कैसे आधुनिक ‘तकनीक’ बदल रही है भारतीय किसानों की किस्मत?

भारत में खेती अब सिर्फ बैल और हल तक सीमित नहीं रही। सरकार की 'कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन' (SMAM) योजना के तहत ₹9,404.47 करोड़ की भारी-भरकम मदद से देश भर में 21.61 लाख से ज्यादा आधुनिक मशीनें बांटी जा चुकी हैं। इतना ही नहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के जरिए 40,000 से ज्यादा हेक्टेयर जमीन पर 'किसान ड्रोन' का सफल परीक्षण किया जा चुका है। यह ब्लॉग विस्तार से समझाता है कि कैसे यह सरकारी योजना देश के सबसे छोटे, गरीब और महिला किसानों को हाई-टेक बनाकर भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर बदल रही है।

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नई दिल्ली: क्या आपने कभी सोचा है कि जिस देश में सदियों से खेती का मतलब सिर्फ हाड़-तोड़ मेहनत, बैलों की जोड़ी और मॉनसून के भरोसे बैठे रहना होता था, आज वहां का आम किसान आसमान में रिमोट से ड्रोन उड़ाकर अपनी फसलों पर खाद और दवाई छिड़क रहा है? जी हां, यह कोई किसी फिल्म की कहानी नहीं बल्कि आज के बदलते भारत की हकीकत है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां की आधे से ज्यादा आबादी आज भी अपनी रोजी-रोटी के लिए खेतों पर निर्भर है। लेकिन एक कड़वा सच यह भी था कि हमारे देश के छोटे और सीमांत किसानों के पास इतनी पूंजी (पैसा) नहीं होती थी कि वे महंगी और आधुनिक मशीनें खरीद सकें। इसी समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए भारत सरकार ने साल 2014-15 में एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत की, जिसका नाम है—कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (Sub-Mission on Agricultural Mechanization – SMAM)। यह योजना कोई साधारण योजना नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस छोटे किसान, महिला और पिछड़े वर्ग के लोगों तक आधुनिक कृषि विज्ञान पहुंचाने का एक महा-अभियान है, जो अब तक इन सुविधाओं से दूर थे। आइए इस विस्तृत ब्लॉग में बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि यह पूरी योजना क्या है, इसका इतिहास क्या रहा है और यह कैसे भारतीय कृषि का चेहरा बदल रही है।

इतिहास के पन्नों से: पारंपरिक खेती से आधुनिकता का सफर

इस क्रांति को गहराई से समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा। भारत में खेती का इतिहास हजारों साल पुराना है। आजादी के बाद, जब देश में अनाज की भारी किल्लत थी, तब 1960 के दशक में ‘हरित क्रांति‘ (Green Revolution) की शुरुआत हुई। उस समय ट्रैक्टरों और उन्नत बीजों का चलन बढ़ा, लेकिन उसका फायदा केवल बड़े और अमीर किसानों को ही मिल पाया। देश का छोटा किसान, जिसके पास एक या दो एकड़ जमीन थी, वह चाहकर भी ट्रैक्टर या थ्रेशर जैसी मशीनें नहीं खरीद सकता था।

इसी खाई को पाटने के लिए सरकार ने साल 2007 में एक बेहद लचीली योजना शुरू की, जिसका नाम था राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)। इस योजना का मकसद राज्यों को यह आजादी देना था कि वे अपनी स्थानीय जरूरतों के हिसाब से खेती की योजनाएं बना सकें। समय के साथ जब यह महसूस हुआ कि सिर्फ खाद और बीज देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि खेती की लागत को कम करने के लिए मशीनों की सख्त जरूरत है, तब साल 2017-18 में इस योजना को नया रूप देकर RKVY-RAFTAR किया गया। इसका पूरा ध्यान इस बात पर था कि फसल बोने से लेकर उसे बाजार में बेचने तक के पूरे सफर (Pre and Post-Harvest Infrastructure) को मजबूत किया जाए। इसी बड़ी सोच के तहत ‘कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन’ (SMAM) को एक केंद्रीय प्रायोजित योजना के रूप में इसके साथ जोड़ा गया, ताकि देश का हर छोटा किसान मशीनों का मालिक या उपयोगकर्ता बन सके।

तुलनात्मक विश्लेषण: कल की खेती बनाम आज के आधुनिक ट्रेंड्स

अगर हम पहले की कृषि व्यवस्था और आज की आधुनिक कृषि व्यवस्था की तुलना करें, तो जमीन-आसमान का अंतर साफ नजर आता है। इस बदलाव को हम कुछ मुख्य बिंदुओं के जरिए आसानी से समझ सकते हैं:

  1. शारीरिक श्रम और समय की बचत: पहले के समय में एक एकड़ खेत की जुताई करने में बैलों के सहारे कई दिन लग जाते थे। फसल की कटाई और गहाई (थ्रेशिंग) में पूरा परिवार हफ्तों तक लगा रहता था। कई बार तो कटाई के समय अचानक बारिश होने से पूरी फसल खेतों में ही सड़ जाती थी। लेकिन आज आधुनिक कंबाइन हार्वेस्टर और कल्टीवेटर की मदद से जो काम पहले हफ्तों में होता था, वह अब कुछ ही घंटों में निपट जाता है। इससे किसानों का समय तो बचता ही है, साथ ही फसल खराब होने का जोखिम भी न के बराबर हो जाता है।
  2. लागत में कमी और मुनाफे में बढ़ोतरी: पारंपरिक खेती में मजदूरों पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा होता था, और सीजन के समय अक्सर मजदूर मिलते भी नहीं थे। आधुनिक मशीनों के आने से खेती की लागत में भारी कमी आई है। समय पर बुवाई और सटीक कटाई की वजह से पैदावार की गुणवत्ता भी सुधरी है, जिससे मंडियों में किसानों को अपनी फसल के बेहतर दाम मिल रहे हैं।
  3. पानी और दवाओं का सही इस्तेमाल: पहले खेतों में कीटनाशकों का छिड़काव हाथ से या पीठ पर पंप बांधकर किया जाता था। इसमें दवाइयों की बर्बादी भी ज्यादा होती थी और किसान के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता था। आज का नया ट्रेंड ‘सटीक खेती’ (Precision Agriculture) का है, जहां ड्रोन के जरिए केवल उतनी ही दवा और पानी का छिड़काव किया जाता है, जितनी पौधे को जरूरत होती है।

SMAM योजना के मजबूत स्तंभ: कैसे काम करती है यह व्यवस्था?

कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (SMAM) को देश के कोने-कोने में पहुंचाने के लिए सरकार ने कुछ बेहद ठोस नीतियां और स्तंभ तैयार किए हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • ट्रेनिंग, टेस्टिंग और प्रदर्शन: किसी भी नई मशीन को बाजार में उतारने से पहले उसकी पूरी जांच (Performance Testing) और सर्टिफिकेशन किया जाता है ताकि किसानों को घटिया मशीनें न मिलें। साथ ही, देश भर के गांवों में कैंप लगाकर किसानों को इन मशीनों को चलाने की ट्रेनिंग दी जाती है।
  • बैंक खातों में सीधी मदद (Direct Benefit Transfer): इस योजना के तहत अगर कोई किसान व्यक्तिगत रूप से मशीन खरीदना चाहता है, तो सरकार उसे सीधे उसके बैंक खाते में सब्सिडी भेजती है। सामान्य वर्ग के किसानों को मशीन की कीमत का 40% हिस्सा सरकार देती है। वहीं दूसरी ओर, हमारे देश के छोटे, सीमांत, महिला और अनुसूचित जाति व जनजाति (SC/ST) के किसानों के लिए इस सब्सिडी को बढ़ाकर 50% तक कर दिया गया है।
  • कस्टम हायरिंग सेंटर (CHCs) और फार्म मशीनरी बैंक: यह इस योजना का सबसे क्रांतिकारी हिस्सा है। मान लीजिए किसी छोटे किसान को साल में सिर्फ दो दिन के लिए एक विशेष मशीन की जरूरत है, तो वह उसे खरीदेगा नहीं। इसके लिए सरकार गांवों में स्वयं सहायता समूहों (SHGs), किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और ग्रामीण युवाओं की मदद से ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ और ‘फार्म मशीनरी बैंक’ खुलवा रही है। ये एक तरह से ‘मशीनों के बैंक’ हैं, जहां से कोई भी गरीब किसान बहुत ही कम किराया देकर कुछ घंटों के लिए मशीन अपने खेत पर ला सकता है। इन बैंकों को खोलने के लिए सरकार 40% से लेकर 90% तक की भारी वित्तीय सहायता (लाखों रुपये तक का अनुदान) देती है।
  • पूर्वोत्तर राज्यों के लिए विशेष रियायत: भारत के उत्तर-पूर्वी और पहाड़ी राज्यों की भौगोलिक स्थिति बहुत कठिन है, इसलिए वहां खेती करना और भी मुश्किल है। इस क्षेत्रीय असमानता को दूर करने के लिए सरकार पूर्वोत्तर राज्यों में छोटे उपकरणों पर 100% तक की छूट और फार्म मशीनरी बैंकों के लिए 95% तक की मदद दे रही है।

आंकड़ों की जुबानी: योजना की अब तक की भारी सफलता

सरकार द्वारा जारी किए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस योजना ने जमीन पर बहुत बड़े स्तर पर काम किया है। साल 2014-15 से लेकर अब तक:

  • केंद्र सरकार द्वारा कुल ₹9,404.47 करोड़ की वित्तीय सहायता जारी की जा चुकी है।
  • इस पैसे की मदद से देश भर के व्यक्तिगत किसानों को 21.61 लाख से अधिक कृषि मशीनें बांटी गई हैं।
  • ग्रामीण इलाकों में 27,554 कस्टम हायरिंग सेंटर, 646 हाई-टेक हब और 25,608 फार्म मशीनरी बैंक स्थापित किए जा चुके हैं।
  • केवल व्यक्तिगत तौर पर मशीन खरीदने वाले लाभार्थियों की संख्या को देखें, तो यह साल 2020-21 में 2.07 लाख थी, जो साल 2024-25 तक बढ़कर 2.32 लाख हो गई है। यह दिखाता है कि योजना का दायरा हर साल कितनी तेजी से बढ़ रहा है।

फंडिंग के मामले में केंद्र और राज्यों के बीच एक पारदर्शी व्यवस्था है। सामान्य राज्यों में 60% पैसा केंद्र और 40% राज्य सरकार देती है। पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में यह अनुपात 90:10 का है, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) में पूरा 100% खर्च केंद्र सरकार खुद उठाती है।

खेती में ड्रोन की एंट्री: आसमान से बरस रही है खुशहाली

आज के दौर में जो चीज सबसे ज्यादा चर्चा में है, वह है खेती में ड्रोन का इस्तेमाल। SMAM योजना के तहत सरकार ने इसके लिए ₹52.50 करोड़ का एक विशेष फंड जारी किया था। इसके तहत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) के साथ मिलकर देश भर में 40,928 किसान ड्रोन प्रदर्शन आयोजित किए हैं।

इन प्रदर्शनों के जरिए 40,918 हेक्टेयर से अधिक की कृषि भूमि पर ड्रोन उड़ाकर दिखाया गया कि कैसे वैज्ञानिक तरीकों से और तय नियमों (Standard Operating Procedures) के तहत पोषक तत्वों और खादों का छिड़काव किया जा सकता है। सरकार ड्रोन को बढ़ावा देने के लिए भी बड़ी छूट दे रही है:

  • सरकारी कृषि संस्थानों और विश्वविद्यालयों को ड्रोन खरीदने के लिए 100% वित्तीय सहायता (अधिकतम ₹10 लाख प्रति ड्रोन) दी जा रही है।
  • किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को ड्रोन की खरीद पर 75% तक का अनुदान मिल रहा है।
  • जो एजेंसियां किराए पर ड्रोन देने का काम कर रही हैं, उन्हें प्रति हेक्टेयर ₹6,000 की आकस्मिक सहायता भी दी जा रही है ताकि आम किसान पर इसका बोझ न पड़े।

नारी शक्ति का सम्मान: महिला किसानों को विशेष प्राथमिकता

इस योजना की एक बेहद खूबसूरत और संवेदनशील बात यह है कि यह हमारी महिला किसानों को बराबरी का हक देती है। भारतीय खेतों में महिलाएं हमेशा से पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती आई हैं, लेकिन अक्सर मशीनों पर पुरुषों का ही अधिकार माना जाता था। SMAM योजना ने इस सोच को बदला है। इस योजना के तहत कुल बजट का 30 प्रतिशत हिस्सा विशेष रूप से महिला किसानों के लिए सुरक्षित (Earmarked) रखा गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश की महिला किसानों को भी आधुनिक मशीनें आसानी से मिल सकें, जिससे उनके शारीरिक श्रम (drudgery) को कम किया जा सके और वे भी आत्मनिर्भर बनकर खेती के फैसले खुद ले सकें।

निष्कर्ष: एक समृद्ध और आत्मनिर्भर कृषि का भविष्य

संक्षेप में कहें तो, ‘कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन’ (SMAM) ने देश के कृषि क्षेत्र में एक मौन क्रांति ला दी है। छोटे और सीमांत किसानों, महिलाओं, पिछड़े समुदायों और देश के सुदूर पहाड़ी व पूर्वोत्तर इलाकों पर विशेष ध्यान देकर इस योजना ने क्षेत्रीय और सामाजिक भेदभाव को मिटाने का काम किया है। सस्ती दरों पर मशीनों को किराए पर उपलब्ध कराकर, ड्रोन जैसी जादुई आधुनिक तकनीकों को खेतों तक पहुंचाकर और कटाई के बाद अनाज को सुरक्षित रखने के इंतजाम मजबूत करके इस योजना ने साबित कर दिया है कि अगर सही नीति और पक्का इरादा हो, तो देश के सबसे गरीब किसान के घर में भी खुशहाली लाई जा सकती है। आज भारत का किसान केवल पारंपरिक अन्नदाता नहीं रहा, बल्कि वह आधुनिक ‘तकनीक’ से लैस होकर एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र का सबसे मजबूत आधार बन रहा है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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