नई दिल्ली: Blue Economy मतलब नीली अर्थव्यवस्था। इसकी अवधारणा बेल्जियम के अर्थशास्त्री गुंटर पौली ने अपनी पुस्तक ‘The Blue Economy: 10 Years, 100 Innovations and 100 Million Jobs’ में दी थी। यह बात आज से कोई पंद्रह साल पहले, 2010 की है। पुस्तक आर्थिक विकास, बेहतर आजीविका और नौकरियों के सृजन तथा महासागर के इको सिस्टम के स्वास्थ्य के लिये महासागरीय संसाधनों का सतत उपयोग से जुड़ी है। इसमें जोर सामाजिक समावेश, पर्यावरणीय स्थिरता के साथ महासागरीय अर्थव्यवस्था के विकास के एकीकरण पर है। इसमें शामिल हैं;
अक्षय ऊर्जा: सतत समुद्री ऊर्जा सामाजिक और आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
मत्स्य पालन: सतत मत्स्य पालन अधिक राजस्व, मछली उत्पादन और मछली के स्टॉक को बहाल करने में मदद कर सकता है।
समुद्री परिवहन: 80 प्रतिशत से अधिक अंतरराष्ट्रीय वस्तुओं का व्यापार समुद्री मार्ग से किया जाता है।
पर्यटन:महासागरीय और तटीय पर्यटन रोजगार में बढ़ोतरी करने के साथ आर्थिक विकास को बल दे सकता है।
जलवायु परिवर्तन: महासागर एक महत्त्वपूर्ण कार्बन सिंक (ब्लू कार्बन) के रूप में काम करते हैं और जलवायु परिवर्तन को कम करने में मददगार हो सकते हैं।
अपशिष्ट प्रबंधन: भूमि पर बेहतर अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से महासागरों के पारिस्थितिक तंत्र में सुधार किया जा सकता है।
भारत और Blue Economy
आज से दो साल पहले 2023 में जमैका स्थित International Seabed Authority-ISA ने आधिकारिक तौर पर भारत को अग्रणी निवेशक के रूप में नामित किया। इसका सीधा मतलब था कि पूरी दुनिया इस सेक्टर में भारत की अहमियत को पहचान रही थी। इसी दौरान पॉलिमेटेलिक ग्रंथियों (polymetallic nodules-PMN) की खोज से जुड़े अनुबंध के विस्तार पर दस्तखत भी किए गए। ISA ने इस अनुबंध की शुरुआत में 25 मार्च 2002 को 15 साल के लिए हुई थी। इसे बाद में 2017 और 2022 में 5-5 साल की अवधि के लिए दो बार बढ़ाया गया है।
पॉलिमेटेलिक ग्रंथि अनुबंध
केंद्रीय भारतीय महासागरीय बेसिन के समुद्र तट में पॉलिमेटेलिक ग्रंथियों (polymetallic nodules) का पता लगाने संबंधी भारत के विशेषाधिकार से जुड़ा है। इसको उस वक्त बीते साल पांच साल के लिए बढ़ाया गया था। इसका मतलब यह हुआ कि पॉलिमेटेलिक ग्रंथियों से जुड़ी विकास गतिविधियों में भारत को अंतरराष्ट्रीय जल के करीब 75,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विशिष्ट अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार इसे आईएसए ने दिए हैं। एक अनुमान के अनुसार, इन संसाधनों की कुल क्षमता 380 मिलियन टन के करीब है। इसमें 4.7 मिलियन टन निकिल, 4.29 मिलियन टन तांबा और 0.55 मिलियन टन कोबाल्ट तथा 92.59 मिलियन टन मैंगनीज़ के होने की संभावना जताई गई है।
पॉलिमेटेलिक ग्रंथि अनुबंध की पृष्ठभूमि
1987 में भारत अग्रणी निवेशक का दर्जा प्राप्त करने वाला ऐसा पहला देश है, जिसे पॉलिमेटेलिक ग्रंथियों के संबंध में अन्वेषण एवं उनके उपयोग के लिए यूएन ने केंद्रीय भारतीय महासागरीय बेसिन में एक विशेष क्षेत्र आवंटित किया गया। इस दीर्घकालिक कार्यक्रम में पॉलिमेटेलिक ग्रंथियों के सर्वेक्षण एवं अन्वेषण, पर्यावरणीय अध्ययन, खनन क्षेत्र में तकनीकी विकास तथा धातु निष्कर्षण जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
पॉलिमेटेलिक ग्रंथियां क्या है?
पॉलिमेटेलिक ग्रंथियां (जिसे मैंगनीज ग्रंथियां भी कहा जाता है) आलू के आकार की होती हैं। इनमें बड़े पैमाने पर छिद्रपूर्ण नलिकाएं पाई जाती हैं। यह गहरे समुद्र में विश्व महासागरों के समुद्र तलों की ढलानों पर पाई जाती हैं। मैंगनीज और लोहे के अलावा, इनमें निकिल, तांबा, कोबाल्ट, सीसा, मोलिब्डेनम, कैडमियम, वैनेडियम, टाइटेनियम आदि धातुएं पाई जाती हैं। इन सभी में निकिल, कोबाल्ट और तांबे को सबसे अधिक आर्थिक एवं सामरिक महत्त्व की धातुएं माना जाता है। इस काम के लिए 6000 मीटर पानी की गहराई पर काम करने में सक्षम एक दूरस्थ ऑपरेबल पनडुब्बी (Remotely Operable Submersible – ROSUB 6000) भी विकसित की गई है।
अंतरराष्ट्रीय समुद्री प्राधिकरण
अंतरराष्ट्रीय समुद्री प्राधिकरण (International Seabed Authority), संयुक्त राष्ट्र संघ का एक निकाय है। इस निकाय को अंतरराष्ट्रीय जल में महासागरों के समुद्रों में पाए जाने वाले निर्जीव संसाधनों के संबंध में अन्वेषण तथा शोषण आदि कार्यों को विनियमित करने के लिये स्थापित किया गया है। भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री प्राधिकरण के काम में सक्रिय रूप से योगदान देता है।
समुद्रयान मिशन
विज्ञान मंत्रालय के अनुसार, समुद्रयान मिशन के 2026 तक पूरा होने की उम्मीद है। इसका मकसद गहरे समुद्र में अन्वेषण और दुर्लभ खनिज संसाधनों की खोज के लिये तीन व्यक्तियों को ‘मत्स्य 6000’ नामक वाहन में 6000 मीटर की गहराई तक समुद्र में भेजना है।
‘मत्स्य 6000’ वाहन को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT), चेन्नई द्वारा विकसित और डिजाइन किया जा रहा है। वैसे, मानव सुरक्षा हेतु इसकी क्षमता सामान्य स्थितियों में 12 घंटे और आपात स्थिति में 96 घंटे है। यह भारत का पहला अनोखा मानवयुक्त समुद्रीय मिशन है, जो डीप ओशन मिशन का हिस्सा है।
डीप ओशन मिशन
इसे जून 2021 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा अनुमोदित किया गया था। इसका उद्देश्य संसाधनों के लिए गहरे समुद्र का अन्वेषण करना, महासागरीय संसाधनों के सतत उपयोग के लिए गहरे समुद्र की प्रौद्योगिकियों का विकास करना और साथ ही भारत सरकार की नीली अर्थव्यवस्था संबंधी पहलों का समर्थन करना है। पांच वर्ष की अवधि वाले इस मिशन की अनुमानित लागत 4,077 करोड़ रुपए है जिसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
भारत के लिए इतनी अहम क्यों है नीली अर्थव्यवस्था
भारत के पास करीब 7,517 किमी लंबी तट रेखा के साथ अपनी एक अद्वितीय समुद्री स्थिति है। इसमें नौ तटीय राज्य और 1,382 द्वीप शामिल हैं। भारत तीनों ओर से समुद्र से घिरा हुआ है तथा तटीय क्षेत्रों और तटीय प्रदेशों में रहने वाली देश की लगभग 30 फीसदी आबादी का अहम आर्थिक कारक है। यह मत्स्य पालन और जलीय कृषि, पर्यटन, आजीविका और ब्लू ट्रेड का समर्थन करता है।
इस पर भी ध्यान दें
- सतत विकास हेतु ब्लू इकॉनमी पर भारत-नॉर्वे टास्क फोर्स: दोनों देशों के बीच संयुक्त पहल को विकसित करने और उसका पालन करने हेतु वर्ष 2020 में दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से इसका उद्घाटन किया गया था।
- सागरमाला परियोजना: सागरमाला परियोजना बंदरगाहों के आधुनिकीकरण हेतु आईटी सक्षम सेवाओं के व्यापक उपयोग के माध्यम से बंदरगाह विकास के लिये एक रणनीतिक पहल है।
- ओ-स्मार्ट: ओ-स्मार्ट एक अम्ब्रेला योजना है जिसका उद्देश्य सतत विकास के लियेमहासागरों और समुद्री संसाधनों का विनियमित उपयोग करना है।
- एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन: यह तटीय और समुद्री संसाधनों के संरक्षण तथा तटीय समुदायों के लिये आजीविका के अवसरों में सुधार पर केंद्रित है।
- राष्ट्रीय मत्स्य नीति: भारत में समुद्री और अन्य जलीय संसाधनों से मत्स्य संपदा के सतत उपयोग पर ध्यान केंद्रित कर ब्लू ग्रोथ इनिशिएटिव को बढ़ावा देने हेतु एक राष्ट्रीय मत्स्य नीति मौजूद है।



