नई दिल्ली: हर साल 14 अक्टूबर को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय ई-कचरा (E-waste) दिवस मनाया जाता है। इस दिन का मकसद इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती समस्या पर लोगों का ध्यान खींचना और पुराने गैजेट्स को सही तरीके से रीसाइकल करने के लिए प्रेरित करना है। इसकी शुरुआत 2018 में वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट फोरम ने की थी, ताकि लोग अपने फालतू पड़े इलेक्ट्रॉनिक सामान को जिम्मेदारी से हैंडल करें। वैश्विक स्तर पर ई-कचरा एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में करीब 62 अरब किलोग्राम इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा हुआ, जो इतना ज्यादा है कि अगर इसे ट्रकों में भरकर पृथ्वी की कमर के चारों ओर सजाया जाए, तो पूरी घेराबंदी हो जाए। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर यही रफ्तार रही, तो 2030 तक यह आंकड़ा 82 अरब किलोग्राम तक छू सकता है। समस्या यह है कि ई-कचरा पैदा होने की स्पीड उसकी सही कलेक्शन और रीसाइक्लिंग से कहीं ज्यादा तेज है, लगभग पांच गुना। इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशन यूनियन का कहना है कि यह दुनिया के सबसे जटिल कचरा स्रोतों में से एक है। 2020 की ग्लोबल ई-वेस्ट रिपोर्ट बताती है कि 2019 में 5.36 करोड़ टन कचरा निकला, लेकिन सिर्फ 17 प्रतिशत का ही ठीक से निपटारा हुआ।
दोबारा इस्तेमाल करने से न सिर्फ पैसा बचता
ई-कचरा न सिर्फ खतरा है, बल्कि इसमें छिपे मौके भी हैं। इसमें सोना, तांबा, एल्युमिनियम, लिथियम जैसे कीमती मेटल्स और क्रिटिकल रॉ मैटेरियल्स भरे पड़े हैं। इन्हें दोबारा इस्तेमाल करने से न सिर्फ पैसा बचता है, बल्कि पर्यावरण और सेहत की रक्षा भी होती है। अगर इसे गलत तरीके से फेंका जाए, तो इसमें मौजूद जहर जैसे लेड, मर्करी और कैडमियम जमीन और पानी को दूषित कर देते हैं, जिससे सांस की दिक्कतें, स्किन प्रॉब्लम्स और दूसरी बीमारियां फैल सकती हैं। इस साल 2025 की थीम है अपना ई-कचरा रीसाइकल करो, यह बेहद जरूरी है। यह हमें बताती है कि पुराने गैजेट्स से निकलने वाले इन तत्वों को दोबारा हासिल करना कितना महत्वपूर्ण है, खासकर आज की दुनिया में जहां इनकी सप्लाई पर झगड़े चल रहे हैं। ये वही चीजें हैं जो फोन, लैपटॉप, बैटरी और सोलर पैनल्स बनाने में काम आती हैं, लेकिन ज्यादातर लोग नहीं जानते कि इन्हें घर के पुराने सामान से निकाला जा सकता है।
यूरोप में इस दिशा में अच्छे कदम उठाए जा रहे
यूरोप में इस दिशा में अच्छे कदम उठाए जा रहे हैं। हाल ही में लागू हुए क्रिटिकल रॉ मैटेरियल्स एक्ट के तहत 2030 तक इनकी सालाना खपत का 25 प्रतिशत हिस्सा रीसाइक्लिंग से पूरा करने का लक्ष्य है। इसके लिए कचरा इकट्ठा करने और नई टेक्नोलॉजी पर फोकस है। रिसर्च से पता चला है कि अगर ई-कचरे से चुनिंदा तरीके से इन मेटल्स निकाले जाएं, तो यूरोपीय यूनियन की मौजूदा जरूरत का 31 प्रतिशत तक पूरा हो सकता है। लेकिन अभी के कानूनों में वजन के आधार पर कलेक्शन पर ज्यादा जोर है, जो इन कीमती चीजों के रीयूज को सीमित कर देता है। भारत की बात करें तो यहां ई-कचरा उत्पादन में तीसरा नंबर है। डिजिटल डिवाइसेज का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जिससे कचरा भी बढ़ता जा रहा है। राज्यसभा में दिसंबर 2024 में दिए गए डेटा से पता चलता है कि 2019-20 में 10.1 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 17.51 लाख मीट्रिक टन हो गया – यानी 72.5 प्रतिशत की उछाल। यहां ई-कचरा मैनेजमेंट के नियम तो हैं, लेकिन रीसाइक्लिंग का ज्यादातर काम अनऑफिशियल सेक्टर करता है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है और कीमती मेटल्स को बर्बाद करता है।
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आगे क्या?
सिर्फ नियम और टेक्नोलॉजी से काम नहीं चलेगा। असली बदलाव तो आम लोगों की भागीदारी से आएगा। एक स्टडी में पाया गया कि औसत घर में 74 इलेक्ट्रॉनिक चीजें होती हैं, जिनमें से 9 काम करने लायक होने पर भी इस्तेमाल नहीं होतीं, और 4 खराब होकर पड़ी रहती हैं। मतलब, घरों में ही ढेर सारा रिसोर्स फंसा हुआ है। अगर लोग अपने पुराने फोन, लैपटॉप, चार्जर वगैरह को ऑथराइज्ड सेंटर्स पर दें, तो इन्हें दोबारा काम में लाया जा सकता है। इससे पर्यावरण बचेगा, अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और रिसोर्स सिक्योरिटी बढ़ेगी। ई-कचरा अब ग्लोबल क्राइसिस है, लेकिन इसका हल हमारे पास ही है। अगर हर शख्स यह वादा करे कि पुराना सामान फेंकने की बजाय रीसाइकल करेगा, तो बड़ा फर्क पड़ सकता है।



