नई दिल्ली। आज अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे ताकतवर करंसी मानी जाती है लेकिन एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका खुद भीषण मुद्रा संकट से जूझ रहा था। हालात ऐसे थे कि देश में कोई आधिकारिक मुद्रा नहीं थी और लेन-देन सोने-चांदी की वस्तुओं या विदेशी सिक्कों से किया जाता था। उस दौर में ब्रिटिश और स्पेनिश सिक्कों का व्यापक इस्तेमाल होने लगा था।
धीरे-धीरे सोने और चांदी की कमी गहराने लगी। इससे व्यापार प्रभावित होने लगा और देश में अपनी एक स्वतंत्र मुद्रा की जरूरत महसूस हुई। इसके बाद कानूनी स्तर पर करंसी की नींव रखने की प्रक्रिया शुरू हुई।
1792 में पड़ी अमेरिकी करंसी की नींव
अमेरिका में पहली बार मुद्रा को कानूनी आधार देने के लिए अमेरिकी कांग्रेस ने 2 अप्रैल 1792 को कॉइनेज एक्ट पारित किया। इस कानून के तहत देश में टकसाल (मिंट) की स्थापना हुई और आधिकारिक मुद्रा जारी करने का रास्ता साफ हुआ। शुरुआत में अमेरिका की मुद्रा चांदी से बनाई गई। इसी के साथ चांदी से बने डॉलर सिक्कों का चलन शुरू हुआ। उस दौर में लोग अपने घरों से चांदी लेकर टकसाल जाते थे और उसे सिक्कों में ढलवाते थे।
खरीद-फरोख्त को आसान बनाना
कॉइनेज एक्ट का मकसद खरीद-फरोख्त को आसान बनाना था लेकिन यह अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हो सका। चांदी की सीमित उपलब्धता के कारण सिक्कों की संख्या कम रही और बाजार में पर्याप्त मुद्रा नहीं पहुंच पाई। इस स्थिति को देखते हुए अमेरिका में स्थानीय बैंकों ने अपनी-अपनी निजी करंसी जारी करनी शुरू कर दी। इससे मुद्रा व्यवस्था और ज्यादा बिखर गई।
चांदी की कमी से कागजी मुद्रा तक का सफर
चांदी की किल्लत बढ़ने के साथ ही सरकार को नए विकल्प तलाशने पड़े। आखिरकार समाधान कागजी मुद्रा के रूप में सामने आया। साल 1861 में, अमेरिकी कांग्रेस ने कागज की मुद्रा जारी करने का फैसला लिया।
सरकार ने इन नोटों को ‘डिमांड नोट्स’ नाम दिया। इनका इस्तेमाल सिविल वार के दौरान भुगतान के लिए किया गया। शुरुआती चरण में 5, 10 और 20 डॉलर के नोट छापे गए। इन्हें ‘ग्रीनबैक’ कहा गया, क्योंकि नोटों के पीछे हरे रंग की स्याही का इस्तेमाल किया गया था, जिससे नकली नोटों पर लगाम लगाई जा सके। बाद में डॉलर पर हरे रंग की एक खास केमिकल लेयर भी विकसित की गई। हालांकि नोटों की प्रिंटिंग का मानक सिस्टम पहली बार 1869 में तय किया गया।
ब्रेटन वुड्स से बनी डॉलर की वैश्विक पहचान
अमेरिकी डॉलर के इतिहास में 1944 एक अहम मोड़ साबित हुआ। इसी साल ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट के जरिए डॉलर को पहली बार वैश्विक मुद्रा के रूप में मान्यता मिली। इस समझौते में 44 देशों ने हिस्सा लिया और तय किया गया कि उनकी राष्ट्रीय मुद्राएं डॉलर से जुड़ी रहेंगी, जबकि डॉलर को सोने से जोड़ा जाएगा। हालांकि 1970 में अमेरिका ने डॉलर को गोल्ड स्टैंडर्ड से अलग कर दिया और इसके मूल्य को बाजार के उतार-चढ़ाव के लिए खोल दिया।
डॉलर बना दुनिया की आर्थिक धुरी
ब्रेटन वुड्स समझौते के बाद ज्यादातर देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर को शामिल करना शुरू किया। बाद में आइएमफ और वर्ल्ड बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं के केंद्र में भी डॉलर ही रहा। अंतरराष्ट्रीय कर्ज, व्यापार और वित्तीय लेन-देन में डॉलर की भूमिका लगातार मजबूत होती चली गई। 1970 के दशक में पेट्रोडॉलर सिस्टम लागू होने के बाद तेल की खरीद-फरोख्त केवल डॉलर में होने लगी। इससे डॉलर की वैश्विक मांग और ज्यादा बढ़ गई।



