नई दिल्ली: देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं ने सुप्रीम कोर्ट (SC) को चिंतित कर दिया है। कोर्ट ने इस गंभीर मुद्दे पर एक उच्चस्तरीय समिति गठित की थी, लेकिन 57,000 से अधिक संस्थानों, जिनमें IIT, IIM, AIIMS और NIT जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं, ने इस सर्वेक्षण में सहयोग नहीं किया। कोर्ट ने इसे लेकर गहरी नाराजगी व्यक्त की है।
आत्महत्याओं का चिंताजनक आंकड़ा
पिछले सात वर्षों में लगभग 98 छात्रों ने आत्महत्या की है, जिनमें 39 IIT, 25 NIT, 25 केंद्रीय विश्वविद्यालयों और 4 IIM के छात्र शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पैनल को केवल 3,500 संस्थानों से जवाब मिला, जबकि बाकी ने बार-बार रिमाइंडर के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इसे गंभीर लापरवाही माना।
सर्वेक्षण का उद्देश्य और चुनौतियां
सुप्रीम कोर्ट ने छात्र आत्महत्याओं के कारणों का पता लगाने के लिए एक मल्टी-टास्क फोर्स बनाई है, जिसके प्रमुख रिटायर्ड जज रविंद्र भट हैं। इस पैनल में मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और अन्य विशेषज्ञ शामिल हैं। इसका लक्ष्य रैगिंग, जातिगत भेदभाव, शैक्षणिक दबाव, यौन उत्पीड़न, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक और आर्थिक बोझ जैसे कारणों की जांच करना है। हालांकि, प्रमुख संस्थानों की उदासीनता ने इस प्रक्रिया को बाधित किया है।
कोर्ट के सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी संस्थानों को सर्वेक्षण में सहयोग के लिए मजबूर करे। कोर्ट ने चेतावनी दी कि गैर-जिम्मेदार रवैये पर सख्त आदेश जारी किए जा सकते हैं, जो संस्थानों की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि यह सर्वेक्षण छात्रों के हित में है और इसमें सभी की भागीदारी अनिवार्य है।
आगे की राह
पैनल को जल्द ही अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपनी है, जिसमें आत्महत्याओं के कारणों और समाधानों पर सुझाव होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस गंभीर मुद्दे पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। छात्रों को मानसिक और शैक्षणिक दबाव से बचाने के लिए संस्थानों को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।



