ब्रिक्स सम्मेलन में भारतीय ग्रामीण महिला उद्यमियों का जलवा

कोच्चि में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) महिला मंत्रिस्तरीय बैठक 2026 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ग्रामीण महिलाओं द्वारा बनाए गए बेहतरीन उत्पादों की एक भव्य प्रदर्शनी लगाई है। 'सरस आजीविका गैलरी' के माध्यम से पारंपरिक कलाओं, हथकरघा और आधुनिक पैकेजिंग से सजे इन उत्पादों को दुनिया के 10 से अधिक बड़े देशों के प्रतिनिधियों के सामने प्रदर्शित किया गया, जो भारत के 10 करोड़ ग्रामीण स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की आर्थिक क्रांति को दर्शाता है।

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कोच्चि, केरल: आज हम भारत के ग्रामीण अंचलों से उठी एक ऐसी गूंज की बात कर रहे हैं जिसकी चमक आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिखाई दे रही है। केरल के खूबसूरत शहर कोच्चि में इन दिनों ब्रिक्स महिला मंत्रिस्तरीय बैठक 2026 चल रही है। इस बड़े वैश्विक मंच पर भारत ने अपने सबसे बड़े खजाने—यानी गांव की नारी शक्ति और उनके हुनर को दुनिया के सामने पेश किया है।

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी और राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर ने इस विशेष प्रदर्शनी (एग्जीबिशन) का उद्घाटन किया। ग्रामीण विकास मंत्रालय की निदेशक डॉ. मोलिश्री ने वैश्विक नेताओं को इस मंडप (पवेलियन) का भ्रमण कराया। ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इंडोनेशिया जैसे शक्तिशाली देशों के बड़े-बड़े मंत्रियों और डेलीगेट्स ने जब इन ग्रामीण महिलाओं के बनाए उत्पादों को देखा, तो वे भारतीय कारीगरी और महिला उद्यमियों के जज्बे को देखकर हैरान रह गए!

21 राज्यों की कला और सरस आजीविका का जादू

प्रदर्शनी में भारत के कोने-कोने से आई संस्कृति की झलक दिख रही है। यहां कुल 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्टॉल लगाए गए हैं। प्रवेश द्वार पर ही ‘नेशनल सरस आजीविका गैलरी’ बनाई गई है, जो यह दिखाती है कि कैसे हमारे गांवों के पारंपरिक सामान को आधुनिक डिजाइन, बेहतरीन पैकेजिंग, ब्रांडिंग और क्वालिटी चेक के जरिए ग्लोबल मार्केट के लायक बनाया गया है।

इस बार की सबसे बड़ी खासियत है ‘सरस शक्ति कलेक्शन’। यह ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए गए प्रीमियम गिफ्ट्स (उपहारों) का एक खास कलेक्शन है, जिसे अब सरकारी विभागों और बड़े-बड़े कॉर्पोरेट दफ्तरों में उपहार देने के लिए ब्रांडेड रूप में तैयार किया गया है। इससे हमारी ग्रामीण बहनों को सीधे बड़े खरीदार मिल रहे हैं।

इस प्रदर्शनी में भारत की जीती-जागती विरासत देखने को मिल रही है:

  • मधुबनी पेंटिंग्स (बिहार की विश्वप्रसिद्ध चित्रकारी)
  • डोकरा और बेल मेटल क्राफ्ट (पारंपरिक धातुकला)
  • पेन कलमकारी और फुल्कारी कढ़ाई (आंध्र प्रदेश और पंजाब का जादू)
  • टोडा कढ़ाई, कांथा वर्क और कच्छी क्राफ्ट
  • चन्नापटना के लकड़ी के खिलौने और उत्तराखंड की ऐपण कला

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (History of SHGs in India)

भारत में महिलाओं को छोटे समूहों में जोड़कर आत्मनिर्भर बनाने की यात्रा रातों-रात सफल नहीं हुई है। इसकी जड़ें इतिहास में बहुत गहरी हैं:

  1. शुरुआती दौर (1970 का दशक): भारत में स्वयं सहायता समूह (Self Help Group) की संकल्पना मुख्य रूप से 1972 में ‘सेवा’ (SEWA – Self Employed Women’s Association) की स्थापना के साथ शुरू हुई, जिसका श्रेय इला भट्ट को जाता है। उन्होंने शहरी और ग्रामीण गरीब महिलाओं को बैंकिंग और रोजगार से जोड़ने की शुरुआत की।
  2. नाबार्ड (NABARD) की पहल (1992): साल 1992 में नाबार्ड ने ‘एसएचजी-बैंक लिंकेज कार्यक्रम’ शुरू किया। यह भारत के इतिहास में सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद बैंकों ने गरीब महिलाओं के छोटे समूहों को बिना किसी गारंटी के कर्ज देना शुरू किया।
  3. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (2011 से अब तक): साल 2011 में सरकार ने इसे और व्यवस्थित करते हुए ‘आजीविका मिशन’ की शुरुआत की, जिसे आज हम दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के नाम से जानते हैं। आज इस मिशन के तहत भारत के गांवों की 10 करोड़ से अधिक महिलाएं 90 लाख से ज्यादा समूहों में संगठित हो चुकी हैं।

तुलनात्मक विश्लेषण: कल और आज (Comparative Analysis)

अगर हम पिछले दो दशकों में ग्रामीण महिला उद्यमों की स्थिति की तुलना आज के दौर से करें, तो एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलता है:

पैमाना (Parameter)पुराना दौर (2000-2010 का दशक)आधुनिक दौर (वर्तमान ट्रेंड्स – 2026)
उत्पाद की पहुंचस्थानीय हाट, गांव के बाजार या साल में एक-दो बार लगने वाले क्षेत्रीय मेलों तक सीमित।ग्लोबल और डिजिटल मार्केट: ई-सरस (eSARAS) मोबाइल ऐप और अमेज़न/फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स के जरिए पूरी दुनिया में बिक्री।
पैकेजिंग और ब्रांडिंगसाधारण प्लास्टिक थैलियों या बिना किसी लेबल के खुले सामान बेचना, जिससे उचित दाम नहीं मिलता था।प्रीमियम ब्रांडिंग: ‘सरस’ (SARAS) ट्रेडमार्क के तहत बारकोड, शानदार पैकेजिंग और सर्टिफाइड क्वालिटी एश्योरेंस।
लोन और वित्तीय सहायतासाहूकारों पर निर्भरता या बैंकों से बहुत छोटा (कुछ हजार रुपये का) लोन मिलना।लखपति दीदी पहल: महिलाओं को लाखों रुपये का बिजनेस लोन, ड्रोन दीदी जैसी आधुनिक योजनाओं के तहत तकनीकी ट्रेनिंग।
उत्पाद की वैरायटीकेवल पापड़, अचार, मोमबत्ती या साधारण झाड़ू बनाने तक सीमित उद्यम।निश और कॉम्पिटिटिव प्रोडक्ट्स: ऑर्गेनिक फूड, वेलनेस प्रोडक्ट्स, हाई-एंड हैंडलूम, सस्टेनेबल लाइफस्टाइल उत्पाद और जीआई-टैग प्राप्त हस्तशिल्प।

आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है? (सरल भाषा में समझें)

शायद आप सोच रहे होंगे कि कोच्चि में हुए इस ब्रिक्स सम्मेलन से हमारे आपके जैसे आम लोगों का क्या वास्ता? सीधे शब्दों में कहें तो जब आप बाजार से कोई केमिकल वाला कॉस्मेटिक या विदेशी सामान खरीदते हैं, तो आपका पैसा बड़ी कंपनियों के पास जाता है। लेकिन जब हमारी सरकार इन ग्रामीण महिलाओं को ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाती है, तो इसका मतलब है कि हमारे देश के गांवों में बनने वाला शुद्ध शहद, प्राकृतिक मसाले, हाथ से बुनी साड़ियां और सस्टेनेबल सामान अब विदेशी लोग भी खरीदेंगे।

जब गांव की एक महिला आर्थिक रूप से मजबूत होती है, तो वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाती है, घर का पोषण बेहतर होता है और पूरा देश तरक्की करता है। आज भारत की ये ग्रामीण महिलाएं केवल घर चलाने वाली नहीं, बल्कि “लखपति दीदी” बनकर नौकरियां देने वाली उद्यमी बन रही हैं!

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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