना में पहले से सेवा दे रहे मौजूदा पिनाका लॉन्चर से ही दागा गया।

फायदा क्या होगा? इससे यह साबित हो गया कि भारत के पास जो पुराने पिनाका लॉन्चर मौजूद हैं, उन्हीं से हम कम दूरी के साधारण रॉकेट भी दाग सकते हैं और जरूरत पड़ने पर नई तकनीक वाले लंबी दूरी के निर्देशित रॉकेट भी छोड़ सकते हैं। यानी हमें लॉन्चर बदलने पर अलग से भारी-भरकम खर्च नहीं करना पड़ेगा।

पिनाका का इतिहास: कारगिल युद्ध का वो हीरो जिससे पाकिस्तान कांप उठा था

पिनाका का नाम भगवान शिव के धनुष ‘पिनाक’ के नाम पर रखा गया है। इसका विकास 1980 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुआ था, क्योंकि भारत को रूस के ‘ग्राड’ (Grad) रॉकेट सिस्टम से भी बेहतर और स्वदेशी तकनीक की जरूरत थी।

  • कारगिल युद्ध (1999) में पहली परीक्षा: पिनाका का असली जलवा 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान देखने को मिला। उस समय इसके शुरुआती संस्करण (पिनाका मार्क-1) का इस्तेमाल पहाड़ों पर बैठे पाकिस्तानी दुश्मनों के बंकरों को तबाह करने के लिए किया गया था। पिनाका ने इतनी तेजी और सटीकता से दुश्मन के ठिकानों पर रॉकेटों की बारिश की थी कि पाकिस्तानी सेना के पैर उखड़ गए थे। इसके बाद साल 2000 के दशक में इसे आधिकारिक रूप से सेना में शामिल कर लिया गया।

तुलनात्मक विश्लेषण: पुराना पिनाका बनाम नया निर्देशित पिनाका (LRGR)

समय के साथ युद्ध के तरीके बदल गए हैं। पहले के पिनाका और आज के इस नए पिनाका में क्या अंतर है, इसे हम नीचे दी गई तालिका से आसानी से समझ सकते हैं:

विशेषता (Features)पुराना पिनाका (Pinaka Mk-1)नया लंबी दूरी का निर्देशित पिनाका (LRGR)
प्रकार (Type)अनगाइडेड (हवा में दागे जाने के बाद दिशा नहीं बदली जा सकती)गाइडेड (हवा में भी कंप्यूटर और सैटेलाइट से रास्ता सुधारा जा सकता है)
न्यूनतम दूरी (Min Range)लगभग 20-38 किलोमीटर60 किलोमीटर (न्यूनतम मारक क्षमता)
अधिकतम दूरी (Max Range)40 किलोमीटर तक120 किलोमीटर से भी ज्यादा (संभावित)
सटीकता (Accuracy)कम सटीक (एक बड़े इलाके को तबाह करने के लिए)अत्यधिक सटीक (पिन-पॉइंट एक छोटे बंकर या गाड़ी पर भी निशाना संभव)

वर्तमान रुझान (Current Trends) और रक्षा क्षेत्र में इसका महत्व

आजकल की आधुनिक लड़ाइयों में केवल दूर तक रॉकेट दागना काफी नहीं है, बल्कि रॉकेट का सटीक (Accurate) होना सबसे जरूरी है ताकि आम नागरिकों को नुकसान न हो और दुश्मन का मुख्य ठिकाना एक ही बार में नष्ट हो जाए। इसी को ‘गाइडेड वेपन ट्रेंड’ कहते हैं।

आज का यह सफल परीक्षण दिखाता है कि भारत अब विदेशी तकनीकों पर निर्भर नहीं है। हम खुद अपने पुराने हथियारों को डिजिटल और गाइडेड तकनीक से जोड़कर उन्हें दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों के बराबर ला रहे हैं। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ और रक्षा क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।

देश के नेतृत्व ने दी बधाई और थपथपाई पीठ

इस शानदार कामयाबी पर देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ, भारतीय सेना और इस प्रोजेक्ट से जुड़े निजी व सरकारी उद्योगों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह परीक्षण लंबी दूरी के निर्देशित रॉकेटों के स्वदेशी डिजाइन और विकास की दिशा में भारत की एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

वहीं, रक्षा सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने खुद चांदीपुर में मौजूद रहकर इन परीक्षणों की निगरानी की। उन्होंने देश के वैज्ञानिकों की इस अद्भुत सफलता के लिए पूरी टीम की सराहना की और उनका हौसला बढ़ाया।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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