नई दिल्ली: क्या आपने कभी सोचा है कि रसोईघर में ब्रेड फूलाने या बीयर बनाने वाली वो साधारण यीस्ट, यानी खमीर, एक दिन दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश में मददगार साबित हो जाएगी? हां, बिल्कुल सही सुना आपने। भारतीय वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक ऐसी क्रांतिकारी खोज की है, जो बताती है कि ये आम खमीर मंगल ग्रह जैसी बेहद उग्र और जहरीली स्थितियों में भी जिंदा रह सकता है, ये खोज न सिर्फ विज्ञान जगत को हिला रही है, बल्कि अंतरिक्ष यात्रा के सपनों को भी नई उड़ान दे रही है।
कहां और कैसे बनी ये अनोखी खोज?
ये रिसर्च बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के बायोकेमिस्ट्री विभाग और अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) के वैज्ञानिकों ने मिलकर की। लीड रिसर्चर ने बताया कि ये एक्सपेरिमेंट टेक्निकल चैलेंज से भरा था। कल्पना कीजिए, जीवित सेल्स को हाई-स्पीड शॉक वेव्स के बीच रखना और फिर उन्हें बिना किसी कंटेमिनेशन के वापस लाना। ये कोई आसान काम तो था नहीं, लेकिन इन वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी।
मंगल की नकल: कैसे टेस्ट किया गया?
मंगल पर उल्कापिंडों के बार-बार गिरने से धमाकेदार शॉक वेव्स बनती हैं, जो ध्वनि की स्पीड से कई गुना तेज होती हैं। ऊपर से, वहां की मिट्टी में पर्क्लोरेट नाम का जहरीला केमिकल भरा पड़ा है, जो ज्यादातर जीवों को तुरंत खत्म कर देता। इन्हीं हालातों को लैब में दोहराने के लिए वैज्ञानिकों ने PRL में तैयार हाई-इंटेंसिटी शॉक ट्यूब (HIST) का सहारा लिया। इस मशीन ने शॉक वेव्स को 5.6 गुना ध्वनि गति पर रिलीज किया। फिर, सैकरोमाइसीज सेरेविसिया यानी हमारी बेकरी यीस्ट को 100 मिलीमोलर सोडियम पर्क्लोरेट सॉल्यूशन में भिगोया गया। टेस्ट तीन तरह के थे:
- सिर्फ शॉक वेव्स।
- सिर्फ पर्क्लोरेट का जहर।
- दोनों का कॉम्बो।
रिजल्ट्स जो हैरान कर दें
परिणाम तो जैसे साइंस फिक्शन मूवी का ट्विस्ट लगे। इतनी खतरनाक कंडीशंस में भी यीस्ट की सेल्स न सिर्फ बचीं, बल्कि ग्रोथ रेट थोड़ी कम होने के बावजूद वे फलती-फूलती रहीं। राज था यीस्ट का ‘सेल्फ-डिफेंस मोड’ जब स्ट्रेस बढ़ता है, तो सेल्स अंदर खास राइबोन्यूक्लियोप्रोटीन कंडेंसेट्स (RNP) बना लेती हैं। ये बिना झिल्ली वाले छोटे-छोटे स्ट्रक्चर्स RNA और प्रोटीन्स को रीऑर्गनाइज करके नुकसान से बचाते हैं। PNAS Nexus जर्नल में छपी स्टडी के मुताबिक, शॉक वेव्स से ‘स्ट्रेस ग्रैन्यूल्स’ और ‘P बॉडीज’ दोनों तरह के RNP बने, जबकि पर्क्लोरेट से सिर्फ P बॉडीज। जब वैज्ञानिकों ने म्यूटेंट यीस्ट (जो RNP नहीं बना पाती) को टेस्ट किया, तो वो झट से खत्म हो गई। ये साबित करता है कि RNP ही सर्वाइवल का सीक्रेट हैं। भविष्य में इन्हें ‘स्ट्रेस बायोमार्कर्स’ के तौर पर यूज किया जा सकता है – मतलब, ये बताएंगे कि कोई ऑर्गेनिज्म एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल स्ट्रेस झेल रहा है या नहीं।
क्यों है ये खोज गेम-चेंजर?
ये स्टडी खास इसलिए क्योंकि ये शॉक फिजिक्स, केमिकल बायोलॉजी और मॉलिक्यूलर सेल बायोलॉजी को एक छतरी तले लाती है। पहली बार लिविंग सेल्स को रीयल-टाइम शॉक वेव्स में रखकर उनका बायोलॉजिकल एनालिसिस किया गया। अगर पृथ्वी का इतना सिंपल ऑर्गेनिज्म मंगल जैसा तूफान झेल सकता है, तो सोचिए, दूसरे प्लैनेट्स पर माइक्रोब्स की लाइफ पॉसिबल हो सकती है। ये एस्ट्रोबायोलॉजी को नया मोमेंटम देती है।
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भारत का वैभव: ग्लोबल स्टेज पर नया धमाल
ये अचीवमेंट भारत के लिए प्राउड मोमेंट है। IISc और PRL जैसे इंस्टीट्यूट्स ने दिखा दिया कि हम एस्ट्रोबायोलॉजी में वर्ल्ड लीडर्स बन सकते हैं। सिंपल बेकरी यीस्ट को मॉडल बनाकर उन्होंने प्रूव किया कि क्रिएटिव अप्रोच से स्पेस लाइफ के राज खोले जा सकते हैं। लीड रिसर्चर ने कहा, हम हैरान थे कि यीस्ट इतनी मुश्किलों में भी जूझती रही। ये स्टडी फ्यूचर स्पेस मिशन्स में यीस्ट को फूड प्रोडक्शन के लिए ले जाने का आईडिया देगी।
आगे की राह: स्पेस फूड से लेकर एलियन लाइफ तक
इस रिसर्च से पता चलेगा कि जीव एक्सट्रीम फिजिकल-केमिकल स्ट्रेस कैसे हैंडल करते हैं। ये स्पेस बायो-सिस्टम्स डिजाइन करने में हेल्पफुल होगा। जैसे, स्पेसक्राफ्ट में फूड ग्रो करने या वेस्ट रिसाइक्लिंग के लिए बायो-टेक्नोलॉजी। कुल मिलाकर, ये हमें सिखाती है कि लाइफ की अडैप्टेबिलिटी कमाल की है। मंगल या दूसरे प्लैनेट्स पर लाइफ अब सिर्फ थ्योरी नहीं, रियलिटी लगने लगी है।



