सुरक्षित ऊर्जा के लिए भारत ने बदला रास्ता, अमेरिका बना एलपीजी का सबसे बड़ा मददगार

पश्चिम एशिया के तनाव के बीच भारत ने एलपीजी आयात के लिए पारंपरिक खाड़ी देशों के बजाय अमेरिका और अन्य नए देशों का रुख किया है, ताकि घरों में रसोई गैस की सप्लाई बिना किसी रुकावट के जारी रहे।

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नई दिल्ली: आज हमारे घरों में जो रसोई गैस (LPG) इस्तेमाल होती है, उसे हम तक बिना किसी रुकावट के पहुँचाना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। हाल ही में पश्चिम एशिया (खाड़ी देशों) में बढ़े तनाव और लड़ाइयों के कारण भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के लिए एक बड़ा और समझदारी भरा फैसला लेना पड़ा। इसी रणनीति का नतीजा है कि जून के महीने में भी अमेरिका भारत को सबसे ज्यादा एलपीजी सप्लाई करने वाला देश बना रहा।

आइए बेहद आसान शब्दों में समझते हैं कि भारत की यह नई रणनीति क्या है, पहले की क्या स्थिति थी और यह बदलाव हमारे लिए क्यों जरूरी है।

 जून के ताजा आंकड़े: किसने कितनी गैस भेजी?

कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म ‘केप्लर’ के हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत ने जून के महीने में अपनी रसोई गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिकी बाजार पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया:

  • अमेरिका की बढ़त: जून में भारत ने अमेरिका से 7.73 लाख मीट्रिक टन एलपीजी खरीदी। यह आंकड़ा मई महीने की तुलना में 19.4 प्रतिशत ज्यादा है।
  • भारत का कुल आयात: देश में जून के दौरान कुल एलपीजी आयात 3 प्रतिशत बढ़कर 11.91 लाख मीट्रिक टन हो गया (जबकि मई में यह 11.55 लाख मीट्रिक टन था)। इसका मतलब है कि भारत की कुल जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले अमेरिका से आया है।
  • दूसरे नंबर पर यूएई: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर रहा, जहाँ से आयात 16.6 प्रतिशत बढ़कर 1.57 लाख मीट्रिक टन तक पहुँचा।
  • सऊदी अरब और कुवैत: इन दोनों पारंपरिक देशों ने जून में भारत को 64-64 हजार मीट्रिक टन एलपीजी की आपूर्ति की।

इतिहास और तुलनात्मक विश्लेषण (पहले बनाम अब)

यह समझने के लिए कि यह बदलाव कितना बड़ा है, हमें थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा।

पुराना दौर (खाड़ी देशों पर भारी निर्भरता)

कुछ समय पहले तक भारत अपनी जरूरत की लगभग 90 प्रतिशत एलपीजी खाड़ी देशों से ही खरीदता था। यह सारी गैस समुद्री रास्ते से एक खास जगह से होकर गुजरती थी, जिसे ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज‘ (Strait of Hormuz) कहा जाता है।

जोखिम: यह रास्ता पश्चिम एशिया का एक बेहद संवेदनशील समुद्री हिस्सा है। इतिहास में जब भी खाड़ी देशों में कोई युद्ध, तनाव या राजनीतिक अनिश्चितता पैदा हुई, इस रास्ते से होने वाली सप्लाई ठप होने का डर पैदा हो गया। एक ही रास्ते और एक ही क्षेत्र पर इतनी बड़ी निर्भरता भारत के करोड़ों घरों के बजट और रसोई को संकट में डाल सकती थी।

वर्तमान दौर (विविधीकरण या रास्तों का फैलाव)

हाल के दिनों में जब पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू हुआ और सप्लाई में बाधाएं आईं, तो भारतीय रिफाइनरियों और सरकार ने तुरंत कदम उठाए। भारत ने ‘एक ही टोकरी में सारे अंडे न रखने’ की नीति अपनाई।

पैमानापुराना इतिहास (पारंपरिक स्थिति)वर्तमान ट्रेंड (जून 2026 की स्थिति)
मुख्य आपूर्तिकर्ता क्षेत्रमुख्य रूप से खाड़ी देश (सऊदी अरब, कुवैत आदि)अमेरिका (सबसे बड़ा हिस्सेदार), यूएई और अन्य नए देश
सप्लाई रूट का जोखिम90% आयात ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के भरोसे (हाई रिस्क)अटलांटिक और अन्य सुरक्षित समुद्री रास्तों का उपयोग
निर्भरता का स्तरएकतरफा निर्भरतासंतुलित मिश्रण (गैस सप्लाई का पोर्टफोलियो)

भविष्य की तैयारी: 2026 का दीर्घकालिक समझौता

भारत की यह रणनीति सिर्फ कुछ महीनों के लिए नहीं है, बल्कि यह भविष्य की एक लंबी योजना है। भारत की सरकारी तेल कंपनियों ने साल 2026 से अमेरिका से सालाना 22 लाख टन एलपीजी आयात करने के लिए एक मजबूत और दीर्घकालिक (Long-term) समझौता किया है। इससे भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा का रिश्ता और गहरा होगा तथा खाड़ी देशों पर हमारी निर्भरता स्थायी रूप से कम होगी।

अच्छी खबर यह भी है कि भारतीय रिफाइनरियों ने अगस्त तक के लिए कच्चे तेल और एलपीजी दोनों का पर्याप्त स्टॉक सुरक्षित कर लिया है। अब जबकि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का रास्ता दोबारा सामान्य होने लगा है, तो खाड़ी देशों से भी बची-खुची सप्लाई सामान्य हो रही है, जिससे भारत के घरेलू बाजार में गैस की किल्लत की सारी चिंताएं खत्म हो गई हैं।

नए दोस्तों की तलाश

ऊर्जा सुरक्षा को पूरी तरह अभेद्य बनाने के लिए भारत अब केवल अमेरिका या खाड़ी देशों तक सीमित नहीं है। भारत ने दुनिया के कई अन्य कोनों से भी संपर्क साधा है। अब भारत इन देशों से भी धीरे-धीरे अपना एलपीजी आयात बढ़ा रहा है:

  • ओमान
  • अर्जेंटीना
  • नाइजीरिया
  • अल्जीरिया
  • मिस्र

विशेषज्ञों की राय

बाजार के जानकारों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले समय में पश्चिम एशिया का तनाव पूरी तरह खत्म भी हो जाता है, तब भी भारत अपनी इस विविधीकरण (Diversification) की नीति को नहीं बदलेगा। खाड़ी देश हमेशा हमारे महत्वपूर्ण साथी बने रहेंगे, लेकिन भारतीय रिफाइनरियां अब अलग-अलग देशों से आयात का एक ऐसा संतुलित मिश्रण बनाए रखेंगी जिससे देश की ऊर्जा सप्लाई हमेशा सुरक्षित और बिना किसी उतार-चढ़ाव के चलती रहे।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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