नई दिल्ली : भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की अंतरात्मा सामूहिक पुरुषार्थ, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सहयोग की सुदृढ़ नींव पर टिकी हुई है। भारत में जब हम आर्थिक विकास की कल्पना करते हैं, तो वह किसी एकाधिकारवादी या पूंजी-केंद्रित व्यवस्था का अनुकरण नहीं होती, बल्कि वह समाज के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति के उत्थान यानी ‘अंत्योदय’ की आकांक्षा से प्रेरित होती है। आज यानी 6 जुलाई 2026 को भारत की राजधानी नई दिल्ली के प्रतिष्ठित ‘भारत मंडपम’ में जब सहकारिता मंत्रालय का 5वां स्थापना दिवस मनाया जा रहा है, तो यह केवल एक सरकारी विभाग की पांच वर्षों की उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में ग्रामीण और अर्ध-शहरी परिदृश्य को पूरी तरह से बदल देने वाले एक वैचारिक महा-आंदोलन का उत्सव है।
इस आंदोलन का मूल मंत्र है—”सहकार से समृद्धि”। यह दर्शन सीधे तौर पर भारत की सनातन विचार परंपरा “वसुधैव कुटुम्बकम” से जुड़ता है, जिसका अर्थ है कि संपूर्ण विश्व ही हमारा परिवार है। जब हम संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानते हैं, तो प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग, शोषण की जगह पोषण और एकाधिकार की जगह साझा स्वामित्व (Shared Ownership) की भावना का जन्म होता है। सहकारिता वास्तव में इसी भावना का आर्थिक और व्यावहारिक स्वरूप है। यह एक ऐसी लोक-केंद्रित व्यवस्था है जहां समाज के कमजोर, साधनहीन और छोटे-छोटे उत्पादक अपनी छोटी-छोटी पूंजी, श्रम और संसाधनों को एक जगह इकट्ठा करते हैं, और सामूहिक शक्ति के बल पर बड़े से बड़े पूंजीपतियों और बाजार की अनिश्चितताओं को चुनौती देते हैं।
पिछले पांच वर्षों में, यानी 6 जुलाई 2021 को एक अलग और स्वतंत्र सहकारिता मंत्रालय के गठन के बाद से, भारत ने इस क्षेत्र में एक अभूतपूर्व पुनर्जागरण देखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और देश के पहले सहकारिता मंत्री अमित शाह के रणनीतिक नेतृत्व में, सहकारिता आंदोलन को केवल कृषि ऋण बांटने वाली एक शिथिल व्यवस्था से निकालकर देश की अर्थव्यवस्था के सबसे आधुनिक, डिजिटल और आर्थिक रूप से जीवंत इंजन के रूप में बदल दिया गया है। आज भारत का सहकारी ढांचा दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्कों में से एक है, जो देश के करोड़ों किसानों, दुग्ध उत्पादकों, मछुआरों, बुनकरों, शिल्पकारों और शहरी कामगारों के जीवन में समृद्धि का नया सवेरा लेकर आया है।
सहकारिता का विस्तृत इतिहास: वैदिक काल से आधुनिक मंत्रालय तक
भारत के लिए सहकारिता या सामूहिक संगठन का विचार कोई पश्चिमी आयात नहीं है, न ही यह 20वीं सदी की कोई आधुनिक खोज है। यह भारत की मिट्टी में रची-बसी एक प्राचीन विधा है, जिसने समय के साथ अपने स्वरूप को बदला है। इस व्यापक विकास यात्रा को हम निम्नलिखित ऐतिहासिक चरणों में समझ सकते हैं:
1. प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत में सहकारिता के बीज
भारत के प्राचीन ग्रंथों, वेदों और स्मृतियों में सामूहिक प्रयासों और आर्थिक संगठनों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध श्लोक “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” (हम सब एक साथ चलें, एक साथ बोलें और हमारे मन एक हों) सहकारिता का सबसे प्राचीन दार्शनिक आधार है।
- श्रेणी और पूग व्यवस्था: कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ और मौर्य काल के दस्तावेजों में ‘श्रेणी’ (Guilds) और ‘पूग’ जैसी संस्थाओं का वर्णन है। ये मूल रूप से शिल्पकारों, व्यापारियों और कारीगरों के स्वैच्छिक संगठन होते थे, जो अपने सदस्यों के हितों की रक्षा, गुणवत्ता नियंत्रण और सामूहिक ऋण की व्यवस्था करते थे।
- पारंपरिक ग्रामीण सहकारिता: मध्यकाल में और उससे पहले भी, भारतीय गांवों में जल प्रबंधन के लिए ‘अहार-पाइन’ व्यवस्था (बिहार), दक्षिण भारत में सामूहिक तालाबों का रख-रखाव, और महाराष्ट्र व गुजरात में कृषि कार्यों के लिए सामूहिक श्रम (जैसे ‘इरजी’ या ‘मयत’) की परंपराएं थीं। ये सभी बिना किसी लिखित सरकारी कानून के, आपसी विश्वास और सामाजिक पूंजी (Social Capital) के बल पर सदियों तक चलती रहीं।
2. ब्रिटिश काल और औपनिवेशिक हित (19वीं सदी का उत्तरार्ध से 1947)
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, विशेषकर 1875 के दक्कन के दंगों के बाद, भारतीय किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी। साहूकारों और जमींदारों के चंगुल में फंसे किसान अपनी जमीनें खो रहे थे और भारी कर्ज के बोझ तले दबे थे। इस गंभीर ग्रामीण संकट का समाधान खोजने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मद्रास प्रेसीडेंसी के एक अधिकारी सर फ्रेडरिक निकोलसन को यूरोप (विशेषकर जर्मनी) भेजा ताकि वे वहां के सहकारी मॉडल का अध्ययन कर सकें।
- 1904 का पहला सहकारी ऋण समिति अधिनियम: निकोलसन की सिफारिशों के आधार पर भारत में पहली बार औपचारिक कानूनी ढांचा तैयार किया गया और ‘सहकारी ऋण समिति अधिनियम, 1904’ पारित हुआ। इस कानून का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को साहूकारों के चंगुल से बचाकर सस्ते और संस्थागत ऋण की व्यवस्था करना था। इसी अधिनियम के तहत तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में स्थित ‘तिरुर सहकारी समिति’ एशिया की पहली आधिकारिक रूप से पंजीकृत सहकारी समिति बनी।
- 1912 का संशोधित अधिनियम: 1904 के कानून में एक बड़ी कमी यह थी कि यह केवल ऋण (Credit) समितियों तक सीमित था। गैर-ऋण गतिविधियों जैसे विपणन, खरीद और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 1912 में नया कानून लाया गया, जिसने केंद्रीय सहकारी बैंकों और प्रांतीय संघों के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।
- मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919): इस सुधार के माध्यम से ‘सहकारिता’ को एक प्रांतीय (राज्य) विषय बना दिया गया। इसके बाद देश के विभिन्न प्रांतों ने अपने-अपने स्तर पर सहकारिता कानून बनाए (जैसे बॉम्बे सहकारी समिति अधिनियम, 1925)।
3. स्वतंत्रता के बाद का कालखंड: योजनाबद्ध विकास और ‘अमूल’ की क्रांति
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो देश के नीति निर्माताओं ने महसूस किया कि यदि भारत के गांवों का विकास करना है, तो सहकारिता को पंचवर्षीय योजनाओं का मुख्य हिस्सा बनाना होगा। पंडित जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि भारत के हर गांव में तीन चीजें अनिवार्य रूप से होनी चाहिए—एक स्कूल, एक पंचायत और एक सहकारी समिति।
- श्वेत क्रांति और अमूल का उदय: गुजरात के आणंद में त्रिभुवनदास पटेल और डॉ. वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में शुरू हुई ‘कैरा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ’ (अमूल) की कहानी ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। छोटे-छोटे दूध उत्पादकों को एकजुट करके बनाए गए इस मॉडल ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना दिया। यह इस बात का जीवंत प्रमाण था कि सहकारिता के माध्यम से कॉर्पोरेट एकाधिकार को ध्वस्त किया जा सकता है।
- राष्ट्रीय स्तर के संघों की स्थापना: इसी दौर में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC), इफ्फको (IFFCO—कृषक उर्वरक सहकारी), कृभको (KRIBHCO) और नाफेड (NAFED) जैसी दिग्गज संस्थाओं का जन्म हुआ, जिन्होंने देश को उर्वरक उत्पादन और कृषि विपणन में आत्मनिर्भर बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
4. समकालीन चुनौतियां और 2021 का ऐतिहासिक मोड़
21वीं सदी की शुरुआत तक आते-आते, भारतीय सहकारी आंदोलन कई गंभीर चुनौतियों से घिर गया था। इनमें राजनीतिक हस्तक्षेप, व्यावसायिकता (Professionalism) की कमी, अपारदर्शी बही-खाते, वित्तीय अनियमितताएं और आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी (IT) को अपनाने में हिचकिचाहट शामिल थी। सहकारी समितियां धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो रही थीं और आम जनता का इनसे विश्वास कम हो रहा था।
इस पृष्ठभूमि में, 6 जुलाई 2021 को केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी निर्णय लेते हुए स्वतंत्र सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की। इस ऐतिहासिक कदम ने सहकारिता आंदोलन को एक नया जीवनदान, नई दिशा और एक सशक्त प्रशासनिक कवच प्रदान किया।
तुलनात्मक विश्लेषण: पारंपरिक बनाम समकालीन सहकारिता प्रवृत्तियां
सहकारिता आंदोलन के इस विशाल बदलाव को गहराई से समझने के लिए हमें इसके पारंपरिक स्वरूप और वर्तमान 2026 के आधुनिक प्रवृत्तियों का एक व्यापक तुलनात्मक विश्लेषण करना होगा:

1. प्रशासनिक और नीतिगत दृष्टिकोण में बदलाव
- पारंपरिक प्रवृत्ति: 2021 से पहले, सहकारिता केवल कृषि मंत्रालय के अधीन एक छोटा सा प्रभाग या विभाग मात्र था। इसके पास अपनी नीतियों को स्वतंत्र रूप से लागू करने के लिए न तो पर्याप्त बजटीय आवंटन था और न ही कोई राष्ट्रीय स्तर का एकीकृत रोडमैप। कानून राज्यों के विवेकाधिकार पर छोड़े गए थे, जिससे पूरे देश में कोई एकरूपता नहीं थी।
- वर्तमान प्रवृत्ति (2026): आज यह एक पूर्ण और अत्यंत सक्रिय केंद्रीय मंत्रालय है। पिछले पांच वर्षों में 152 से अधिक व्यापक पहलें शुरू की जा चुकी हैं। राज्य सरकारों के साथ मिलकर ‘मॉडल बाय-लॉज’ (आदर्श उप-नियम) लागू किए गए हैं, जिससे कश्मीर से कन्याकुमारी तक सहकारी व्यवस्था में एकरूपता और प्रशासनिक सुदृढ़ता आई है।
2. तकनीकी अंगीकरण और पारदर्शिता का स्तर
- पारंपरिक प्रवृत्ति: अधिकांश प्राथमिक समितियां (PACS) और जिला बैंक पूरी तरह से मैन्युअल या कागजी बही-खातों पर निर्भर थे। ऑडिट की प्रक्रिया वर्षों तक लटकी रहती थी, जिससे वित्तीय धोखाधड़ी, गबन और भाई-भतीजावाद की संभावनाएं बहुत अधिक थीं। आम किसान को यह पता ही नहीं चल पाता था कि समिति में क्या चल रहा है।
- वर्तमान प्रवृत्ति (2026): संपूर्ण सहकारिता तंत्र का “डिजिटलीकरण” कर दिया गया है। देश के 50,000 से अधिक PACS को e-PACS में बदल दिया गया है। ये सभी एक साझा राष्ट्रीय एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ERP) सॉफ्टवेयर से जुड़े हुए हैं, जो 14 क्षेत्रीय भाषाओं में काम करता है। ऑडिट अब ऑनलाइन और रीयल-टाइम होते हैं, जिससे गड़बड़ी की गुंजाइश शून्य हो गई है।
3. कार्यों और व्यावसायिक विविधीकरण का दायरा
- पारंपरिक प्रवृत्ति: ऐतिहासिक रूप से, गांवों की PACS कमेटियों का काम केवल साल में एक या दो बार किसानों को फसल ऋण (Crop Loan) बांटना और उसकी वसूली करना था। इसके बाद ये समितियां साल के बाकी महीने निष्क्रिय पड़ी रहती थीं, जिससे इनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता समाप्त हो गई थी।
- वर्तमान प्रवृत्ति (2026): अब PACS बहु-उद्देशीय व्यावसायिक केंद्रों (Multi-Service Centres) के रूप में काम कर रहे हैं। ये समितियां अब अपने गांवों में दवा की दुकानें (जन औषधि केंद्र), पेट्रोल पंप, एलपीजी एजेंसी, कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) और अनाज के गोदाम चला रही हैं। यानी एक ही छत के नीचे गांव के व्यक्ति को जीवन की सभी आवश्यक वस्तुएं मिल रही हैं।
4. शहरी सहकारी बैंकिंग का आधुनिकीकरण
- पारंपरिक प्रवृत्ति: शहरी सहकारी बैंक (Urban Cooperative Banks – UCBs) तकनीकी और वित्तीय मोर्चे पर वाणिज्यिक बैंकों (जैसे SBI, HDFC) से बहुत पीछे थे। इनके पास न तो आधुनिक मोबाइल बैंकिंग ऐप्स थे, न ही कोई एकीकृत कोर बैंकिंग ढांचा। इसके कारण युवा पीढ़ी इन बैंकों से दूर होती जा रही थी।
- वर्तमान प्रवृत्ति (2026): राष्ट्रीय शहरी सहकारी वित्त और विकास निगम (NUCFDC) के गठन के बाद शहरी सहकारी बैंकों की पूरी रूपरेखा बदल गई है। Sahakar CBS के आने से सभी छोटे-बड़े सहकारी बैंक एक छत के नीचे आ गए हैं, और Sahakar Sahyogi जैसे एआई-पावर्ड टूल्स के माध्यम से ग्राहकों को चैट और वॉयस के जरिए विश्वस्तरीय बैंकिंग सेवाएं मिल रही हैं।
5 वर्षों के 9 स्तंभ: सुधारों का विस्तृत विवरण
पिछले पांच वर्षों (2021-2026) के दौरान सहकारिता मंत्रालय ने जिन प्रमुख क्षेत्रों में क्रांतिकारी सुधार किए हैं, उनका विस्तृत और डेटा-आधारित विवरण नीचे दिया जा रहा है:
1. PACS का पुनरुद्धार और बहु-आयामी विकास
प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (PACS) हमारे सहकारी ढांचे की सबसे बुनियादी और जमीनी इकाइयां हैं। यदि PACS मजबूत होंगी, तभी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। सरकार ने इसके लिए राज्यों के सहयोग से नए ‘मॉडल बाय-लॉज’ तैयार किए।
- व्यावसायिक विस्तार: जून 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इन नए उप-नियमों को अपना लिया है। इसके तहत अब PACS 25 से अधिक व्यावसायिक गतिविधियां कर सकती हैं।
- प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र: देश के 39,177 PACS को इन केंद्रों के रूप में परिवर्तित किया जा चुका है, जहां किसानों को मिट्टी परीक्षण की सुविधा, उन्नत बीज, उर्वरक और आधुनिक कृषि उपकरण एक ही स्थान पर मिलते हैं।
- कॉमन सर्विस सेंटर (CSC): ग्रामीण भारत में डिजिटल सेवाओं को पहुंचाने के लिए 54,117 PACS अब सीएससी के रूप में काम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि अब एक ग्रामीण को अपना पैन कार्ड बनवाने, आधार अपडेट कराने, या ट्रेन का टिकट बुक कराने के लिए तहसील या शहर जाने की जरूरत नहीं है; वह अपने गांव की सहकारी समिति में जाकर यह काम करा सकता है।
- स्वास्थ्य के क्षेत्र में कदम: ग्रामीण इलाकों में सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए 4,248 PACS को ‘प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र’ खोलने की मंजूरी दी गई है, जिनमें से 843 पूरी तरह से क्रियाशील हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, 394 PACS ने रिटेल फ्यूल आउटलेट (पेट्रोल-डीजल पंप) के लिए आवेदन किया है, जिनमें से 3 आउटलेट्स को सफलतापूर्वक कमीशन भी किया जा चुका है।
2. डिजिटल क्रांति और e-PACS का उद्भव
सहकारिता क्षेत्र को तकनीक से लैस करना इस मंत्रालय की सबसे बड़ी प्राथमिकता रही है।
- बजट और वित्तीय सहायता: शुरुआत में वर्ष 2022 में इस परियोजना के लिए ₹2,516 करोड़ का आवंटन किया गया था, जिसे वर्तमान प्राथमिकताओं और व्यापकता को देखते हुए वर्ष 2025-26 में बढ़ाकर ₹2,925.39 करोड़ कर दिया गया है।
- कंप्यूटरीकरण का लक्ष्य: सरकार ने देश के सभी सक्रिय 63,000 PACS को पूरी तरह से डिजिटल और कंप्यूटरीकृत करने के लिए 31 मार्च 2027 की समयसीमा तय की है।
- वर्तमान प्रगति: जून 2026 तक की स्थिति के अनुसार, 79,630 PACS को इस योजना के तहत स्वीकृत किया जा चुका है, जिनमें से 63,428 PACS वर्तमान में लाइव क्लाउड-बेस्ड ईआरपी (ERP) सॉफ्टवेयर का उपयोग कर रहे हैं। 65 हजार से अधिक समितियों को अत्याधुनिक हार्डवेयर (कंप्यूटर, प्रिंटर, स्कैनर) डिलीवर किए जा चुके हैं।
- पारदर्शिता और भाषा: सबसे बड़ी बात यह है कि ग्रामीण स्तर के कर्मचारियों की सुविधा के लिए यह पूरा सॉफ्टवेयर भारत की 14 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराया गया है। साथ ही, वित्तीय शुचिता सुनिश्चित करने के लिए 42,700 से अधिक PACS का ऑनलाइन ऑडिट पूरा किया जा चुका है।
3. हर ग्राम पंचायत तक सहकारी नेटवर्क का विस्तार
भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी है कि देश की कोई भी पंचायत सहकारी सुविधाओं से वंचित न रहे। इसी उद्देश्य के साथ मंत्रालय ने ‘हर पंचायत में सहकारी समिति’ का अभियान शुरू किया।
- नया पंजीकरण: पिछले पांच वर्षों में देश भर में 37,454 नई बहु-उद्देशीय PACS, डेयरी और मत्स्य सहकारी समितियों का पंजीकरण किया गया है।
- ग्राम पंचायतों का कवरेज: वर्तमान में देश की 2.55 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों में PACS अपनी सेवाएं दे रही हैं। इसी तरह, डेयरी सहकारी समितियों ने 87,159 ग्राम पंचायतों को और मत्स्य पालन सहकारी समितियों ने 29,964 ग्राम पंचायतों को अपने दायरे में ले लिया है। यह विस्तार विशेष रूप से देश के पूर्वोत्तर राज्यों और जनजातीय क्षेत्रों में किया गया है जो अब तक इस आंदोलन से अछूते थे।
4. विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना
भारत का किसान फसल उगाना तो जानता है, लेकिन उचित भंडारण व्यवस्था न होने के कारण उसे हर साल भारी नुकसान उठाना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में उचित कोल्ड स्टोरेज और गोदामों के अभाव के कारण अरबों रुपये का अनाज बर्बाद हो जाता है। इस राष्ट्रीय समस्या के स्थाई समाधान के लिए सहकारिता मंत्रालय ने “विश्व की सबसे बड़ी विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना” शुरू की है।
- योजना का स्वरूप: इसके तहत बड़े शहरों में विशाल गोदाम बनाने के बजाय, गांव के स्तर पर ही PACS की जमीनी संपत्तियों पर 100 से 200 मीट्रिक टन की क्षमता वाले छोटे-छोटे आधुनिक गोदाम बनाए जा रहे हैं।
- वर्तमान स्थिति: जून 2026 तक 145 PACS में पूरी तरह से आधुनिक और वैज्ञानिक गोदामों का निर्माण कार्य संपन्न हो चुका है, जिसके माध्यम से ग्रामीण स्तर पर 68,702 मीट्रिक टन से अधिक की अतिरिक्त भंडारण क्षमता का सृजन किया गया है।
- किसानों को लाभ: इस योजना से किसानों को दोहरी राहत मिली है। पहला, उन्हें अपनी फसल को कटते ही कम दामों पर बेचने की मजबूरी (Distress Sale) नहीं रहती। वे अनाज को अपने गांव के ही गोदाम में रख सकते हैं और उसके बदले बैंक से ऋण (Warehouse Receipt Financing) लेकर अपना घर चला सकते हैं। दूसरा, जब बाजार में कीमतें बेहतर होती हैं, तब वे अपनी फसल बेचकर अधिकतम मुनाफा कमा सकते हैं।
5. किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) का सुदृढ़ीकरण
छोटे और सीमांत किसानों के पास इतनी जमीन नहीं होती कि वे व्यक्तिगत रूप से आधुनिक कृषि तकनीकों का खर्च उठा सकें या बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों के साथ सीधे सौदेबाजी कर सकें। इसके समाधान के लिए ‘किसान उत्पादक संगठनों’ (FPOs) को सहकारी ढांचे के साथ एकीकृत किया गया है।
- कुल FPOs का गठन: सहकारी क्षेत्र के अंतर्गत अब तक 1,863 FPO का गठन किया जा चुका है।
- PACS की भूमिका: इनमें से 1,117 FPO का गठन सीधे PACS के माध्यम से किया गया है, जिससे ग्रामीण स्तर पर ही कृषि उत्पादों की ग्रेडिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग संभव हो सकी है।
- नीली क्रांति को बढ़ावा: देश के तटीय और अंतर्देशीय मछुआरों के कल्याण के लिए 1,070 मत्स्य FPO का गठन किया गया है और उनके खातों में प्रत्यक्ष रूप से ₹98 करोड़ की वित्तीय सहायता वितरित की गई है ताकि वे आधुनिक नावें और कोल्ड-चेन वैन खरीद सकें।
6. ऐतिहासिक टैक्स रिलीफ और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’
दशकों से सहकारी समितियों की यह शिकायत थी कि उनके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। कॉर्पोरेट कंपनियों पर तो टैक्स कम कर दिए गए थे, लेकिन गरीबों की सहकारी समितियों पर भारी टैक्स और सरचार्ज लगा हुआ था। सहकारिता मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय के साथ समन्वय करके इन विसंगतियों को दूर किया:
| टैक्स का प्रकार / मानक | पुराना प्रावधान (2021 से पहले) | नया संशोधित प्रावधान (2026 वर्तमान) | सहकारी समितियों को सीधा लाभ |
| कॉर्पोरेट सरचार्ज (Surcharge) | ₹1 करोड़ से ₹10 करोड़ की आय पर 12% | घटाकर केवल 7% किया गया | मध्यम स्तर की समितियों के पास निवेश के लिए अधिक पूंजी बच रही है। |
| न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) | सहकारी समितियों के लिए यह दर 18.5% थी | घटाकर कंपनियों के बराबर 15% किया गया | वित्तीय तरलता (Liquidity) में भारी वृद्धि हुई है। |
| TDS मुक्त नकद निकासी सीमा | सहकारी बैंकों से नकद निकासी पर सीमा ₹1 करोड़ थी | सीमा को बढ़ाकर ₹3 करोड़ प्रति वर्ष किया गया | ग्रामीण क्षेत्रों में नकद लेनदेन करने वाली समितियों को बड़ी राहत मिली। |
| नकद लेनदेन सीमा (PACS & PCARDB) | बेहद सीमित और कड़े नियम थे | प्राथमिक समितियों के लिए नकद जमा और ऋण की सीमाएं बढ़ाई गईं | ग्रामीण ऋण वितरण प्रक्रिया में आने वाली व्यावहारिक बाधाएं दूर हुईं। |
7. श्वेत क्रांति 2.0 (White Revolution 2.0)
अमूल की सफलता को देश के उन राज्यों में दोहराने के लिए जहां डेयरी क्षेत्र अभी भी पिछड़ा हुआ है (जैसे पूर्वी भारत और उत्तर-पूर्व), सरकार ने ‘श्वेत क्रांति 2.0’ का शंखनाद किया है।
- मुख्य लक्ष्य: इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य लक्ष्य आगामी वर्ष 2028-29 तक सहकारी समितियों द्वारा दूध के कुल संग्रहण (Procurement) में 50% की भारी वृद्धि दर्ज करना है।
- महिला सशक्तिकरण: इस योजना के केंद्र में देश की मातृशक्ति है। अब तक 25,282 नई डेयरी सहकारी समितियों का पंजीकरण किया जा चुका है, जिनमें से अधिकांश पूरी तरह से महिलाओं द्वारा संचालित हैं। जब पैसा सीधे ग्रामीण महिला के हाथ में आता है, तो पूरे परिवार का पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर सुधर जाता है।
8. तीन नए राष्ट्रीय बहु-राज्य सहकारी संस्थान
भारतीय सहकारी उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने और बड़े पैमाने पर व्यापार करने के लिए केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी से तीन विशिष्ट राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं की स्थापना की गई है:
- राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (NCEL): यह संस्था देश की छोटी-छोटी समितियों के उत्पादों (जैसे चावल, मसाले, हस्तशिल्प) को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए एक एकल खिड़की (Single Window) का काम करती है। जून 2026 तक के रिकॉर्ड के अनुसार, NCEL ने दुनिया के 38 देशों को 15.4 लाख मीट्रिक टन (LMT) अनाज और वस्तुओं का निर्यात किया है, जिसका कुल मूल्य ₹6,295 करोड़ है।
- राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL): आज पूरी दुनिया में केमिकल-मुक्त और जैविक खाद्य पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ रही है। NCOL जैविक खेती करने वाले किसानों के उत्पादों के एकत्रीकरण, प्रयोगशाला परीक्षण, कड़े प्रमाणीकरण (Certification) और विपणन का काम करती है। वर्तमान में इसके साथ 14,286 सदस्य सहकारी समितियां जुड़ी हुई हैं।
- भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (BBSSL): देश के किसानों को उच्च उत्पादकता वाले पारंपरिक और आधुनिक बीज उपलब्ध कराने के लिए यह संस्था काम कर रही है। यह समितियां देश भर में “भारत बीज” ब्रांड नाम से प्रमाणित बीजों का उत्पादन और वितरण कर रही हैं। इसके नेटवर्क में 38,665 सदस्य सहकारी समितियां शामिल हो चुकी हैं।
9. संस्थागत क्षमता निर्माण: त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (TSU)
किसी भी आंदोलन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे चलाने वाले लोग कितने कुशल और प्रशिक्षित हैं। सहकारिता क्षेत्र को पेशेवर और कुशल कार्यबल प्रदान करने के लिए भारत के पहले विशेष सहकारी विश्वविद्यालय—”त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय” (Tribhuvan Sahkari University – TSU) की स्थापना की गई है।
- कार्यप्रणाली: यह विश्वविद्यालय सहकारिता प्रबंधन, एआई इन बैंकिंग, एग्री-बिजनेस और ग्रामीण विकास जैसे विषयों में डिग्री और डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित कर रहा है।
- प्रशिक्षण नेटवर्क: इसके साथ ही राष्ट्रीय सहकारी प्रशिक्षण परिषद (NCCT) और नाबार्ड (NABARD) के माध्यम से देश भर के लाखों सहकारी कर्मचारियों, अध्यक्षों और निदेशकों को वित्तीय साक्षरता, डिजिटल गवर्नेंस और कॉर्पोरेट गवर्नेंस का सघन प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
वित्तीय इंजन: राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC)
सहकारी आंदोलन के इन सभी पहियों को चलाने के लिए जिस ईंधन यानी धन की आवश्यकता होती है, उसे प्रदान करने में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) ने एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान NCDC के प्रदर्शन ने वित्तीय जगत के बड़े-बड़े विशेषज्ञों को चौंका दिया है:
- ऐतिहासिक मंजूरी: NCDC ने केवल एक वित्तीय वर्ष (FY 2025-26) में सहकारी क्षेत्र की विभिन्न परियोजनाओं के लिए ₹1.55 लाख करोड़ की भारी-भरकम राशि को मंजूरी (Sanction) प्रदान की है।
- प्रत्यक्ष संवितरण: मंजूर की गई राशि में से ₹1.27 लाख करोड़ का वास्तविक संवितरण (Disbursement) सीधे समितियों और ग्राउंड-लेवल प्रोजेक्ट्स के खातों में किया जा चुका है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
- FPO को विशेष सहायता: केंद्र सरकार की ‘10,000 FPO के गठन और संवर्धन’ की योजना के तहत, NCDC ने क्लस्टर-बेस्ड बिजनेस ऑर्गेनाइजेशंस (CBBOs) और सहकारी FPOs को मई 2026 तक ₹2,320 करोड़ की वित्तीय सहायता जारी की है। यह निरंतर वित्तीय पोषण ही है जिसके कारण आज ग्रामीण भारत में नए-नए कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट्स और पैकेजिंग प्लांट्स कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं और ग्रामीण युवाओं को उनके गांव में ही रोजगार मिल रहा है।
‘भारत टैक्सी’—सहकारी क्षेत्र का आधुनिक और डिजिटल चेहरा
जब हम सहकारिता की बात करते हैं, तो अक्सर लोगों के दिमाग में केवल खेती, गाय-भैंस, और गांव की तस्वीर उभरती है। लेकिन सहकारिता मंत्रालय ने इस रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए यह साबित कर दिया है कि सहकारिता 21वीं सदी की अत्याधुनिक ‘गिग इकोनॉमी’ (Gig Economy) और शहरी परिवहन को भी सफलतापूर्वक संचालित कर सकती है। इसका सबसे बड़ा और जीवंत उदाहरण है—”भारत टैक्सी” (Bharat Taxi)।

1. पृष्ठभूमि और शुरुआत
शहरी क्षेत्रों में ओला (Ola) और उबर (Uber) जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से शुरुआत में तो लोगों को सुविधा हुई, लेकिन धीरे-धीरे इन प्लेटफार्मों ने ड्राइवरों और ग्राहकों दोनों का शोषण करना शुरू कर दिया। ये कंपनियां ड्राइवरों की कुल कमाई का 20% से लेकर 35% तक हिस्सा कमीशन के रूप में खुद रख लेती हैं, जिससे दिन में 14 घंटे गाड़ी चलाने के बाद भी ड्राइवर के हाथ में बहुत कम पैसा बचता था। वहीं दूसरी ओर, ग्राहकों से बारिश या पीक-ऑवर के नाम पर ‘सरज प्राइसिंग’ (Surge Pricing) वसूल कर मनमाना किराया लिया जाता था।
इस कॉर्पोरेट शोषण के जवाब में ड्राइवरों ने एकजुट होकर ‘सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड’ की स्थापना की और सरकार के तकनीकी सहयोग से अपना खुद का ऐप आधारित मोबिलिटी प्लेटफॉर्म “भारत टैक्सी” लॉन्च किया।
2. यह मॉडल कैसे काम करता है? (The Zero-Commission Model)
भारत टैक्सी पूरी तरह से ‘नो-प्रॉफिट, नो-लॉस’ और ‘साझा स्वामित्व’ के सहकारी सिद्धांत पर काम करता है।
- स्वामित्व ड्राइवरों का: इस ऐप का मालिक कोई विदेशी निवेशक या पूंजीपति नहीं है, बल्कि इसमें पंजीकृत हर एक ड्राइवर इस सहकारी समिति का एक शेयरधारक और मालिक है।
- कमिशन-मुक्त व्यवस्था: भारत टैक्सी अपने ड्राइवरों से कोई कमीशन नहीं लेती। ड्राइवर दिनभर में जितनी भी राइड पूरी करता है, उसका 100% पैसा सीधे ड्राइवर के बैंक खाते में जाता है। ऐप के रख-रखाव और सर्वर के खर्च के लिए ड्राइवरों से केवल एक बहुत ही मामूली और निश्चित दैनिक शुल्क (जैसे ₹40 या ₹50 प्रतिदिन) लिया जाता है।
- ग्राहकों को लाभ: चूंकि बीच में कोई बिचौलिया या कॉर्पोरेट कमीशन नहीं है, इसलिए भारत टैक्सी का किराया अन्य निजी ऐप्स की तुलना में 15% से 20% तक सस्ता होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें कोई ‘सरज प्राइसिंग’ नहीं होती; चाहे भारी बारिश हो या कोई त्योहार, किराया हमेशा सामान्य और पारदर्शी रहता है।
3. वर्तमान पैमाना और विस्तार की योजनाएं
जून-जुलाई 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत टैक्सी ने शहरी परिवहन क्षेत्र में अपनी मजबूत पैठ बना ली है:
- पंजीकृत ड्राइवर: इसके नेटवर्क के साथ वर्तमान में 6.37 लाख से अधिक प्रमाणित और पंजीकृत ड्राइवर जुड़ चुके हैं, जिनके जीवन स्तर और मासिक आय में 40% तक का सुधार दर्ज किया गया है।
- संतुष्ट ग्राहक: इस ऐप को अब तक 35.77 लाख से अधिक ग्राहकों द्वारा डाउनलोड और नियमित उपयोग किया जा रहा है।
- वर्तमान परिचालन क्षेत्र: यह सेवा अभी देश के प्रमुख महानगरों और शहरों जैसे दिल्ली-एनसीआर, गुजरात (अहमदाबाद, सूरत), लखनऊ, चंडीगढ़, मुंबई, जयपुर और कानपुर में सफलतापूर्वक संचालित हो रही है।
- भावी विस्तार: आगामी कुछ ही महीनों में इस सेवा का विस्तार देश के अन्य उभरते शहरों जैसे रांची, पटना, गुवाहाटी, भोपाल, कोलकाता, इंदौर और नागपुर में करने की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
4. सामाजिक सुरक्षा और महिला सशक्तिकरणपहलों
भारत टैक्सी ने केवल परिवहन की सुविधा नहीं दी, बल्कि इसमें सामाजिक सुरक्षा के भी कई आयाम जोड़े हैं। सहकारी समिति अपने सदस्य ड्राइवरों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा, उनके बच्चों के लिए छात्रवृत्ति और दुर्घटना की स्थिति में आपातकालीन वित्तीय सहायता प्रदान करती है। इसके अलावा, महिला यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए “सारथी दीदी” नामक एक विशेष विंग की शुरुआत की गई है, जिसमें महिला ड्राइवरों द्वारा संचालित ई-रिक्शा और टैक्सियों को प्राथमिकता दी जाती है।
विस्तृत केस स्टडीज: सहकारिता की जमीनी सफलता की कहानियां
सहकारिता मंत्रालय के इन पांच वर्षों के सफर को केवल बड़े-बड़े आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता, इसके लिए हमें भारत के ग्रामीण अंचलों में आए व्यावहारिक बदलाव की कहानियों (Case Studies) को देखना होगा:
केस स्टडी 1: महाराष्ट्र के गढ़चिरौली का वन-उपज सहकारी कायाकल्प
गढ़चिरौली महाराष्ट्र का एक सुदूर और नक्सल प्रभावित जनजातीय जिला है। यहाँ के स्थानीय आदिवासी सदियों से महुआ, तेंदू पत्ता और शहद जैसी लघु वनोपज (Minor Forest Produce) पर निर्भर रहे हैं। पहले व्यापारी और बिचौलिये इनके उत्पादों को कौड़ियों के दाम पर खरीद लेते थे।
- सहकारी हस्तक्षेप: वर्ष 2022 में सहकारिता मंत्रालय की पहल पर यहाँ 15 नई महिला बहु-उद्देशीय सहकारी समितियों का गठन किया गया। इन समितियों को PACS के रूप में पंजीकृत कर डिजिटल कनेक्टिविटी दी गई।
- बदलाव: NCOL (राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक्स लिमिटेड) ने इनके जैविक शहद और महुआ उत्पादों को सीधे अपने ब्रांड के साथ जोड़ा। समितियों को पैकेजिंग मशीनें दी गईं। आज जो शहद पहले ₹60 किलो बिकता था, वह ‘भारत ऑर्गेनिक्स’ के ठप्पे के साथ ₹350 किलो की दर पर बिक रहा है। इसका सीधा परिणाम यह हुआ है कि इस क्षेत्र में नक्सलवाद की घटनाओं में भारी कमी आई है क्योंकि स्थानीय युवाओं को सहकारिता के माध्यम से सम्मानजनक और स्थायी रोजगार मिल गया है।
केस स्टडी 2: उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में ‘बुंदेलखंड दुग्ध दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ’
बुंदेलखंड का इलाका हमेशा से सूखे, पलायन और गरीबी के लिए जाना जाता रहा है। पानी की कमी के कारण यहाँ खेती साल में केवल एक बार ही हो पाती थी, जिससे किसान कर्ज में डूबे रहते थे।
- सहकारी हस्तक्षेप: ‘श्वेत क्रांति 2.0’ के तहत वर्ष 2023 में हमीरपुर और आसपास के जिलों में महिला दुग्ध सहकारी समितियों का एक सघन जाल बिछाया गया। नाबार्ड और NCDC के सहयोग से गांवों में ही ‘बल्क मिल्क कूलर्स’ (BMC) स्थापित किए गए।
- बदलाव: आज इस संघ से 12,000 से अधिक महिलाएं जुड़ी हुई हैं जो प्रतिदिन 50,000 लीटर दूध एकत्र करती हैं। यह दूध सीधे मदर डेयरी और अन्य राष्ट्रीय ब्रांडों को जाता है। महिलाओं के खातों में हर 10 दिन पर सीधे पैसे ट्रांसफर (DBT) होते हैं। इस वित्तीय स्वतंत्रता ने ग्रामीण महिलाओं को पारिवारिक निर्णयों में एक मजबूत आवाज दी है और बुंदेलखंड से होने वाले पलायन पर काफी हद तक रोक लगा दी है।
भविष्य की राह और ‘विकसित भारत @ 2047’ का विजन
जब हम वर्ष 2026 से आगे की ओर देखते हैं, तो भारत के सहकारिता आंदोलन के सामने एक बहुत ही स्पष्ट और भव्य रोडमैप दिखाई देता है। देश जब वर्ष 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मनाएगा, तब तक भारत को एक आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाने में सहकारिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी।
1. आगामी चुनौतियां जिन पर ध्यान देना आवश्यक है
यद्यपि पिछले पांच वर्षों की उपलब्धियां अत्यंत गौरवशाली रही हैं, लेकिन इस आंदोलन को और अधिक मजबूत बनाने के लिए कुछ क्षेत्रों पर लगातार काम करना होगा:
- अंतर-राज्यीय विसंगतियों को दूर करना: अभी भी कुछ राज्यों में सहकारी कानून बहुत पुराने और जटिल हैं, जो केंद्रीय सुधारों की गति को धीमा करते हैं। इसके लिए ‘एक देश, एक सहकारी कानून’ की दिशा में राजनीतिक सहमति बनानी होगी।
- साइबर सुरक्षा (Cyber Security): जैसे-जैसे हजारों PACS और शहरी सहकारी बैंक डिजिटल ग्रिड (Sahakar CBS) से जुड़ रहे हैं, वैसे-वैसे ग्रामीण क्षेत्रों में साइबर धोखाधड़ी और डेटा हैकिंग का खतरा भी बढ़ रहा है। त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय को ग्रामीण स्तर के कर्मचारियों के लिए विशेष साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाने होंगे।
- युवाओं को आकर्षित करना: आज भी देश के शहरी और पढ़े-लिखे युवाओं का एक बड़ा वर्ग सहकारिता को एक ‘पिछड़ा हुआ क्षेत्र’ मानता है। ‘भारत टैक्सी’ जैसी पहलों को और अधिक बढ़ावा देकर युवाओं को यह समझाना होगा कि सहकारिता स्टार्टअप्स और कॉर्पोरेट्स का एक बेहतर, न्यायसंगत और अधिक लाभदायक विकल्प है।
2. ‘सहकार से समृद्धि’ का अंतिम लक्ष्य
सहकारिता मंत्रालय का विजन केवल आर्थिक लेन-देन तक सीमित नहीं है। इसका अंतिम लक्ष्य देश के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करना है। जब लोग एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें स्वतः ही ढह जाती हैं। एक सहकारी समिति में सभी सदस्य बराबर होते हैं, चाहे उनके पास एक एकड़ जमीन हो या सौ एकड़। यह लोकतांत्रिक भावना ही भारत के लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाती है।
उपसंहार
भारत की सहकारिता यात्रा के पिछले पांच वर्ष इस बात का साक्षात प्रमाण हैं कि यदि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, आधुनिक तकनीक और जनता की सामूहिक भागीदारी का संगम हो जाए, तो दशकों पुरानी और सुस्त पड़ी व्यवस्थाओं को भी रातों-रात बदला जा सकता है। 6 जुलाई 2021 को बोया गया सहकारिता मंत्रालय का यह छोटा सा बीज, आज 6 जुलाई 2026 को एक विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका है, जिसकी शाखाएं देश के सुदूरतम गांवों से लेकर अंतरराष्ट्रीय निर्यात बाजारों और आधुनिक डिजिटल एप्स तक फैली हुई हैं।
चाहे वह 50,000 e-PACS का ऐतिहासिक डिजिटल रूपांतरण हो, दुनिया की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना हो, टैक्स में मिली ऐतिहासिक राहत हो, या फिर ड्राइवरों को उनका अधिकार दिलाने वाला ‘भारत टैक्सी’ जैसा आधुनिक मंच हो—इन सभी पहलों ने देश के आम नागरिक का सहकारिता पर विश्वास फिर से बहाल किया है। “सहकार से समृद्धि” का यह संकल्प अब केवल एक नारा नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों वंचितों, किसानों, महिलाओं और कामगारों के जीवन का एक जीवंत सच बन चुका है। इसी सामूहिक शक्ति के रथ पर सवार होकर भारत निश्चित रूप से एक समृद्ध, आत्मनिर्भर और ‘विकसित भारत’ के अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करेगा।



