नई दिल्ली: अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों में मौजूद एस्ट्रोनॉट्स और पृथ्वी पर स्थित मिशन कंट्रोल के बीच संपर्क बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। इस कठिन कार्य को संभव बनाता है ‘स्पेस नेटवर्क’, जो ब्रह्मांड में एक हाई-टेक ‘सेल टावर’ की तरह काम करता है। यह एडवांस कम्युनिकेशन सिस्टम सुनिश्चित करता है कि अंतरिक्ष यात्री हर पल धरती से जुड़े रहें।
क्या है स्पेस नेटवर्क और कैसे करता है काम?
स्पेस नेटवर्क असल में ट्रैकिंग और डेटा रिले सैटेलाइट का एक शक्तिशाली समूह है। ये सैटेलाइट पृथ्वी से लगभग 35,000 किलोमीटर ऊपर जियोसिंक्रोनस कक्षा में तैनात हैं। इनका मुख्य काम अंतरिक्ष स्टेशन से आने वाले सिग्नलों को रिसीव करना और उन्हें पृथ्वी पर भेजना है।
जब भी कोई अंतरिक्ष यात्री डेटा, वीडियो या वॉयस मैसेज भेजना चाहता है, तो स्टेशन का कंप्यूटर उसे रेडियो सिग्नल में बदल देता है। यह सिग्नल सबसे पहले टीडीआरएस सैटेलाइट तक पहुंचता है, जो इसे न्यू मैक्सिको के व्हाइट सैंड्स कॉम्प्लेक्स तक रिले कर देता है। वहां से लैंडलाइन के जरिए यह जानकारी पलक झपकते ही ह्यूस्टन स्थित मिशन कंट्रोल तक पहुंच जाती है।
रियल-टाइम डेटा और वैज्ञानिक प्रयोग
अंतरिक्ष स्टेशन पर भौतिकी, जीव विज्ञान और मौसम विज्ञान से जुड़े जो भी प्रयोग होते हैं, उनका डेटा इसी नेटवर्क के जरिए वैज्ञानिकों तक पहुंचता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी इसकी गति है; पूरी प्रक्रिया मिलीसेकंड में पूरी हो जाती है, जिससे वैज्ञानिकों को ‘रियल-टाइम’ डेटा प्राप्त होता है।
संचार क्रांति: 15 मिनट से 24 घंटे का सफर
एक समय था जब अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी से केवल 15 मिनट के लिए ही संपर्क कर पाते थे। लेकिन नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर द्वारा प्रबंधित इस नेटवर्क ने तस्वीर बदल दी है। अब अंतरिक्ष यात्री न केवल मिशन कंट्रोल से जुड़े रहते हैं, बल्कि वीडियो कॉल के जरिए स्कूली बच्चों के सवालों के जवाब भी देते हैं। इस पूरे सिस्टम की रणनीतिक देखरेख स्कैन प्रोग्राम ऑफिस द्वारा की जाती है।



