स्वास्थ्य आपातकाल: दक्षिण-पूर्व एशिया में जीवन रक्षक फंड का विस्तार

बढ़ते स्वास्थ्य संकटों के बीच, दक्षिण-पूर्व एशिया ने 'SEARHEF' फंड को और मजबूत बनाने की कवायद शुरू कर दी है। इसका उद्देश्य केवल तत्काल वित्तीय सहायता देना नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र और तकनीकी सहयोग को जोड़कर एक टिकाऊ 'आपातकालीन सुरक्षा कवच' तैयार करना है, ताकि किसी भी आपदा के समय जीवन बचाना आसान हो।

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नई दिल्ली [भारत]: आज की बदलती दुनिया में, जहाँ जलवायु परिवर्तन का असर सीधा हमारे जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है, दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र एक नई रणनीतिक पहल की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और सदस्य देशों ने मिलकर ‘दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय स्वास्थ्य आपातकालीन कोष’ (SEARHEF) के विस्तार और सुदृढ़ीकरण पर चर्चा की है। इस बैठक का आयोजन यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि आने वाले समय में बढ़ती स्वास्थ्य चुनौतियों, जैसे कि नए-नए वायरस, प्राकृतिक आपदाएं और पर्यावरणीय स्वास्थ्य संकटों का सामना करने के लिए हमारे पास एक मजबूत वित्तीय ढांचा हो।

क्षेत्रीय एकजुटता और स्वास्थ्य सुरक्षा का नया युग

जब कोई आपदा आती है, तो शुरुआती कुछ घंटे और दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसी समय को ध्यान में रखते हुए, डॉ. कैथरीन बोहेम, ऑफिसर-इन-चार्ज WHO दक्षिण-पूर्व एशिया ने बल देते हुए कहा कि मौजूदा दौर में आपात स्थितियां न केवल बार-बार आ रही हैं, बल्कि वे पहले से अधिक जटिल और महंगी भी हो गई हैं।

SEARHEF क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

SEARHEF की यात्रा 2008 में शुरू हुई थी। उस समय हिंद महासागर में आई सुनामी ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया था। उस भीषण आपदा से सीख लेते हुए, सदस्य देशों ने महसूस किया कि उन्हें एक ऐसे फंड की आवश्यकता है जो नौकरशाही की देरी के बिना, बिल्कुल तत्काल प्रभाव से पैसा जारी कर सके।

यह फंड केवल “पैसे की थैली” नहीं है, बल्कि एक “रिस्पॉन्स सिस्टम” है।

  • तैयारी (Preparedness): यह फंड देशों को पहले से ही अपनी मेडिकल तैयारी पूरी रखने में मदद करता है।
  • तत्काल सहायता (Response): संकट के वक्त यह ‘लाइफलाइन’ के रूप में काम करता है।
  • सामूहिकता: यह इस बात का प्रतीक है कि दक्षिण-पूर्व एशिया का हर देश एक-दूसरे के संकट में साथ खड़ा है।

इतिहास के पन्नों से: एक सफर

2008 से अब तक, SEARHEF ने लंबी दूरी तय की है। शुरुआती वर्षों में यह एक छोटे मॉडल के रूप में था, जहाँ केवल सीमित संसाधन उपलब्ध थे। लेकिन समय के साथ, इसे बेहतर गवर्नेंस और पारदर्शी नियमों के तहत ढाला गया है। अब तक इसने 10 देशों में 51 बार हस्तक्षेप किया है।

  • प्रारंभिक चरण: शुरुआती वर्षों में सीमित इमरजेंसी रिस्पॉन्स।
  • मध्यम चरण: क्षमता निर्माण, जैसे कि इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर की स्थापना।
  • वर्तमान चरण: डेटा-संचालित और निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी की ओर बढ़ाना।

तुलनात्मक विश्लेषण: कल बनाम आज के स्वास्थ्य रुझान

यदि हम 2008 के दौर की तुलना आज (2026) से करें, तो हम पाएंगे कि स्वास्थ्य संबंधी खतरे पूरी तरह बदल गए हैं:

  1. खतरों का स्वरूप: पहले आपदाएं भौगोलिक होती थीं (जैसे बाढ़ या सुनामी), आज वे ग्लोबल हैं (जैसे महामारियां या जलवायु-जनित स्वास्थ्य जोखिम)।
  2. फंड का आकार: 2026 के नए नियमों के तहत, इसके कॉर्पस फंड को 3 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक ले जाने की योजना है, जो कि इसकी शुरुआती क्षमता से कहीं अधिक है।
  3. लचीलापन: पहले फंड का उपयोग बहुत सख्त नियमों के साथ होता था, लेकिन अब ‘रोल-ओवर’ व्यवस्था ने देशों को यह आश्वस्त किया है कि अगर किसी वर्ष में वे फंड इस्तेमाल नहीं करते, तो वह व्यर्थ नहीं जाएगा।

भविष्य की रणनीतियां: केवल पैसा ही काफी नहीं

बैठक में ‘रिसोर्स मोबिलाइजेशन स्ट्रेटजी’ के तहत कुछ क्रांतिकारी सुझाव दिए गए हैं:

  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: सरकारें अब निजी कंपनियों को भी इस फंड में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। इसमें लॉजिस्टिक्स और दवा आपूर्ति करने वाली कंपनियां शामिल हो सकती हैं।
  • तकनीकी विशेषज्ञता: अब केवल नकद ही नहीं, बल्कि ‘इन-काइंड’ (In-kind) सहयोग भी स्वीकार किया जाएगा। इसका मतलब है कि अगर किसी देश के पास विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम है या आपदा प्रबंधन का सॉफ्टवेयर है, तो वह भी एक प्रकार का योगदान माना जाएगा।
  • वैश्विक साझेदार: अंतरराष्ट्रीय परोपकारी संस्थाओं (NGOs) के साथ मिलकर इस फंड को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने का प्रयास है।

क्यों जरूरी है यह बदलाव?

आज की दुनिया में, किसी भी देश की स्वास्थ्य प्रणाली अलग-थलग नहीं रह सकती। अगर एक देश में स्वास्थ्य आपदा आती है, तो वह देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में फैल सकती है। SEARHEF इस कड़ी को तोड़ने का काम करता है। जब हम कहते हैं कि 8.2 मिलियन डॉलर का अब तक निवेश हुआ है, तो यह राशि सुनने में कम लग सकती है, लेकिन यह उन 51 मौकों पर काम आई है जहाँ जिंदगियां दांव पर थीं।

निष्कर्ष और आगे की राह

सितंबर 2026 में होने वाली 79वीं क्षेत्रीय समिति की बैठक इस फंड के भविष्य का खाका तय करेगी। यह केवल एक प्रशासनिक बैठक नहीं, बल्कि एक सुरक्षा-चक्र की मजबूती की घोषणा होगी। दक्षिण-पूर्व एशिया इस प्रयास के जरिए बाकी दुनिया को यह दिखा रहा है कि ‘क्षेत्रीय सहयोग’ ही भविष्य की किसी भी अनिश्चितता को हराने का एकमात्र तरीका है।

हम सभी को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सुरक्षा का मतलब केवल अस्पताल बनाना नहीं है, बल्कि संकट के समय उन तक पहुंचने के लिए उपलब्ध संसाधनों की गति को सुनिश्चित करना है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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