गांधीनगर, गुजरात: भारत के स्वास्थ्य सेवा परिदृश्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली अध्याय जुड़ गया है। केंद्र सरकार के ‘टीबी मुक्त भारत अभियान’ के अंतर्गत, गुजरात ने अपनी उत्कृष्ट कार्यप्रणाली, अटूट संकल्प और जन-भागीदारी के दम पर वर्ष 2025 के लिए ‘स्टेट्स विद मोस्ट इम्प्रूवमेंट’ (सबसे अधिक सुधार करने वाले राज्य) श्रेणी में पूरे भारत में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। यह उपलब्धि केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह लाखों लोगों के जीवन को नई रोशनी देने का एक सफल मिशन है।
टीबी उन्मूलन का व्यापक सफर: एक गहन तुलनात्मक विश्लेषण
टीबी जैसी जटिल बीमारी के खिलाफ गुजरात की यह जीत एक सोची-समझी रणनीतिक योजना का परिणाम है। पिछले एक दशक में राज्य ने स्वास्थ्य ढांचे को जिस तरह से सुदृढ़ किया है, उसका प्रभाव अब जमीनी स्तर पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
ऐतिहासिक संदर्भ बनाम वर्तमान रुझान
यदि हम 2015 के आधार वर्ष से वर्तमान 2026 तक के आंकड़ों की तुलना करें, तो यह स्पष्ट होता है कि राज्य ने टीबी के ‘बोझ’ को कम करने में अभूतपूर्व प्रगति की है:
- टीबी के नए मामलों में कमी: 2015 के मुकाबले 2023 तक टीबी के नए मामलों में 34 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
- मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी: टीबी से होने वाली मौतों की दर में 37 प्रतिशत की भारी कमी आई है, जो स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और समय पर इलाज की उपलब्धता को प्रमाणित करती है।
वर्तमान स्थिति: वर्ष 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में प्रति एक लाख आबादी पर अनुमानित 186 नए मामले दर्ज किए गए। इस प्रदर्शन के साथ, गुजरात देश में ‘सबसे कम टीबी बोझ’ वाले राज्यों की सूची में छठे स्थान पर और बड़े राज्यों की श्रेणी में चौथे स्थान पर काबिज है।
सफलता के चार स्तंभ: गुजरात मॉडल की बारीकियां
कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की अध्यक्षता में राज्य सरकार के प्रवक्ता मंत्री जीतू वाघाणी ने इस शानदार प्रदर्शन के पीछे के प्रमुख कारकों को विस्तार से समझाया है:
1. सक्रिय केस फाइंडिंग (एसीएफ़) अभियान
गुजरात ने टीबी के मामलों को खोजने के लिए निष्क्रियता के बजाय सक्रिय दृष्टिकोण अपनाया। 24 मार्च से शुरू हुए ‘100-दिवसीय विशेष अभियान’ ने दुर्गम और उच्च जोखिम वाले इलाकों तक पहुंच बनाई।
- स्क्रीनिंग की पहुंच: 23.38 लाख लोगों की व्यापक टीबी स्क्रीनिंग की गई।
- तकनीकी जांच: 15.04 लाख लोगों का चेस्ट एक्स-रे और 5.05 लाख लोगों की अत्याधुनिक NAAT जांच की गई, जिससे 32,377 नए मरीजों की पहचान करना संभव हुआ।
2. आर्थिक और पोषण सुरक्षा: निक्षय पोषण योजना
इलाज के दौरान मरीज का पोषण सबसे महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार ने निक्षय पोषण योजना के तहत वर्ष 2025 में 1,05,238 मरीजों को 57.60 करोड़ रुपये की प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता (DBT) प्रदान की है। यह सहायता मरीजों को इलाज जारी रखने के लिए प्रेरित करती है।
3. सामुदायिक भागीदारी: निक्षय मित्र की शक्ति
टीबी उन्मूलन अब सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन बन गया है। राज्य में अब तक 30,992 ‘निक्षय मित्र’ पंजीकृत हो चुके हैं। इन मित्रों ने 5,50,184 पोषण किट वितरित की हैं, जो सरकारी प्रयासों और सामाजिक उत्तरदायित्व के मेल का एक आदर्श उदाहरण है।
4. ग्रासरूट गवर्नेंस: टीबी मुक्त पंचायत
स्थानीय स्वशासन को शामिल करना गुजरात की सबसे बड़ी सफलता रही है। वर्ष 2025 में राज्य की 3,971 ग्राम पंचायतों ने ‘टीबी मुक्त पंचायत’ का दर्जा हासिल किया, जो राज्य की कुल ग्राम पंचायतों का 27 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि सरपंचों और ग्राम समितियों ने इस मिशन को अपना व्यक्तिगत लक्ष्य माना है।
2026 की उपलब्धियों पर एक नजर
वर्ष 2026 के शुरुआती पांच महीनों (जनवरी से मई) में राज्य ने केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित 58,333 के लक्ष्य के मुकाबले 57,334 मरीजों की पहचान की, जो लक्ष्य का 98.3 प्रतिशत है। इसमें सबसे सुखद पहलू यह है कि इनमें से 50,928 (करीब 91 प्रतिशत) मरीज अब पूरी तरह से टीबी मुक्त हो चुके हैं। यह सफलता दर गुजरात के चिकित्सा तंत्र की विश्वसनीयता और मरीजों के विश्वास को दर्शाती है।
भविष्य की दिशा और निष्कर्ष
गुजरात सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह प्रथम स्थान उनके लिए पूर्णता नहीं, बल्कि और अधिक कार्य करने का प्रोत्साहन है। भविष्य में डिजिटल निगरानी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित डायग्नोस्टिक्स और जमीनी स्तर पर जन-भागीदारी को और अधिक तेज किया जाएगा।
टीबी के खिलाफ गुजरात का यह सफर देश के अन्य राज्यों के लिए एक ‘ब्लूप्रिंट’ की तरह है। सही नीतियां, समय पर निदान और समाज की सक्रिय भागीदारी से किसी भी चुनौती को परास्त किया जा सकता है। गुजरात का यह मॉडल आने वाले समय में भारत को वैश्विक टीबी उन्मूलन लक्ष्यों की ओर ले जाने में एक निर्णायक भूमिका निभाएगा।




