पटना: 70 के दशक में बिहार से उठे छात्र आंदोलन ने पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ जनआक्रोश की लहर पैदा कर दी थी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तमाम प्रयासों के बाद भी आक्रोश गहराता ही गया। आपात काल के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई थी। यह उथल-पुथल का दौर था। जनता पार्टी की सरकार बनते ही कांग्रेस शासित नौ राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया, उसमें बिहार भी शामिल था।
बिहार में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो यहां भी जनता पार्टी की सरकार बनी। 24 जून 1977 को कर्पूरी ठाकुर सीएम बने। वे एक साल 301 दिन तक सीएम की कुर्सी पर रहे, लेकिन प्रदेश में अराजकता पहले की ही तरह कायम था। इसके बाद वह आंतरिक उठापटक के शिकार हो गए और कुर्सी छोड़नी पडी। फिर राम सुंदर दास ने कुर्सी संभाली। वह 302 दिनों तक मुख्यमंत्री पद पर रहे। इसी बीच केंद्र में फिर कांग्रेस की पुनर्वापसी हुई तो बिहार में राष्ट्रपति शासन लगा दिया, जो आठ जून 1980 तक चला। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में राज्य में कांग्रेस की पुनर्वापसी हो गई। फिर लगातार दो चुनावों में कांग्रेस को राज्य में जीत मिली।
लालू का उभार हुआ था शुरू, इसी बीच कर्पूरी ठाकुर का हो गया देहावसान
इस बीच प्रदेश में कर्पूरी ठाकुर विपक्ष के नेता थे। वह पिछडे और दलित वर्ग मंग वे मसीहा के रूप में जाने जाते थे। दांव पेंच में बहुत माहिर थे। इस बीच लालू प्रसाद यादव का राजनीति में उभार शुरू हो गया था। इसी दौरान 17 फरवरी 1988 को कर्पूरी ठाकुर का देहावसान हो गया। उधर, लालू प्रसाद जनता के बीच काफी लोकप्रिय हो गए थे। काफी उहापोह के बाद देवी लाल और शरद यादव ने लालू प्रसाद यादव को विपक्ष के नेता के तौर पर चयनित किया।
1989 में हुए भागलपुर के दंगे की आग में झुलस गई कांग्रेस
इसी बीच कांग्रेस के शासन काल में अक्टूबर 1989 में भागलपुर में दंगा शुरू हो गया, जो शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। उस दंगे की आग में हजारों लोग झुलस गए और इसी आग में कांग्रेस की राजनीति भी झुलसती रही। जन आक्रोश को कम करने के लिए कांग्रेस ने सत्येन्द्र नारायण को हटाकर जगन्नाथ मिश्र को सीएम की कुर्सी पर बैठाया, लेकिन वह भी काम नहीं आ सका।
वरिष्ठ पत्रकार और वर्तमान में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण ने कहा
वरिष्ठ पत्रकार और वर्तमान में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण का कहना है कि भागलपुर दंगों ने ही कांग्रेस की नींव हिला दी। वह बहुत दिनों तक चलता रहा और उस पर शासन का नियंत्रण नहीं था। उसके बाद कांग्रेस को एक स्पेशल आफिसर ए.के. सिंह को वहां भेजना पड़ा। तब तक दंगे की चपेट में बडी संख्या में लोग आ चुके थे और उसने कांग्रेस की नींव हिला दी और कांग्रेस को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
जब 71 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस
इसी बीच केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार बन गई थी। दो दिसंबर 1989 को भारत के सातवें पीएम के रूप में उन्होंने शपथ ली थी। इस बीच बिहार में भी फरवरी 1990 में चुनाव हुए। 1990 के चुनाव की विशेषता यह थी कि पहली बार पिछड़ी जाति के विधायकों की संख्या अगड़ी जाति के विधायकों से अधिक थी। वैसे तो यह 1972 के बाद से ही बढ़ने लगी थी, लेकिन 1990 में यह आंकडा काफी आगे निकल गया। जनता दल 121 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, तो कांग्रेस 71 सीटों पर सिमट गई।
वीपी सिंह की पसंद थे राम सुंदर दास, लालू को मिला देवी लाल का समर्थन
चुनाव के बाद जनता दल का नेता चुनने की बात शुरू हुई। इसमें सीएम पद के उम्मीदवार तौर पर लालू यादव को उप प्रधानमंत्री देवी लाल का समर्थन हासिल था। वहीं वीपी सिंह की पसंद राम सुंदर दास थे। रघुनाथ झा का समर्थन चंद्रशेखर कर रहे थे। उस समय तक लालू की पहचान कद्दावर नेता के तौर नहीं थी। वह हंसी मजाक वाले नेता के तौर पर जाने जाते थे
नीतीश सहित युवा नेताओं ने किया लालू का समर्थन और बन गए विधायक दल के नेता
विधायक दल के नेता चुनाव की बारी आई तो नीतीश सहित छात्र राजनीति से निकले तमाम युवा नेताओं ने लालू प्रसाद यादव का समर्थन किया। वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल कहते हैं कि उस समय नीतीश लालू प्रसाद यादव के हनुमान कहे जाते थे। दोनों की जोड़ी आमजन में बहुत खास मानी जाती थी। विधायक दल की बैठक में लालू को 58 मत मिले, वहीं राम सुंदर को 54 मत, जबकि रघुनाथ झा को 14 मत मिले थे। इस तरह सर्वाधिक मत पाकर लालू प्रसाद विधायक दल के नेता चुन लिए गए और वे सीएम की कुर्सी पर पहुंच गए।
लालू को खुद को बताया था बिहार का चंद्रगुप्त
उस समय तक बिहार में 24 मुख्यमंत्री बन चुके थे। आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शंभु नारायण कहते हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद जब एक पत्रकार ने लालू से पूछा कि जनता दल में आपके बहुत ज्यादा आलोचक हैं, तो लालू ने कहा था, उन्हें चाणक्य बने रहने दीजिए, बिहार का चंद्रगुप्त तो मैं ही हूं। इसके बाद बिहार में पहली बार सार्वजनिक शपथ ग्रहण का कार्यक्रम हुआ। बिहार की जनता शपथ ग्रहण में शामिल हुई और लालू की लोकप्रियता लोगों में काफी बढ़ गई।
जब सीएम आवास जाने से कर दिया इनकार। लालू प्रसाद हमेशा सुर्खियों में बने रहना पसंद करते थे। इसके लिए वे आमजनों से जुड़े निर्णय हर वक्त लेते रहते। उन्होंने शुरुआती दिनों में उन्होंने सीएम आवास जाने से इनकार कर दिया और वहीं पर अपने भाई के मकान के एक कमरे में रहने लगे। उनमें खबर जनरेट करने की अद्भुत झमता थी। वहीं एक कमरे से ही अधिकारियों को आदेश देते। लोगों की भीड़ भी जुटने लगी थी। रात को वे सड़कों पर निकल जाते। औचक निरीक्षण करते और खामी पाए जाने तत्काल अधिकारियों के निलंबन का आदेश दे देते। रात को ही अवैध निर्माण गिराए जाने लगे।
दूध वालों की दिक्कत देख सड़कों से हटवा दिया स्पीड ब्रेकर
भीड़ बढने से उनका एक कमरे का आवास छोटा पड़ने लगा। इसके बाद उन्होंने सीएम आवास में जाने फैसला लिया। सीएम आवास भी आमजनों के लिए खुला रहता था। लालू प्रसाद हमेशा सामान्य ढंग से रहते और सुर्खियों में बने रहने के लिए तरह-तरह के आयोजन करते रहते थे। कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने सड़कों से स्पीड ब्रेकर हटाने का फैसला किया। इसका कारण उन्होंने बताया कि दूधिया दूध लेकर जाते हैं तो ब्रेकर के कारण उनका दूध गिरता है।
जब रोक दिया लाल कृष्ण आडवाणी का रथ
उसी समय सितंबर में अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए लाल कृष्ण आडवाणी रथ यात्रा पर निकले। जब रथयात्रा पटना पहुंची तो जन सैलाब उमड़ पड़ा। आडवाणी पर सौहार्द्र बिगाड़ने के आरोप लग रहे थे, लेकिन आडवाणी इसे विरोधियों की साजिश बता रहे थे। पटना से जैसे ही समस्तीपुर के लिए आडवाणी रवाना हुए, तब तक वहां प्रशासन ने उनकी गिरफ्तारी की तैयारी कर चुका था। आडवाणी ने उसमें वीपी सिंह का समर्थन देखा। इसके बाद भाजपा ने वीपी सिंह से अपना समर्थन वापस ले लिया। केंद्र की सरकार गिर गयी, लेकिन लालू अपने फैसले पर कायम रहे। इसके बाद पूरा देश सांप्रदायिक दंगे में झुलस गया।
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वरिष्ठ पत्रकार आलोक शुक्ला ने कहा
वरिष्ठ पत्रकार और कई बड़े बैनरों में संपादक रह चुके आलोक शुक्ला का कहना है कि उस समय मुलायम सिंह पहले ही बिहार से निकलकर उत्तरप्रदेस में आने पर देवरिया में आडवाणी के रथ को रोकने की तैयारी कर चुके थे। क्रेडिट की होड में मुलायम आगे न निकल जाएं, इसको ध्यान में रखकर लालू प्रसाद ने अपने ही प्रदेश में आडवाणी को रोककर अल्पसंख्यकों की सहानुभूति लेने में आगे निकल गये।



