नई दिल्ली : भारत सरकार ने स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में आयुर्वेद को शामिल करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। इस पहल का मकसद नई पीढ़ी को भारतीय स्वास्थ्य परंपराओं और समग्र कल्याण से जोड़ना है। आयुष मंत्रालय के नेतृत्व में NCERT और UGC मिलकर एक ऐसा पाठ्यक्रम तैयार कर रहे हैं, जो आयुर्वेद के सिद्धांतों को सरल और प्रासंगिक तरीके से छात्रों तक पहुंचाए। केंद्रीय आयुष मंत्री प्रतापराव जाधव ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि यह कदम न केवल शिक्षा को समृद्ध करेगा, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली को भी बढ़ावा देगा।
पाठ्यक्रम में क्या होगा खास?
नया पाठ्यक्रम आयुर्वेद के बुनियादी सिद्धांत, प्राकृतिक उपचार और जीवनशैली से जुड़े प्राचीन ज्ञान पर केंद्रित होगा। स्कूलों में बच्चों को आयुर्वेद के घरेलू नुस्खे और स्वास्थ्यवर्धक आदतें सिखाई जाएंगी, जबकि कॉलेजों में गहन अध्ययन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को शामिल किया जाएगा। कुछ राज्यों जैसे उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, और गोवा ने पहले ही भारतीय ज्ञान प्रणाली को अपनी शिक्षा में शामिल करना शुरू कर दिया है। इस नए सिलेबस को अगले शैक्षणिक सत्र (2026-27) से लागू करने की योजना है, हालांकि आधिकारिक तारीख की घोषणा बाकी है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आयुर्वेद की मजबूती
आयुर्वेद की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए सरकार वैज्ञानिक अनुसंधान पर जोर दे रही है। केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS) उच्च-गुणवत्ता वाले क्लिनिकल ट्रायल्स कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोग से आयुर्वेदिक उपचारों के लिए मानक भी तय किए जा रहे हैं। यह सुनिश्चित करेगा कि आयुर्वेद न केवल सांस्कृतिक धरोहर के रूप में बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी विश्वसनीय हो।
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आयुर्वेद और एलोपैथी का संगम
आयुष मंत्री ने स्पष्ट किया कि आयुर्वेद और एलोपैथी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। राष्ट्रीय आयुष मिशन और आयुष ग्रिड के जरिए सरकार दोनों चिकित्सा पद्धतियों को मिलाकर सस्ती और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने की दिशा में काम कर रही है। यह पहल भारत को स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अग्रणी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।



