नई दिल्ली: प्रशांत महासागर की गहराइयों से निकलने वाली अल नीनो प्रक्रिया दुनिया भर के मौसम को हिला देने वाली ताकत रखती है। भारत के मानसून से लेकर दक्षिण अमेरिका की बाढ़ तक, यह घटना लाखों जिंदगियों को प्रभावित करती है। लेकिन अब वैज्ञानिकों की एक ताजा खोज से साफ हो गया है कि बढ़ते ग्लोबल तापमान (Global Warming) के चलते यह प्राकृतिक चक्र आने वाले समय में पूरी तरह से रूप बदल सकता है, जिससे मौसम की भविष्यवाणी आसान तो होगी, लेकिन खतरे भी कहीं ज्यादा गंभीर।
रिसर्च के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?
दक्षिण कोरिया, अमेरिका, जर्मनी और आयरलैंड के विशेषज्ञों की संयुक्त टीम ने ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ जर्नल में अपना पेपर पेश किया है। उन्होंने हाई-टेक क्लाइमेट सिमुलेशन का सहारा लिया और पाया कि अगले तीन से चार दशकों में अल नीनो-ला नीना का मौजूदा अनियमित पैटर्न एक सख्त, घड़ी जैसी रेगुलरिटी में ढल सकता है। वर्तमान में यह हर दो से सात साल में कभी हल्का, कभी तगड़ा आता-जाता है। लेकिन गर्म होती धरती पर यह चक्र इतना मजबूत हो जाएगा कि तापमान के उफान और गिरावट की लय तय हो जाएगी, पूर्वानुमान तो आसान, लेकिन तबाही का स्केल भी बड़ा।
इस ट्रांसफॉर्मेशन की जड़ में क्या है?
सबसे बड़ा दोषी है पृथ्वी का तेजी से बढ़ता हीट लेवल, जो समुद्र और हवा के बीच के कनेक्शन को और गहरा कर रहा है। गर्म पानी की सतह ज्यादा एनर्जी रिलीज करती है, जिससे प्रशांत में हवाओं का फ्लो और तापमान एक-दूसरे से इतना तालमेल बिठा लेंगे कि पूरा सिस्टम सेल्फ-सस्टेनिंग हो जाएगा। शोध में इसे ‘क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट’ कहा गया है, जैसे कोई सिस्टम अस्थिर होकर खुद ही एक फिक्स्ड रिदम में कूद पड़े। इससे अल नीनो महज एक घटना नहीं, बल्कि एक लगातार दोलन बन सकता है।
वैश्विक मौसम सिस्टम्स का नया कनेक्शन
यह बदलाव सिर्फ प्रशांत तक सीमित नहीं रहेगा। स्टडी बताती है कि अल नीनो अब अन्य बड़े प्लेयर्स से लिंक-अप कर सकता है, जैसे:
- नॉर्थ अटलांटिक ऑसिलेशन (जो यूरोप के मौसम को कंट्रोल करता है)
- इंडियन ओशन डाइपोल (हिंद महासागर की वार्मिंग पैटर्न)
- ट्रॉपिकल नॉर्थ अटलांटिक (अटलांटिक के उष्णकटिबंधीय हिस्से)
- परिणाम? दुनिया के अलग-अलग कोनों के मौसम एक ही बीट पर थिरकने लगेंगे, जैसे कई स्विंग्स एक साथ झूलें। इससे कुछ जगहों पर रेनफॉल और ड्रॉट के एक्सट्रीम्स और तेज हो जाएंगे।
क्या होंगे असर: फायदे और नुकसान?
अगर अल नीनो रेगुलर हो गया, तो फ्लड्स और ड्राई स्पेल्स के शॉक वैल्यू में इजाफा होगा। उदाहरण के तौर पर, कैलिफोर्निया के साउथर्न पार्ट्स या स्पेन-पूर्तगाल का आइबेरियन पेनिनसुला-एक साल डूबन, दूसरे साल जलन। भारत में मानसून पर इसका रिफ्लेक्शन दिखेगा, जो किसानों और वॉटर मैनेजमेंट को झकझोर देगा। इकोसिस्टम्स को भी झटका लगेगा, क्योंकि क्रॉप्स और वाइल्डलाइफ अनियमितता से जूझेंगे। हालांकि, सिल्वर लाइनिंग यह है कि रेगुलर पैटर्न से वेदर फोरकास्टिंग शार्प हो जाएगी। लेकिन वैज्ञानिक चेताते हैं: चरम इवेंट्स के लिए अभी से प्लानिंग जरूरी है, वरना इकोनॉमी और ह्यूमन लाइफ्स पर ब्रेकिंग पॉइंट आ सकता है।
मॉडलिंग टेक्नोलॉजी ने कैसे मदद की?
टीम ने अल्फ्रेड वेगेनर इंस्टीट्यूट का एडवांस्ड AWI-CM 3 मॉडल यूज किया, जो एटमॉस्फियर में 31 किमी और ओशियन में 4-25 किमी रेजोल्यूशन पर रन होता है। हाई एमिशन स्केनैरियो के तहत सिमुलेट करके रियल-वर्ल्ड डेटा से मैच किया गया। दिलचस्प यह कि दूसरे मॉडल्स भी इसी ट्रेंड की ओर इशारा कर रहे हैं।
आगे की राह: अलर्ट और एक्शन
यह फाइंडिंग एक बड़ा अलार्म है, ह्यूमन-कॉज्ड वार्मिंग न सिर्फ थर्मामीटर को ऊपर धकेल रही, बल्कि धरती की मौसमी रिदम को ही री-डिजाइन कर रही है। अगर अल नीनो ‘क्लॉकवर्क’ बन गया, तो ग्लोबल पैटर्न्स उसकी धुन पर नाचेंगे, जिससे फूड सिक्योरिटी, वॉटर रिसोर्सेज और डिजास्टर रेडीनेस पर प्रेशर पड़ेगा। रिसर्चर्स अब हाई-रेज (4-9 किमी) मॉडल्स से ग्लोबल सिंक्रोनाइजेशन को डिकोड करने में जुटे हैं, क्या अन्य ओशियंस भी वैसा ही बर्ताव करेंगे? कुल मिलाकर, यह स्टडी कहती है: क्लाइमेट चेंज सिर्फ हीट नहीं, बल्कि सिम्फनी का पूरा स्कोर बदल रहा। हमें फोरकास्टिंग को सुपरचार्ज करना होगा, रिसोर्स मैनेजमेंट को स्मार्ट बनाना होगा और ग्लोबल टीमवर्क को स्ट्रॉन्ग, ताकि नई रिदम में कदम मिला सकें, न कि पीछे धकेले जाएं।



