मनामा / कुवैत सिटी: मिडल ईस्ट एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठ चुका है, और इस बार चिंगारी बहुत बड़ी है। अभी 11 दिन पहले लगा था कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत से रास्ता निकल आएगा, लेकिन 28 जून 2026 की सुबह जो हुआ, उसने दुनिया भर के शेयर मार्केट और तेल बाज़ारों को हिलाकर रख दिया है। अमेरिका ने शनिवार को ईरान पर बम बरसाए, तो जवाब में ईरान ने संडे की सुबह सीधे अमेरिकी अड्डों पर मिसाइलें ठोक दीं। बड़ी बात यह है कि इस पूरी लड़ाई की चपेट में दो सीधे-साधे पड़ोसी देश—कुवैत और बहरीन—भी आ गए हैं।
दोनों खाड़ी देशों ने इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है और इसे अपनी संप्रभुता (Sovereignty) पर सीधा हमला बताया है। चलिए, आसान शब्दों में पूरे मामले का पोस्टमॉर्टम करते हैं कि आखिर ये खूनी खेल शुरू कहां से हुआ।
बहरीन और कुवैत पर ईरान का मिसाइल तांडव
रविवार, 28 जून 2026 की सुबह ईरान की सबसे खतरनाक विंग ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) ने सीना ठोककर माना कि हां, हमने हमले किए हैं। ईरान का कहना है कि यह कोई नई जंग नहीं है, बल्कि शनिवार को अमेरिका ने जो उनके घर में घुसकर मारा था, यह उसी का बदला (Revenge) है।
ईरान के रडार पर आए ये दो बड़े अमेरिकी अड्डे:
- अली अल सालेम एयरबेस (कुवैत): अमेरिकी वायुसेना का यह बहुत बड़ा और रणनीतिक अड्डा है, जहां ईरान ने कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागने का दावा किया।
- यूएस फिफ्थ नेवल फ्लीट, पोर्ट सलमान (बहरीन): यह अमेरिकी नौसेना (Navy) का वो पांचवां बेड़ा है जो पूरे मिडल ईस्ट के समंदर पर राज करता है। ईरान ने इसे अपने आत्मघाती ड्रोनों से निशाना बनाया।
आम जनता के घरों पर गिरे ड्रोन!
बहरीन के गृह मंत्रालय ने कुछ तस्वीरें जारी की हैं, जो डराने वाली हैं। ईरान का एक घातक ड्रोन बहरीन के रिहायशी इलाके मुहर्रक (Muharraq) में एक आम रिहायशी बिल्डिंग पर जा गिरा। संडे की सुबह से ही वहां की सिविल डिफेंस और रेस्क्यू टीमें मलबे से लोगों को निकालने और आग बुझाने में जुटी हैं। इस घटना ने खाड़ी देशों के आम नागरिकों में दहशत फैला दी है।
शनिवार रात को अमेरिका ने की थी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
अब कहानी के दूसरे पहलू पर आते हैं। ईरान ने यह मिसाइलें हवा में नहीं चलाईं; इसके ठीक एक दिन पहले यानी शनिवार (27 जून) की रात को अमेरिकी सेना ने ईरान के खिलाफ बड़ा एक्शन लिया था।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, उनकी नेवी और एयरफोर्स ने शनिवार रात स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के पास ईरान के 10 मिलिट्री ठिकानों को तहस-नहस कर दिया।
अमेरिका ने ईरान में कहां-कहां बम गिराए?
- सिरिक (Sirik): ईरान के तटीय रडार और निगरानी केंद्र।
- बंदर-ए लेंगह (Bandar-e Lengeh): ईरान की फास्ट-अटैक नेवी बोट्स का अड्डा।
- केश्म द्वीप (Qeshm Island): समंदर के ठीक बीचोबीच स्थित ईरान का सबसे बड़ा मिलिट्री आइलैंड।
अमेरिका को गुस्सा क्यों आया? ‘किकू’ टैंकर पर हमला
अमेरिका का कहना है कि उन्होंने हमला शौक से नहीं किया। शनिवार की सुबह जब ‘किकू’ (Kiku) नाम का एक विशाल तेल टैंकर (पनामा फ्लैग वाला) 20 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजर रहा था, तब एक ईरानी ड्रोन ने उस पर हमला कर दिया था।
ब्रिटेन की समुद्री सुरक्षा एजेंसी UKMTO ने बताया कि टैंकर के कंट्रोल रूम (Bridge) को भारी नुकसान पहुंचा, लेकिन क्रू मेंबर बाल-बाल बच गए। २० लाख बैरल तेल से भरे जहाज पर हमला झेलना अमेरिका के लिए नामुमकिन था, इसलिए उसने रात को ही बदला ले लिया।
पूरी टाइमलाइन: पिछले 4 दिनों से सुलग रही थी आग
अगर कड़ियों को जोड़ें, तो यह बवाल पिछले चार दिनों से लगातार बढ़ रहा था:
- गुरुवार, 25 जून: सिंगापुर का एक कंटेनर जहाज ‘एवर लवली’ (Ever Lovely) हॉर्मुज के पास ईरानी ड्रोन का शिकार हुआ। इसी के तुरंत बाद इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (IMO) ने वहां फंसे जहाजों को बाहर निकालने का अपना मिशन सस्पेंड कर दिया, क्योंकि माहौल बहुत असुरक्षित था।
- शुक्रवार, 26 जून: अमेरिका ने ‘एवर लवली’ पर हुए हमले का बदला लेने के लिए ईरान के सिरिक पर बमबारी की। जवाब में ईरान ने भी शुक्रवार को अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाया।
- शनिवार, 27 जून: सुबह ईरान ने ‘किकू’ तेल टैंकर को उड़ाने की कोशिश की, और रात को अमेरिका ने ईरान के 10 ठिकाने तबाह कर दिए।
- रविवार, 28 जून: ईरान ने सीधे कुवैत और बहरीन में घुसकर अमेरिकी अड्डों और रिहायशी इलाकों पर मिसाइलें दाग दीं।
अरब देशों का फूटा गुस्सा: “यह गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं!”
ईरान के इस कदम के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र के देशों ने ईरान को आड़े हाथों लिया है:
- कुवैत: “यह हमारी संप्रभुता का घोर उल्लंघन है। ईरान बार-बार इस तरह की जघन्य हरकतें कर रहा है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
- बहरीन: “ईरान के इस गैर-जिम्मेदाराना कदम से क्षेत्र में शांति और कूटनीति के जितने भी मौके थे, सब खत्म हो गए हैं।”
- कतर: (जो अक्सर बीच-बचाव करता है) उसने भी इस बार ईरान को टोका और कहा कि इस क्षेत्र को ऐसे बिना वजह के हमलों से बचाना बेहद जरूरी है।
- यूएई (UAE): “यह बहरीन और कुवैत की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है और इंटरनेशनल लॉ का खुला उल्लंघन (Blatant Violation) है।”
- जॉर्डन: जॉर्डन ने इसे एक “अत्यंत खतरनाक मोड़” बताया जो संयुक्त राष्ट्र के नियमों की धज्जियां उड़ाता है।
- ओमान: हमेशा की तरह ओमान ने शांति की अपील की और कहा, “दोनों पक्ष अपनी तलवारें म्यान में डालें, संयम बरतें और बातचीत से मसला सुलझाएं।”
संकट में ‘पीस डील’ (MoU): क्या था 17 जून का वो वादा?
इस पूरी जंग का सबसे बड़ा विलेन यह है कि यह सब कुछ एक बड़ी शांति समझौते के बाद हो रहा है। इसी महीने 17 जून 2026 को अमेरिका और ईरान ने एक समझौते (MoU) पर साइन किए थे।
क्या था उस समझौते में?
दरअसल, इसी साल 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर बहुत बड़ा हमला किया था, जिसके बाद दोनों देशों में युद्ध छिड़ गया था। महीनों की तबाही के बाद 17 जून को दोनों पक्ष इस बात पर राजी हुए थे कि वे 60 दिनों तक युद्ध रोकेंगे (Ceasefire) और शांति का रास्ता निकालेंगे।
इस समझौते के अनुच्छेद 5 (Article 5) में साफ लिखा था कि ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ से गुजरने वाले सभी कमर्शियल जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए अपनी “सर्वोत्तम कोशिश” (Best Efforts) करेगा। लेकिन 11 दिन में ही ईरान ने इस वादे को मलबे में मिला दिया।
डोनाल्ड ट्रम्प की हुंकार: “नक्शे से मिटा देंगे ईरान का नामोनिशान”
इस हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने शनिवार देर रात अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर ईरान को सीधे शब्दों में धमकी दे डाली।
ट्रंप ने लिखा:
“अब शरीफ़ और तार्किक बने रहने का समय खत्म हो चुका है। अगर हमें मजबूर किया गया, तो हम मिलिट्री के जरिए उस काम को पूरी तरह खत्म कर देंगे जिसे हमने बहुत कामयाबी से शुरू किया था। और अगर ऐसा हुआ, तो याद रखना—दुनिया के नक्शे पर ईरान का नामोनिशान नहीं बचेगा!”
ईरान का पलटवार: “अगले 30 दिन हॉर्मुज पर सिर्फ हमारा राज होगा”
दूसरी तरफ ईरान भी झुकने को तैयार नहीं है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) ने रविवार को इराक से लाइव आकर अमेरिका और पूरी दुनिया को खुली चुनौती दे दी।
उन्होंने साफ कहा:
“स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज अगले 30 दिनों तक पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ ईरान के कंट्रोल और मैनेजमेंट में रहेगा। जब तक यहां से सारे खतरे साफ नहीं हो जाते, तब तक हम इस रास्ते को पूरी क्षमता से नहीं खोलेंगे। कोई भी नया नाटक या हमला इस रास्ते को और लंबे समय के लिए बंद कर देगा। अगर अमेरिका और उसके साथियों ने MoU के नियमों का पालन नहीं किया, तो यह डील हमेशा के लिए खत्म।”
एक्सपर्ट्स का डर: अनजाने में शुरू न हो जाए वर्ल्ड वॉर-3!
डिफेंस एक्सपर्ट वोल्फगैंग पुसजतेई (Wolfgang Pusztai) का मानना है कि न तो अमेरिका इस समय फुल-स्केल वॉर चाहता है और न ही ईरान की आर्थिक हालत ऐसी है कि वह अमेरिका से सीधी जंग झेल सके। लेकिन असली खतरा ‘मिसकैल्कुलेशन’ का है।
अगर ईरान की मिसाइलों से बहरीन या कुवैत में आम नागरिक मारे जाते हैं, या किसी अमेरिकी बेस पर अमेरिकी सैनिकों की मौत हो जाती है, तो स्थिति नेताओं के हाथ से निकल जाएगी। फिर कोई कूटनीति काम नहीं आएगी और अनजाने में एक महायुद्ध छिड़ जाएगा।
हमारे और आपके बजट पर क्या होगा असर?
यह लड़ाई सिर्फ न्यूज़ चैनलों तक सीमित नहीं है, इसका सीधा असर आपकी और हमारी जेब पर पड़ने वाला है।
- 20% ग्लोबल ऑयल सप्लाई: दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी सँकरे ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ के रास्ते होकर पूरी दुनिया में जाता है।
- बढ़ेगी महंगाई: अगर ईरान ने इस रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया या जहाजों पर बमबारी जारी रही, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे और साल 2026 की शुरुआत में जो ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस (Global Energy Crisis) शुरू हुआ था, वह पूरी दुनिया को एक भयानक मंदी के कुएं में धकेल देगा।
क्या अब जंग ही आखिरी रास्ता है?
28 जून 2026 की यह सुबह इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में दर्ज हो सकती है। 17 जून को जिस शांति की उम्मीद जगी थी, वह महज 11 दिनों में खत्म हो गई। अब सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि ओमान और कतर जैसे देश अगले 24 घंटों में अमेरिका और ईरान का गुस्सा शांत करवा पाते हैं या नहीं। वरना, मिडल ईस्ट की यह आग पूरी दुनिया को झुलसाने के लिए तैयार बैठी है।



