सुप्रीम कोर्ट का बिहार में वोटर लिस्ट रिविजन पर रोक लगाने से इनकार

भारत निर्वाचन आयोग को सुप्रीम कोर्ट से फौरी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उसे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और ईमानदारी पर संदेह नहीं है, क्योंकि यह एक संवैधानिक संस्था  है। वहीं, चुनाव आयोग बिहार वोटर लिस्ट में आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड पर विचार करे।

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को बिहार में मतदाता सूची के के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के भारत निर्वाचन आयोग के कदम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को बड़ी राहत देते हुए वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
शीर्ष अदालत का कहना था कि 10 विपक्षी दलों के नेताओं सहित किसी भी याचिकाकर्ता ने इस प्रक्रिया पर अंतरिम रोक की मांग नहीं की है। साथ ही टिप्पणी की उसे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और ईमानदारी पर संदेह नहीं है क्योंकि यह एक संवैधानिक संस्था  है, लेकिन इस प्रक्रिया (बिहार में स्पेशल रिवीजन) का समय संदेह पैदा कर रहा है। 
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत  ने कहा कि हम किसी संवैधानिक संस्था को वह काम करने से नहीं रोक सकते, जो उसे करना चाहिए लेकिन हम उन्हें वो काम भी नहीं करने देंगे, जो उन्हें नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि पहली नजर  में हमारा मानना है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान आधार कार्ड, वोटर आईडी, राशन कार्ड को भी दस्तावेज के तौर पर स्वीकार करने पर विचार किया जा सकता है।
मतदाता सूची के विशेष गहन रिवीजन की कवायद महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा है और यह मतदान के अधिकार से संबंधित है। निर्वाचन आयोग का किसी व्यक्ति की नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं है और यह गृह मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है। निर्वाचन आयोग जो कर रहा है, वह संविधान के तहत आता है और पिछली बार ऐसी कवायद वर्ष 2003 में की गयी थी।

जस्टिस बागची ने चुनाव आयोग के वकील से पूछा कि क्या यह प्रक्रिया आगामी बिहार चुनाव से स्वतंत्र रूप से नहीं की जा सकती थी। आप इस प्रक्रिया को नवंबर में होने वाले चुनाव से क्यों जोड़ रहे हैं। अगर यह एक प्रक्रिया है, तो यह चुनाव से स्वतंत्र हो सकती है। 
पीठ ने चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी से पूछा, जब आप संक्षिप्त पुनरीक्षण कर रहे होते हैं, तो नियम निर्धारित करने की बात कही जाती है। मौखिक सुनवाई होगी क्या गहन सुनवाई के दौरान इससे छूट दी जा सकती है। इस पर द्विवेदी ने कहा कि किसी भी प्रक्रिया से छूट नहीं दी जा रही है और हर चीज का पालन किया जा रहा है।
जस्टिस धूलिया ने पूछा, क्या आप उन्हें (जिन लोगों के नाम इस प्रक्रिया में छूट गए हैं) सुनवाई का अवसर देंगे। द्विवेदी ने जवाब दिया, किसी को भी सूची से बाहर नहीं किया जाएगा। याचिकाकर्ता कह रहे हैं कि अगर आप हस्ताक्षर नहीं करते हैं तो आप स्वत: ही सूची से बाहर हो जाएंगे और अगर फॉर्म ही नहीं है तो सुनवाई कैसी होगी। बिना नोटिस के किसी को भी नहीं हटाया जाएगा।

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