नई दिल्ली: हर मानसून में जब हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर से तबाही की तस्वीरें सामने आती हैं, तो हम बड़ी आसानी से इसे ‘मौसम की मार’ या ‘जलवायु परिवर्तन का कहर’ कहकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन क्या सच में पूरा दोष सिर्फ मौसम का है? भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक और मौसम विज्ञान सोसायटी के अध्यक्ष आनंद शर्मा इस आम धारणा को चुनौती देते हैं। उनके अनुसार, हम जलवायु परिवर्तन की ढाल के पीछे अपनी उन विनाशकारी गलतियों को छिपा रहे हैं, जो हिमालय (Himalaya) को मौत की घाटी में बदल रही हैं।
चेतावनी पहले, पर तैयारी अधूरी: मौसम विज्ञान की सीमाएं
आनंद शर्मा स्पष्ट करते हैं कि भारत की मौसम पूर्वानुमान प्रणाली पहले से कहीं अधिक बेहतर हुई है। चक्रवात और अन्य बड़ी मौसमी प्रणालियों की सूचना दो से चार दिन पहले मिल जाती है, जैसा केदारनाथ त्रासदी के समय भी हुआ था। असली चुनौती हिमालय के जटिल भूगोल से पैदा होती है। यहां की हर घाटी का अपना एक अलग मौसम है। कई बार 10 से 100 किलोमीटर के छोटे से दायरे में बादल 15 किलोमीटर ऊपर तक उठते हैं और एक घंटे के भीतर भयानक बारिश कर देते हैं। शर्मा बताते हैं, जब तक रडार और सैटेलाइट इसे पकड़ते हैं और हम यह समझ पाते हैं कि बादल फटने वाला है, तब तक हमारे पास महज 10-15 मिनट का समय बचता है। इतने कम समय में जान बचाना भी एक चुनौती है, खासकर अगर आपदा रात में आए, जब संचार के माध्यम (मोबाइल, टीवी) बंद हों। इसके लिए उन्होंने हैम रेडियो जैसे ऑल-वेदर कम्युनिकेशन सिस्टम और स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया।
आपदा की जड़: नदियों के सीने पर बसाए शहर और सड़कें
शर्मा के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू हमारा विकास का मॉडल है। वह सवाल उठाते हैं कि हम कैसा विकास कर रहे हैं? वह अंग्रेजों के समय के निर्माण और आज के निर्माण की तुलना करते हुए कहते हैं, अंग्रेजों द्वारा 100 साल पहले बनाई गई हिमाचल की रेलवे लाइन या शिमला-रानीखेत की सड़कें आज भी जस की तस हैं, क्योंकि उन्होंने पहाड़ की भूवैज्ञानिक मजबूती को परखा और नदियों-नालों से सुरक्षित दूरी पर निर्माण किया। इसके विपरीत, आज कुल्लू में ब्यास नदी के किनारे या देहरादून में मालदेवता के पास नदी के भीतर घुसकर सड़कें और रिसॉर्ट बना दिए गए हैं। देहरादून का उदाहरण देते हुए वह चेतावनी देते हैं कि रिस्पना और बिंदाल जैसी नदियां, जिनके प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में विधानसभा और दून यूनिवर्सिटी जैसी इमारतें खड़ी कर दी गई हैं, एक दिन भारी बारिश में सब कुछ बहा ले जाएंगी। नदी अपना रास्ता कभी नहीं भूलती।
‘जलवायु परिवर्तन’ – अपनी गलतियों को छिपाने की ढाल?
आनंद शर्मा इस बात को सिरे से खारिज नहीं करते कि ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है, लेकिन वह इसे सरकारों और प्रशासन के लिए एक ढाल मानते हैं। उनके अनुसार, हर आपदा के बाद ‘जलवायु परिवर्तन’ का बहाना बनाकर असली मुद्दों से ध्यान भटका दिया जाता है। असली वजह है भूमि के उपयोग में अंधाधुंध बदलाव। वह कहते हैं, पहाड़ों में फ्लैश फ्लड आना एक सामान्य प्रक्रिया है। बाढ़ नदियों की सफाई के लिए भी जरूरी है, जो मैदानी इलाकों को उपजाऊ बनाती है। समस्या तब होती है जब हम नदी के बाढ़ क्षेत्र (Floodplain) में अतिक्रमण कर घर, होटल और सड़कें बना देते हैं। यह आपदा प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव निर्मित है।
समाधान क्या है? मौसम को कोसने के बजाय, उसे अपनाएं
तो रास्ता क्या है? शर्मा के अनुसार, समाधान मौसम को कोसने में नहीं, बल्कि उसे समझने और उसके अनुसार अपनी जीवनशैली को ढालने में है।
- रिस्क असेसमेंट: सर्वे ऑफ इंडिया के पुराने नक्शों के आधार पर सभी नदियों, नालों और झीलों का जोखिम मूल्यांकन हो। यह जानकारी पटवारी स्तर तक उपलब्ध कराई जाए ताकि कोई भी नदी क्षेत्र में निर्माण न कर सके।
- प्रकृति-आधारित योजना: विकास प्रकृति के अनुरूप हो, उसके विरुद्ध नहीं। जापान का उदाहरण लें, जहां सुनामी से बचने के लिए तटों पर मीलों लंबे घने जंगल लगाए गए हैं। हमें भी नदियों के किनारे सघन वृक्षारोपण करना चाहिए।
- जवाबदेही और सुशासन: किसी भी बड़े निर्माण से पहले उसका पर्यावरण पर प्रभाव का ईमानदारी से मूल्यांकन हो। मलबा कहां फेंका जाएगा, इसकी ठोस योजना हो। जब तक व्यवस्था में सुशासन (Good Governance) नहीं आएगा, तब तक टिकाऊ विकास (Sustainable Development) एक सपना ही रहेगा।



