भारत-जापान ‘सुरक्षा’ शिखर सम्मेलन और चीन की बढ़ती बेचैनी

बीजिंग के आर्थिक और सैन्य वर्चस्व को टक्कर देने के लिए नई दिल्ली और टोक्यो ने बुना अभूतपूर्व रणनीतिक ताना-बाना, 'सुरक्षा' के नए सिद्धांतों से बदली वैश्विक राजनीति की दिशा।

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नई दिल्ली: 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति का केंद्र बिंदु अब अटलांटिक से खिसककर इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) क्षेत्र की ओर आ चुका है। इसी क्षेत्र की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक और आर्थिक महाशक्तियों—भारत और जापान—के बीच नई दिल्ली में हुआ द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन महज़ एक नियमित मुलाकात नहीं था। यह वास्तव में एशिया-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीतिक प्लेटों को हिला देने वाला एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ है।

जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की नव-निर्वाचित और वैचारिक रूप से बेहद दृढ़ प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में हाथ मिलाया, तो इसकी गूंज सीधे बीजिंग के झोंगनानहाई (चीन का सत्ता केंद्र) में सुनाई दी। इस ऐतिहासिक समिट के समाप्त होने और साझा घोषणापत्र के जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर, चीनी विदेश मंत्रालय ने एक आपातकालीन और कड़क बयान जारी किया। चीन ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि दोनों देशों के बीच का सहयोग किसी ‘तीसरे पक्ष’ को लक्षित नहीं करना चाहिए और न ही इसके जरिए ‘विशेष छोटे गुटों’ (Exclusive Cliques) का गठन किया जाना चाहिए जो क्षेत्रीय शांति को बाधित करें।

सतही तौर पर देखने वाले विश्लेषकों को यह चीन का एक सामान्य, रटारटाया राजनयिक बयान लग सकता है। लेकिन अगर इसकी परतों को उघाड़ा जाए, तो यह बीजिंग के भीतर गहरे तक समाई उस चिंता और घबराहट को उजागर करता है, जो भारत और जापान के बीच के समझौतों की गहरी रणनीतिक प्रकृति को देखकर पैदा हुई है। दोनों देशों की साझेदारी अब केवल व्यापार बढ़ाने, बुलेट ट्रेन परियोजनाओं या सांस्कृतिक आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रह गई है। यह साझेदारी अब उन संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी है जो सीधे तौर पर चीन के आर्थिक साम्राज्य, उसकी तकनीकी दादागिरी और उसकी सैन्य विस्तारवादी नीतियों की जड़ों पर प्रहार करते हैं।

आर्थिक सुरक्षा का नया रोडमैप: सेमीकंडक्टर और क्रिटिकल मिनरल्स

चीन की इस अभूतपूर्व चिंता का सबसे प्राथमिक और मुख्य कारण नई दिल्ली में घोषित समझौतों की अभूतपूर्व प्रकृति है। दोनों देशों ने खुद को केवल दोस्ती, शांति और सहयोग की पारंपरिक, थकाऊ राजनयिक भाषा के दायरे में कैद नहीं रखा। इसके विपरीत, पीएम मोदी और पीएम ताकाइची ने ‘आर्थिक सुरक्षा’ (Economic Security) पर एक अत्यंत विस्तृत और व्यावहारिक रोडमैप दुनिया के सामने पेश किया।

इस नए ढांचे के तहत दोनों देश निम्नलिखित स्तंभों पर मिलकर काम करने के लिए पूरी तरह सहमत हुए हैं:

  • सेमीकंडक्टर और माइक्रोचिप्स की सुरक्षित सप्लाई चेन: दोनों देशों ने चिप डिजाइनिंग, विनिर्माण और असेंबली में एक-दूसरे की क्षमताओं का उपयोग करने का निर्णय लिया है।
  • क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिज) का विविधीकरण: चीन के खनिज एकाधिकार को तोड़ने के लिए संयुक्त निवेश और अन्वेषण।
  • उभरती हुई प्रौद्योगिकियों (AI और क्वांटम कंप्यूटिंग) में सहयोग: अत्याधुनिक अनुसंधान और सुरक्षा अनुप्रयोगों के लिए साझा प्लेटफॉर्म का विकास।
  • संयुक्त रक्षा विकास परियोजनाएं: सैन्य हार्डवेयर का सह-उत्पादन और तकनीकी हस्तांतरण।

आधुनिक युद्ध का नया मैदान (The New Battlegrounds)

आज के वैश्विक परिदृश्य में ये सभी क्षेत्र केवल व्यापारिक विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि ये आधुनिक भू-राजनीतिक युद्ध के मैदान बन चुके हैं। सेमीकंडक्टर आज की दुनिया में तकनीकी प्रतिस्पर्धा के ठीक केंद्र में अवस्थित हैं। चाहे वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को चलाने वाले सुपरकंप्यूटर हों, हाइपरसोनिक मिसाइलें हों या फिर आम नागरिकों के स्मार्टफोन—बिना अत्याधुनिक चिप्स के सब कुछ पंगु है। ठीक इसी तरह, क्रिटिकल मिनरल्स जैसे कि लिथियम, कोबाल्ट, और रेयर अर्थ एलिमेंट्स (दुर्लभ पृथ्वी तत्व) आज की ग्रीन-इकोनॉमी (इलेक्ट्रिक वाहनों) और उन्नत सैन्य उपकरणों (जैसे फाइटर जेट के रडार और मिसाइल गाइडिंग सिस्टम) के लिए पूरी तरह अपरिहार्य हैं।

जब भारत और जापान जैसे दो बड़े देश इन क्षेत्रों को एक औपचारिक ‘आर्थिक सुरक्षा ढांचे’ के तहत लाते हैं, तो चीन को इसके पीछे एक स्पष्ट, सुविचारित और अचूक रणनीतिक इरादा दिखाई देता है। यह पूरा एजेंडा सीधे तौर पर उन क्षेत्रों को छूता है और उन्हें चुनौती देता है जहां वर्तमान में चीन का एकछत्र वैश्विक दबदबा है। सप्लाई चेन में विविधता लाने (Supply Chain Diversification) और किसी एक देश पर अपनी निर्भरता को कम करने का यह संयुक्त प्रयास वास्तव में चीनी विनिर्माण (Chinese Manufacturing) पर वैश्विक निर्भरता को कम करने के व्यापक अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का एक सबसे मजबूत और क्रियात्मक हिस्सा है।

क्रिटिकल मिनरल्स और डिफेंस सेक्टर में नई चुनौती

इस शिखर सम्मेलन का जो परिणाम चीन को सबसे ज्यादा चुभ रहा है, वह है क्रिटिकल मिनरल्स यानी महत्वपूर्ण खनिजों पर दोनों देशों के बीच हुआ समझौता। यह एक ऐसा मुद्दा है जो सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की सबसे मजबूत नस पर सबसे करारा प्रहार करता है।

चीन का खनिज एकाधिकार और ‘भू-राजनीतिक हथियार’ का इतिहास

वर्तमान समय में, दुनिया के लगभग 70% से 80% दुर्लभ पृथ्वी खनिजों (Rare Earth Elements) के प्रसंस्करण और शोधन (Processing) पर चीन का पूर्ण और एकतरफा एकाधिकार है। चीन ने अतीत में कई बार इस एकाधिकार का उपयोग एक रणनीतिक और भू-राजनीतिक हथियार के रूप में किया है।

ऐतिहासिक तुलना बनाम वर्तमान ट्रेंड:

  • ऐतिहासिक संदर्भ (साल 2010 का संकट): वर्ष 2010 में, पूर्वी चीन सागर में विवादित सेनकाकू/दियाओयू द्वीपों के पास एक जापानी तटरक्षक जहाज और एक चीनी मछली पकड़ने वाली नाव के बीच टक्कर हो गई थी। जापान ने चीनी कैप्टन को हिरासत में ले लिया। इसके जवाब में चीन ने बिना किसी औपचारिक घोषणा के जापान को किए जाने वाले सभी दुर्लभ पृथ्वी खनिजों के निर्यात पर अचानक पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। चूंकि जापान के हाई-टेक उद्योग (जैसे टोयोटा, पैनासोनिक) इन खनिजों पर पूरी तरह निर्भर थे, इसलिए जापानी अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगा और अंततः जापान को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इस घटना ने दुनिया को सिखाया कि चीन अपनी आर्थिक ताकत को कभी भी हथियार बना सकता है।
  • वर्तमान ट्रेंड (2026 की वास्तविकता): इस ऐतिहासिक कड़वे अनुभव से सीख लेते हुए, भारत और जापान का यह वर्तमान कदम एक पूर्ण वैकल्पिक व्यवस्था (Alternative Supply Chain) स्थापित करने का ठोस प्रयास है। भारत के पास कच्चे खनिजों का विशाल भंडार है और जापान के पास उनके प्रसंस्करण की उच्च तकनीक और निवेश क्षमता है। भले ही ये दोनों देश मिलकर रातों-रात वैश्विक बाजार से चीन की जगह न ले पाएं, लेकिन बीजिंग इस बात को भली-भांति जानता है कि यह दीर्घकालिक कदम धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से वैश्विक बाजार पर उसके प्रभाव और उसकी ब्लैकमेल करने की क्षमता को कमजोर कर देगा।

रक्षा क्षेत्र में ‘यूनिकॉर्न’ (UNICORN) की ऐतिहासिक शुरुआत

रक्षा और सैन्य सहयोग के क्षेत्र में, पीएम मोदी और पीएम सानाए ताकाइची ने जिस सबसे महत्वपूर्ण रक्षा परियोजना की घोषणा की, उसका नाम है यूनिफाइड कॉम्प्लेक्स रेडियो एंटीना (Unified Complex Radio Antenna), जिसे संक्षेप में यूनिकॉर्न (UNICORN) कहा जाता है।

यह दोनों देशों के बीच की पहली वास्तविक संयुक्त रक्षा विकास परियोजना है। यह अत्याधुनिक एंटीना प्रणाली नौसैनिक जहाजों के मुख्य मस्तूल (Mast) पर लगाई जाती है। यह न केवल जहाज की रडार क्रॉस-सेक्शन सिग्नेचर को कम करके उसे स्टील्थ (रडार की नजरों से ओझल होने की क्षमता) बनाती है, बल्कि अत्यधिक जटिल युद्ध परिस्थितियों में संचार और मारक क्षमताओं को कई गुना बढ़ा देती है। भारत अपनी नौसेना के आधुनिक युद्धपोतों पर इस जापानी तकनीक को एकीकृत करने जा रहा है।

इस परियोजना का ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व असाधारण है:

  1. जापान के शांतिवादी इतिहास का अंत: द्वितीय विश्व युद्ध में अपनी पराजय के बाद, जापान ने दशकों तक अपने संविधान (अनुच्छेद 9) के तहत स्वयं पर बेहद कड़े शांतिवादी प्रतिबंध लागू कर रखे थे। इसके तहत जापान को घातक हथियारों के निर्यात या किसी अन्य देश के साथ उनके संयुक्त विकास की अनुमति नहीं थी।
  2. ताकाइची का आक्रामक नेतृत्व: लेकिन प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची के नेतृत्व में, जापान ने इस ऐतिहासिक और वैधानिक सीमा को पूरी तरह से पार कर लिया है। उन्होंने जापान के घातक रक्षा उपकरणों के निर्यात और संयुक्त सैन्य उत्पादन के बंद दरवाजों को हमेशा के लिए खोल दिया है।
  3. औद्योगिक और तकनीकी जुगलबंदी: चीन को इस बात का सबसे बड़ा डर है कि जापानी उच्च तकनीक (High-Tech) और भारत की विशाल औद्योगिक व विनिर्माण क्षमता (Industrial Capacity) का यह अनूठा मेल भविष्य में मिलिट्री ड्रोन, अत्याधुनिक नौसैनिक प्रणालियों, पनडुब्बी रोधी तकनीकों और उन्नत समुद्री प्लेटफार्मों के निर्माण में एक ऐसा गेम-चेंजर साबित हो सकता है, जिसका मुकाबला करना चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) के लिए आसान नहीं होगा।

सानाए ताकाइची का सख्त रवैया और इंडो-पैसिफिक का सुरक्षा ढांचा

चीन की इस गहरी चिंता और घबराहट को बढ़ाने में जापान की वर्तमान नेता सानाए ताकाइची के व्यक्तिगत रणनीतिक और राजनीतिक रुख ने घी का काम किया है। ताकाइची को जापान की राजनीति में ‘आयरन लेडी’ और एक धुर-राष्ट्रवादी व सख्त रुख (Hawkish) रखने वाली नेता के रूप में जाना जाता है। वह जापान के महान दिवंगत प्रधानमंत्री शिंजो आबे की राजनीतिक विरासत की सच्ची उत्तराधिकारी मानी जाती हैं, जिन्होंने सबसे पहले ‘इंडो-पैसिफिक’ की अवधारणा दुनिया के सामने रखी थी।

चीन की नजर में एक आक्रामक जापानी नेतृत्व

तानाए ताकाइची के कई बयानों और नीतियों ने चीन को लगातार असहज किया है:

  • ताइवान पर स्पष्ट और कड़ा रुख: ताकाइची ने बार-बार और खुलकर यह बयान दिया है कि ताइवान की सुरक्षा और जलडमरूमध्य में शांति सीधे तौर पर जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई है। चीन ताइवान को अपना एक विद्रोही प्रांत मानता है और उस पर किसी भी विदेशी नेता का ऐसा बयान उसे सीधे अपनी संप्रभुता पर हमला लगता है।
  • मजबूत जापानी सैन्य मुद्रा (Military Posture) का समर्थन: वह जापान के रक्षा बजट को जीडीपी के 2% से ऊपर ले जाने और देश को ‘काउंटर-स्ट्राइक’ (सटीक जवाबी हमला करने की क्षमता) से लैस करने की सबसे बड़ी समर्थक रही हैं।
  • रणनीतिक नेटवर्क का तेजी से विस्तार: प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद से ही ताकाइची ने केवल भारत ही नहीं, बल्कि दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, वियतनाम, इंडोनेशिया और यहां तक कि यूरोपीय देशों व नाटो (NATO) के साथ जापान के सुरक्षा संबंधों को अप्रत्याशित गहराई दी है।

इस विशाल और उभरते हुए रणनीतिक नेटवर्क में भारत की भूमिका सबसे केंद्रीय और सबसे अहम हो जाती है। इसका कारण यह है कि भारत इस पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की एकमात्र ऐसी महाशक्ति है जिसके पास चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को थल (हिमालयी सीमा) और नभ व जल (हिंद महासागर) तीनों मोर्चों पर संतुलित और नियंत्रित करने की वास्तविक सैन्य क्षमता, परमाणु मारक क्षमता और विशाल आर्थिक ताकत मौजूद है।

क्वाड (Quad) की कशमकश और समुद्री सुरक्षा

नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों द्वारा क्वाड (Quad – Quadrilateral Security Dialogue) के प्रति अपनी साझा और दृढ़ प्रतिबद्धता को एक बार फिर से दोहराया गया। यह दोहराव भी बीजिंग को गहरे तक चुभ गया है।

चीन लंबे समय से क्वाड (जिसमें भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं) को अपने खिलाफ एक सोचे-समझे रणनीतिक घेराव और एक उभरते हुए ‘एशियाई नाटो’ (Asian NATO) के रूप में देखता रहा है। हालांकि क्वाड खुद को एक सैन्य गठबंधन नहीं कहता, लेकिन इसके सदस्य देशों के बीच बढ़ता समन्वय चीन के लिए एक बड़ी सिरदर्दी है।

नई दिल्ली समिट के बाद जारी किए गए संयुक्त बयान में कुछ बेहद विशिष्ट और कूटनीतिक शब्दों का प्रयोग किया गया है, जैसे:

  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा (Maritime Security) को सुनिश्चित करना’
  • एक स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय आदेश (Rule-based Order) को बनाए रखना’
  • किसी भी देश द्वारा बल प्रयोग (Force) या डराने-धमकाने के जरिए यथास्थिति (Status Quo) को बदलने के किसी भी एकतरफा प्रयास का पुरजोर विरोध करना’

राजनयिक भाषा में ये शब्द भले ही सीधे तौर पर किसी का नाम न लेते हों, लेकिन पूरी दुनिया और खुद बीजिंग भी यह अच्छी तरह समझता है कि यह सीधे तौर पर दक्षिण चीन सागर (South China Sea), पूर्वी चीन सागर (East China Sea) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की आक्रामक और विस्तारवादी हरकतों पर एक सीधा, तीखा और सामूहिक कूटनीतिक हमला है।

अमेरिका की अनिश्चितता और भारत-जापान का स्वाभाविक मिलन

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी भू-राजनीतिक कहानी में एक और बहुत बड़ा मोड़ है। भारत और जापान को इस हद तक करीब लाने वाले कारकों में केवल चीन का आक्रामक व्यवहार ही एकमात्र कारण नहीं है। इसके पीछे वाशिंगटन यानी अमेरिका में चल रही राजनीतिक अनिश्चितता भी एक बड़ा उत्प्रेरक (Catalyst) साबित हुई है।

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति और उसकी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर पूरी दुनिया में, और विशेष रूप से उसके पारंपरिक सहयोगियों में, एक अनिश्चितता का माहौल हमेशा बना रहता है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ (America First) नीति और बहुपक्षीय गठबंधनों के प्रति उनका संशयवादी दृष्टिकोण जापानी रणनीतिकारों को एक नई रणनीति सोचने पर मजबूर कर चुका है।

बदलती सोच का विश्लेषण:

जापानी रणनीतिक योजनाकारों को अब यह गहराई से महसूस हो रहा है कि वे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हमेशा के लिए केवल और केवल अमेरिकी सुरक्षा छतरी (US Security Umbrella) पर आँख मूंदकर निर्भर नहीं रह सकते। यदि भविष्य में अमेरिका अपनी वैश्विक भूमिका से पीछे हटता है या इंडो-पैसिफिक में अपनी सक्रियता कम करता है, तो जापान को अतिरिक्त सुरक्षा साझेदारियों और पूर्ण आत्मनिर्भरता की सख्त आवश्यकता होगी।

ऐसी परिस्थिति में, भारत जापान का सबसे स्वाभाविक, विश्वसनीय और पसंदीदा रणनीतिक भागीदार बनकर उभरता है। भारत की कोई अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा नहीं है, वह एक स्वतंत्र विदेश नीति (Strategic Autonomy) का पालन करता है, और उसकी भौगोलिक स्थिति हिंद महासागर के उन समुद्री रास्तों (Sea Lines of Communication) को नियंत्रित करती है जहां से जापान का अधिकांश व्यापार और ऊर्जा (तेल) की आपूर्ति होती है। इसलिए, दोनों देशों का यह मिलन केवल मजबूरी नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक भू-राजनीतिक आवश्यकता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बनाम वर्तमान प्रवृत्तियों का तुलनात्मक विश्लेषण

यह समझने के लिए कि भारत और जापान के बीच का यह वर्तमान मोड़ कितना ऐतिहासिक और क्रांतिकारी है, हमें पिछले कुछ दशकों के इतिहास और वर्तमान दौर की प्रवृत्तियों का एक तुलनात्मक अध्ययन करना होगा। इससे यह साफ हो जाएगा कि कैसे दोनों देशों ने अपनी पुरानी हिचकिचाहट को छोड़कर एक बेहद परिपक्व और मजबूत कूटनीति का रास्ता चुना है।

तुलनात्मक तालिका: भारत-जापान रणनीतिक संबंधों का विकास

रणनीतिक आयाम / क्षेत्रऐतिहासिक स्थिति (शीत युद्ध से 2010 तक)वर्तमान प्रवृत्तियां और वर्तमान स्थिति (2026)चीन पर इसका सीधा प्रभाव
जापान की रक्षा और सुरक्षा नीतिपूर्ण शांतिवाद: जापान का संविधान सेना को केवल आत्मरक्षा तक सीमित रखता था। हथियारों के निर्यात और किसी भी देश के साथ उनके संयुक्त विकास पर पूर्ण और कड़ा वैधानिक प्रतिबंध लागू था।सक्रिय सुरक्षावाद: प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची के नेतृत्व में रक्षा नियमों में बड़ा बदलाव। ‘यूनिकॉर्न’ जैसी संयुक्त रक्षा परियोजनाओं की शुरुआत और घातक सैन्य उपकरणों के सह-उत्पादन व निर्यात की अनुमति।चीन के लिए झटका: जापानी तकनीक और भारत की विशाल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मिलकर चीनी नौसेना के वर्चस्व को हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में सीधे चुनौती दे रही है।
आर्थिक और औद्योगिक निर्भरताचीन-केंद्रित सप्लाई चेन: भारत और जापान दोनों ही कच्चे माल, विनिर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए पूरी तरह से चीनी फैक्ट्रियों और उसके बाजार पर निर्भर थे। ‘आर्थिक सुरक्षा’ जैसा कोई साझा एजेंडे का अस्तित्व नहीं था।सप्लाई चेन लचीलापन (Resilience): दिल्ली समिट में दोनों देशों द्वारा ‘आर्थिक सुरक्षा रोडमैप’ की घोषणा। सेमीकंडक्टर, एआई और क्रिटिकल मिनरल्स में आत्मनिर्भरता और विविविधीकरण (De-risking) पर सीधा फोकस।चीनी वर्चस्व कमजोर: चीन की ‘खनिज ब्लैकमेलिंग’ और विनिर्माण एकाधिकार की ताकत अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है, क्योंकि दुनिया को एक मजबूत और सुरक्षित वैकल्पिक सप्लाई चेन मिल रही है।
वैश्विक गठबंधनों के प्रति दृष्टिकोणद्विपक्षीय और संकोची कूटनीति: भारत और जापान अपने संबंधों को मुख्य रूप से आर्थिक सहायता (ODA) और बुनियादी ढांचे (जैसे मेट्रो, राष्ट्रीय राजमार्ग) तक सीमित रखते थे ताकि चीन सीधे तौर पर नाराज या भड़क न जाए।बहुपक्षीय और साहसिक कूटनीति: क्वाड (Quad) के प्रति खुली और दृढ़ प्रतिबद्धता। बहु-ध्रुवीय सुरक्षा नेटवर्क का निर्माण (फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, वियतनाम के साथ सुरक्षा संबंधों को जोड़ना) और चीन की विस्तारवादी नीति का नाम लिए बिना कड़ा विरोध।रणनीतिक घेराबंदी: चीन खुद को इंडो-पैसिफिक में चारों तरफ से लोकतांत्रिक देशों के एक अभेद्य सुरक्षा चक्रव्यूह से घिरा हुआ महसूस कर रहा है, जिससे उसकी ‘एशियाई दादागिरी’ पर लगाम लग गई है।
अमेरिकी कारक (US Factor)पूर्ण निर्भरता और तटस्थता: जापान अपनी सुरक्षा के लिए आंख मूंदकर पूरी तरह वाशिंगटन पर निर्भर था, जबकि भारत अपनी गुटनिरपेक्ष (Non-Aligned) विरासत के कारण किसी भी बड़े सुरक्षा गुट के करीब जाने से कतराता था।रणनीतिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता: वाशिंगटन में राजनीतिक अनिश्चितता (ट्रंप फैक्टर) के बीच दोनों देशों का यह मानना कि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत होना होगा। भारत और जापान अब एक-दूसरे के सबसे स्वाभाविक सुरक्षा गारंटर बन रहे हैं।रणनीतिक भ्रम: चीन अब तक सोचता था कि वह अमेरिका के पीछे हटने पर पूरे एशिया पर राज कर सकता है, लेकिन अब उसे समझ आ रहा है कि भारत-जापान की जोड़ी क्षेत्रीय स्तर पर ही उसे रोकने के लिए पर्याप्त है।

अंतिम निष्कर्ष: एशिया की नई क्षेत्रीय व्यवस्था की वास्तविक शुरुआत

इस पूरे घटनाक्रम का गहन विश्लेषण करने के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि चीन की असली और गहरी चिंता नई दिल्ली में किसी औपचारिक या कागजी ‘चीन-विरोधी सैन्य गठबंधन’ (Anti-China Military Alliance) के बनने से नहीं है। चीन अच्छी तरह जानता है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को कभी नहीं छोड़ेगा और न ही वह किसी औपचारिक सैन्य संधि का हिस्सा बनेगा।

चीन की असली घबराहट और आशंका इस बात को लेकर है कि भारत और जापान के बीच व्यावहारिक, आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक साझेदारियों की यह जो एक के बाद एक मजबूत कड़ियां और श्रृंखला बन रही हैं, वे अनजाने में और बहुत ही खामोशी से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक बिल्कुल नई क्षेत्रीय व्यवस्था (New Regional Order) की मजबूत नींव रख रही हैं।

यह एक ऐसी व्यवस्था होगी जहां भविष्य में बीजिंग का दबदबा, उसकी आर्थिक दादागिरी और उसकी सैन्य धौंस वैसी बिल्कुल नहीं रहेगी जैसी कि आज है। भारत की विशाल मानव संसाधन व सैन्य क्षमता और जापान की असीमित तकनीकी व वित्तीय शक्ति का यह अनूठा संगम एशिया-प्रशांत क्षेत्र को किसी एक देश की तानाशाही से बचाकर एक न्यायसंगत, स्वतंत्र, खुले और ‘बहु-ध्रुवीय’ (Multipolar) भविष्य की ओर ले जाने का सबसे बड़ा संवाहक बन चुका है। और यही वह कड़वा सच है, जिसे पचा पाना फिलहाल ड्रैगन के लिए मुमकिन नहीं हो रहा है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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