नई दिल्ली: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर SC ने राजनीतिक दलों की निष्क्रियता पर गहरी नाराजगी व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान इस बात पर हैरानी जताई कि लाखों मतदाताओं के नाम मसौदा सूची से हटाए जाने के बावजूद किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल ने कोई आपत्ति या शिकायत दर्ज क्यों नहीं कराई।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने सीधे तौर पर राजनीतिक दलों को फटकार लगाते हुए कहा, “हम राजनीतिक दलों की निष्क्रियता से आश्चर्यचकित हैं।” पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि जब 12 मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल हैं, तो केवल तीन ही इस मामले को लेकर अदालत में क्यों आए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “बीएलए (बूथ-स्तरीय एजेंट) नियुक्त करने के बाद, वे क्या कर रहे हैं? लोगों और स्थानीय राजनीतिक व्यक्तियों के बीच दूरी क्यों है? राजनीतिक दलों को मतदाताओं की सहायता करनी चाहिए।”
चुनाव आयोग ने भी उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का पक्ष रख रहे वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि किसी भी बड़ी पार्टी ने मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर अदालत में आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। उन्होंने बताया कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे कहीं से भी ऑनलाइन दावा दायर कर सकते हैं, इसके लिए उन्हें बिहार आने की जरूरत नहीं है। चुनाव आयोग के वकील ने बताया कि बिहार में लगभग 1.6 लाख बीएलए हैं, और यदि प्रत्येक बीएलए प्रतिदिन 10 लोगों से मिलता है, तो 16 लाख लोगों तक पहुंचा जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पता बदलने या परिवार में किसी की मृत्यु होने की जानकारी देना व्यक्तिगत मतदाता की जिम्मेदारी है।
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राजनीतिक दलों का बचाव
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वकील ने स्पष्ट किया कि वे केवल आरजेडी सांसद मनोज झा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, न कि पूरी पार्टी का। वहीं, कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि उनकी याचिका में आठ विपक्षी दल शामिल हैं। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने उनसे पूछा कि यदि वे इतने सारे दलों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, तो उन्हें यह बताना चाहिए कि कितने लोगों ने आपत्तियां दायर की हैं और कितने बीएलए नियुक्त किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख तय की है और सभी संबंधित पक्षों से इस मामले में सक्रियता दिखाने का आग्रह किया है।



