नई दिल्ली: बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग के मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान पर सियासी बवाल चरम पर है। विपक्षी दल सवाल पूछ रहे हैं कि सूची में नाम के लिए आधार कार्ड और आवासीय प्रमाण पत्र को मान्यता क्यों नहीं दी जा रही? हालांकि राज्य के सीमांचल इलाके के चार जिलों कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज और अररिया में आधार कार्ड की संख्या आबादी से ज्यादा है। इतना ही नहीं, आधार कार्ड का नागरिकता प्रमाण पत्र के रूप में मान्यता न होने बावजूद इस क्षेत्र में इसी के आधार पर धड़ल्ले से निवास प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं।
गौरतलब है कि बिहार का यह क्षेत्र बीते दो दशक में बांग्लादेश से घुसपैठ में आई तेजी के कारण जनसांख्किी में तेजी व लगातार बदलाव से चर्चा में रहा है। साल 1951 से 2011 तक इस क्षेत्र में मुसलमानों की आबादी में 16 फीसदी की तेज बढ़ोत्तरी दर्ज की गई। इसके बाद हालिया जातिगत जनगणना में इस क्षेत्र की जनसांख्यिकी के संदर्भ में नए तथ्य सामने आए। मसलन, किशनगंज में मुस्लिम आबादी 68 फीसदी, अररिया में 50 फीसदी, कटिहार में 45 फीसदी और पूर्णिया में 39 फीसदी हो गई। कुल मिला कर इन चाल जिलों में मुस्लिम आबादी 47 फीसदी हो गई।
आधार कार्ड के आंकड़े से बढ़ी चिंता
इस बीच आए आधार कार्ड से जुड़े नए आंकड़ों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी। गौरतलब है कि वर्तमान में पूरे देश की करीब 94 फीसदी आबादी के पास आधार कार्ड है। इसके उलट सीमांचल में यह आंकड़ा आबादी से भी ज्यादा है। मसलन, किशनगंज में आधार कार्ड की संख्या 126 फीसदी, अररिया और कटिहार में 123 फीसदी और पूर्णिया में करीब 121 फीसदी है। गौरतलब है कि यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर के चिकेन नेक से सटा है।
आधार कार्ड-निवास प्रमाण पत्र मान्य क्यों नहीं?
आधिकारिक सूत्रों का हवाला देते हुए मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि आबादी से अधिक आधार कार्ड के कारण पूरा मामला ही संदेहास्पद है। दूसरा बड़ी अनियमितता निवास प्रमाण पत्र बनाने में की गई है। स्थानीय प्रशासन ने नियमों को ताक पर रख कर आधार कार्ड को नागरिकता प्रमाण पत्र के रूप में मान्यता देते हुए आवासीय प्रमाण पत्र जारी कर दिए हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आयोग ने जिन 11 प्रमाण पत्रों को नागरिकता और मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए मंजूरी दी है, उनमें से एक प्रमाण पत्र कोई भी वास्तविक नागरिक उपलब्ध करा सकता है। मसलन, जो इस देश के नागरिक होंगे उनके पास केंद्र, राज्य सरकार या सार्वजनिक उपक्रम का प्रमाण पत्र, 1987 के पूर्व का बैंक, पोस्ट ऑफिस, बीमा से जुड़े दस्तावेज, मैट्रिक का प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, जन्म प्रमाण पत्र, स्थायी आवासी प्रमाण पत्र, वन अधिकार प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, भूमि-मकान आवंटन पत्र में से कोई एक दस्तावेज जरूर होगा।
विपक्ष क्यों हमलावर?
पुनरीक्षण अभियान के खिलाफ सर्वाधिक नकारात्मक माहौल राज्य के मुस्लिम इलाकों में है। इस बिरादरी का बड़ा हिस्सा अरसे से विपक्षी महागठबंधन का समर्थन करता रहा है। यही कारण है कि विपक्षी महागठबंधन इस बहाने इस बिरादरी को अपने पक्ष में गोलबंद करना चाहता है।
हर विधानसभा में दस हजार फर्जी वोटर का अनुमान
चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं, आयोग को मिली शिकायतों के आधार पर लगता है कि सीमांचल सहित कुछ चुनिंदा जिलों से जुड़े विधानसभा क्षेत्रों में औसतन दस हजार से अधिक फर्जी मतदाता हैं। आबादी से अधिक आधार कार्ड प्रथम दृष्टया इसे सही साबित करता है। हालांकि, अब आयोग की निगाहें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी है। आयोग को लगता है कि शीर्ष अदालत उसके द्वारा प्रेस किए गए तथ्यों का संज्ञान लेगा।
बस समय सीमा कम के सवाल पर घिर रहा आयोग
हालांकि, इस पूरे मामले में चुनाव आयोग बस कम समय सीमा के सवाल पर घिर रहा है। विपक्ष का सवाल है कि महज तीन से चार महीने में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान को कैसे पूरा किया जा सकता है। चूंकि राज्य में अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में इस अभियान के समय को ले कर सवाल उठाए जा रहे हैं।
(इनपुट: अमर उजाला हिंदी समाचार पत्र व आज तक न्यूज चैनल समेत दूसरे मीडिया हाउस की रिपार्ट्स)



