GalaxEye का ‘मिशन दृष्टि’: भारतीय प्राइवेट स्पेस सेक्टर में तकनीक का नया ‘मिशन’

बेंगलुरु के स्पेस-टेक स्टार्टअप GalaxEye ने अपने पहले उपग्रह 'मिशन दृष्टि' (Mission Drishti) के जरिए अंतरिक्ष में भारत की निजी क्षमता का लोहा मनवाया है। 3 मई को एलोन मस्क की कंपनी SpaceX के रॉकेट से लॉन्च इस सैटेलाइट ने अंतरिक्ष में कई जटिल प्रणालियों को सफलतापूर्वक जांचा। हालांकि, एक सौर तूफान (Solar Storm) के कारण अंत में इसका संपर्क टूट गया, लेकिन इस मिशन से मिले डेटा के दम पर कंपनी अगले 24 महीनों में दो और एडवांस सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए तैयार है।

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बेंगलुरु। भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाने वाला बेंगलुरु अब केवल सॉफ्टवेयर ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान (Space Science) में भी देश का झंडा बुलंद कर रहा है। बेंगलुरु स्थित स्पेस टेक्नोलॉजी स्टार्टअप GalaxEye ने हाल ही में अपने महत्वाकांक्षी उपग्रह (Satellite) अभियान ‘Mission Drishti’ के परिणामों की घोषणा की है। यह मिशन भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र (Private Space Sector) के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है, जिसने यह साबित कर दिया कि भारतीय युवा वैज्ञानिक और स्टार्टअप्स वैश्विक स्तर की तकनीक विकसित कर सकते हैं।

क्या है ‘मिशन दृष्टि’ और OptoSAR तकनीक?

आम तौर पर अंतरिक्ष से पृथ्वी की तस्वीरें लेने के लिए दो तरह के कैमरों या सेंसर का उपयोग होता है:

  1. ऑप्टिकल (Optical): जैसे हमारे मोबाइल का कैमरा, जो रात में या बादलों के होने पर साफ तस्वीरें नहीं ले पाता।
  2. सार (SAR – Synthetic Aperture Radar): यह रडार तकनीक है, जो बादलों और अंधेरे को चीरकर भी साफ इमेज दे सकती है।

GalaxEye ने इन दोनों को मिलाकर दुनिया की पहली OptoSAR तकनीक विकसित की है। यानी एक ही सैटेलाइट में ऑप्टिकल और रडार दोनों की ताकत। इसी तकनीक को टेस्ट करने के लिए 3 मई को SpaceX के एक मिशन के जरिए ‘मिशन दृष्टि’ सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजा गया था।

मिशन की बड़ी कामयाबियां:

लॉन्च के तुरंत बाद, इस सैटेलाइट ने अंतरिक्ष में बेहद महत्वपूर्ण चरणों को सफलतापूर्वक पार किया:

  • कम्युनिकेशन (Communication): बेंगलुरु स्थित कंपनी के अपने ‘इन-हाउस’ मिशन कंट्रोल सेंटर से सैटेलाइट का संपर्क पहली ही बार में बेहतरीन तरीके से स्थापित हुआ।
  • LEOP चरण: इसे Launch and Early Orbit Phase कहते हैं। यह सैटेलाइट के जीवन का सबसे संवेदनशील समय होता है जब वह रॉकेट से अलग होकर अपनी कक्षा (Orbit) में सेट होता है। सैटेलाइट ने इसका एक बड़ा हिस्सा सफलतापूर्वक पूरा किया।
  • सिस्टम टेस्टिंग: अंतरिक्ष के शून्य तापमान और दबाव में सैटेलाइट के स्पेसक्राफ्ट सिस्टम, डिप्लॉयमेंट मैकेनिज्म (पंखे या सोलर पैनल का खुलना), एटिट्यूड कंट्रोल (दिशा नियंत्रण), ऑनबोर्ड कंप्यूटिंग और कम्युनिकेशन तकनीकों का सफल परीक्षण किया गया।

इस अभूतपूर्व सफलता के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दुनिया भर के स्पेस एक्सपर्ट्स ने GalaxEye की टीम की सराहना की है।

अंतरिक्ष का मौसम और एक अप्रत्याशित चुनौती

विज्ञान की राह में चुनौतियां आना आम बात है। ‘मिशन दृष्टि’ जब अपने LEOP के अंतिम चरण में था, तभी अंतरिक्ष में एक बड़ी घटना हुई। सूरज से निकलने वाले खतरनाक रेडिएशन और चार्ज्ड पार्टिकल्स के कारण अंतरिक्ष में एक जियोमैग्नेटिक सोलर स्टॉर्म (Geomagnetic Solar Storm – भू-चुंबकीय सौर तूफान) आया।

शुरुआती जांच में सामने आया है कि इस सौर तूफान से निकले खतरनाक रेडिएशन ने सैटेलाइट के एक बेहद महत्वपूर्ण (Critical) सिस्टम को प्रभावित कर दिया। इसके बाद सैटेलाइट से सिग्नल कमजोर होने लगे और धीरे-धीरे संपर्क टूट गया। हालांकि कंपनी की टीम अभी भी संपर्क बहाल करने (Re-establish communication) की कोशिश कर रही है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अब इसकी संभावना काफी कम है।

मिशन दृष्टि हमारी टीम की वर्षों की कड़ी मेहनत, इनोवेशन और इंजीनियरिंग का परिणाम है। इस चुनौती के बावजूद, हमें जो मूल्यवान डेटा और सीख मिली है, वह हमारे भविष्य के मिशनों को और अधिक मजबूत और सुरक्षित बनाएगी।”

— सुयश सिंह, संस्थापक और सीईओ, GalaxEye

भविष्य का खाका: अगले 24 महीनों में दो नए सैटेलाइट

इस मिशन को अधूरा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसने अर्थ ऑब्जर्वेशन (Earth Observation) के क्षेत्र में सैटेलाइट को डिजाइन करने, बनाने, लॉन्च करने और उसे ऑपरेट करने की पूरी इन-हाउस क्षमता को 100% साबित कर दिया है।

अब GalaxEye अपनी सप्लाई चेन, मैन्युफैक्चरिंग (उत्पादन) और सैटेलाइट डेवलपमेंट की पूरी प्रक्रिया को इन-हाउस (अपने खुद के सेंटर्स में) करने जा रही है। इस अनुभव के आधार पर वे अपने अगले जेनरेशन के स्पेसक्राफ्ट डिजाइन को और मजबूत बना रहे हैं ताकि वे भविष्य में सौर तूफानों को भी झेल सकें। कंपनी ने कमर कस ली है और अगले 24 महीनों के भीतर दो नए एडवांस OptoSAR सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी शुरू कर दी है।

ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान रुझान (Comparative Analysis)

यदि हम भारत के अंतरिक्ष इतिहास पर नजर डालें, तो भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में एक बहुत बड़ा बदलाव आया है:

पैमाना (Parameter)पारंपरिक दौर (ISRO युग)आधुनिक दौर (प्राइवेट स्पेस टेक ट्रेंड)
मुख्य भूमिकापूरी तरह सरकारी नियंत्रण (ISRO)निजी स्टार्टअप्स (जैसे GalaxEye, Pixxel, Skyroot)
तकनीक का प्रकारकेवल ऑप्टिकल या केवल SAR सैटेलाइटहाइब्रिड तकनीक (जैसे OptoSAR – दोनों का मिश्रण)
निर्माण की गतिसरकारी प्रक्रियाओं के कारण लंबा समयइन-हाउस मैन्युफैक्चरिंग से तेज विकास चक्र (Fast Development)
लॉन्च पार्टनरकेवल भारत का PSLV/GSLV रॉकेटवैश्विक स्तर पर SpaceX जैसे रॉकेट्स का चयन

इतिहास की सीख

पहले के दौर में अंतरिक्ष मिशन केवल सरकार तक सीमित थे। लेकिन 2020 में भारत सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद से, भारतीय स्टार्टअप्स ने गजब की रफ्तार पकड़ी है। जहाँ पहले सैटेलाइट बनाने में सालों लगते थे, वहीं अब ये कंपनियां कुछ ही महीनों में अत्याधुनिक पेलोड तैयार कर रही हैं।

वैश्विक रुझान (Global Trends) की बात करें तो आज पूरी दुनिया ‘रीयल-टाइम डेटा’ और ‘ऑल-वेदर इमेजरी’ (हर मौसम में साफ दिखने वाली तस्वीरें) की मांग कर रही है। कृषि, रक्षा, आपदा प्रबंधन (Disaster Management) और समुद्री सुरक्षा में ऐसी तस्वीरों की भारी जरूरत है। GalaxEye की OptoSAR तकनीक इसी वैश्विक मांग को पूरा करने की दिशा में भारत का सबसे बड़ा और ठोस कदम है। सौर तूफान से आई रुकावट महज एक स्पीड ब्रेकर है, भारतीय स्पेस-टेक का यह सफर अब रुकने वाला नहीं है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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