PMKSY: भारतीय कृषि में सिंचाई और जल सुरक्षा का महाअभियान

10 वर्षों की यात्रा, ₹64,407 करोड़ से अधिक की केंद्रीय सहायता और PMKSY के जरिए देश के करोड़ों किसानों की खुशहाली की पूरी कहानी

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नई दिल्ली:भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती-किसानी पर टिकी है। लेकिन भारतीय कृषि हमेशा से मानसून के भरोसे रही है। इसी अनिश्चितता को दूर करने और देश के हर खेत तक पानी पहुँचाने के उद्देश्य से 1 जुलाई 2015 को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) की शुरुआत की गई थी। आज इस महत्वाकांक्षी योजना ने सफलता के शानदार 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं। पिछले एक दशक में PMKSY ने न केवल देश के सिंचाई ढांचे को मजबूत किया है, बल्कि कुशल जल प्रबंधन (Efficient Water Management) को बढ़ावा देकर भारतीय कृषि के परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है।

एक दशक की उपलब्धियां और मुख्य आंकड़े

पिछले दस वर्षों में PMKSY सिंचाई आधारित कृषि परिवर्तन (Irrigation-led Agricultural Transformation) के एक प्रमुख इंजन के रूप में उभरी है। भारत सरकार द्वारा इस योजना के तहत अब तक ₹64,407 करोड़ से अधिक की केंद्रीय सहायता जारी की जा चुकी है।

वर्ष 2016-17 से लेकर अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो इस योजना ने देश के कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव किए हैं:

  • लाभान्वित किसान: योजना के विभिन्न घटकों के माध्यम से देश के 2.7 करोड़ (27 मिलियन) से अधिक किसानों को सीधा लाभ पहुँचा है।
  • सिंचाई क्षमता का निर्माण: देश के 24.61 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता का या तो नया निर्माण किया गया है या पुरानी प्रणालियों को बहाल (Restore) किया गया है।
  • भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाया जा चुका है।

सरकार ने इसकी निरंतरता और महत्व को देखते हुए वर्ष 2021 से 2026 तक के लिए ₹93,068.56 करोड़ के कुल परिव्यय (Outlay) के साथ PMKSY को जारी रखने की मंजूरी दी थी। इसी कड़ी में, केंद्रीय बजट 2026–27 में सिंचाई के विस्तार, जल-उपयोग दक्षता में सुधार और टिकाऊ जल प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए ₹6,587 करोड़ का भारी-भरकम आवंटन किया गया है।

जल सुरक्षित खेती: सतत विकास और पर्यावरण का संतुलन

खेती में जल सुरक्षा केवल फसलों को पानी देने तक सीमित नहीं है। यह कृषि उत्पादकता बढ़ाने, जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन (Climate Resilience) मजबूत करने और देश के अन्नदाताओं के लिए स्थायी आजीविका सुनिश्चित करने का बुनियादी आधार है।

जल संसाधनों की उपलब्धता को अधिकतम करने के लिए दो चीजें बेहद जरूरी हैं:

  1. फसल पैटर्न का अनुकूलन (Optimizing Cropping Patterns): क्षेत्र की पानी की उपलब्धता के आधार पर फसलों का चयन करना।
  2. कुशल जल अनुप्रयोग तरीके (Efficient Water Application): पारंपरिक बाढ़ सिंचाई (Flood Irrigation) के बजाय आधुनिक तकनीकों का उपयोग।

PMKSY इन्हीं सिद्धांतों पर काम करती है। यह योजना ‘जल संचय’ (वर्षा जल संचयन और भंडारण) और ‘जल सिंचन’ (खेत के स्तर पर कुशल जल वितरण) के माध्यम से काम करती है। पानी के इस विवेकपूर्ण और न्यायिक उपयोग से बहुआयामी लाभ हो रहे हैं:

  • मृदा स्वास्थ्य (Soil Health) में सुधार: अत्यधिक पानी से होने वाले कटाव और लवणता (Salinity) में कमी आती है।
  • फसल उत्पादकता में वृद्धि: पौधों को सही मात्रा में नमी मिलने से पैदावार बढ़ती है।
  • पर्यावरणीय लाभ: भूजल स्तर का संरक्षण होता है और पानी की बर्बादी रुकती है।
  • सिंचाई कवरेज का विस्तार: पानी की बचत होने के कारण, उसी समान जल स्रोत से अधिक से अधिक कृषि क्षेत्र को सींचा जा सकता है।

मूल्य श्रृंखला को मजबूत करते PMKSY के चार रणनीतिक घटक

PMKSY ने सिंचाई की पूरी मूल्य श्रृंखला (Value Chain) को कवर करने के लिए चार रणनीतिक घटकों को आपस में जोड़ा है। यह बुनियादी ढांचे के निर्माण से लेकर खेत में पानी के अंतिम उपयोग तक की निगरानी करता है:

त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम

यह घटक देश की चल रही बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं, विशेषकर राष्ट्रीय परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करता है। इसका मुख्य उद्देश्य सिंचाई बुनियादी ढांचे का समय पर निर्माण करना है ताकि किसानों को तुरंत पानी मिल सके।

  • वित्तीय सहायता: वर्ष 2016-17 से अब तक AIBP को ₹21,023 करोड़ की केंद्रीय सहायता मिल चुकी है।
  • प्रभाव: इसने 17.30 मिलियन (1.73 करोड़) किसानों को लाभ पहुँचाया है, जिससे यह लाभार्थी कवरेज के मामले में PMKSY का सबसे बड़ा घटक बन गया है।
  • आधुनिकीकरण (M-CADWM): वर्ष 2025-26 में, सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए कमांड एरिया डेवलपमेंट और वॉटर मैनेजमेंट के आधुनिकीकरण (M-CADWM) को PMKSY-AIBP के एक उप-योजना के रूप में मंजूरी दी। इसके लिए ₹1,600 करोड़ का शुरुआती परिव्यय रखा गया है। यह उप-योजना बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं से पानी को दबावयुक्त पाइपों (Pressurized Piped Systems) और सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से सीधे किसानों के खेतों तक पहुँचाने का काम करती है, जिससे पानी का नुकसान न के बराबर होता है।

हर खेत को पानी

इस घटक का लक्ष्य लघु सिंचाई (Minor Irrigation) प्रणालियों, चाहे वे सतही जल (Surface Water) से जुड़ी हों या भूजल (Groundwater) से, के माध्यम से नए जल स्रोतों का निर्माण करना और सुनिश्चित सिंचाई के तहत खेती योग्य क्षेत्र का विस्तार करना है।

  • सतही लघु सिंचाई और RRR: योजना की शुरुआत से अब तक 3,462 सतही लघु सिंचाई (SMI) और मरम्मत, नवीनीकरण एवं बहाली (Repair, Renovation & Restoration – RRR) योजनाएं सफलतापूर्वक पूरी की जा चुकी हैं। इन पहलों से 5.93 लाख हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता पैदा हुई है।
  • भूजल हस्तक्षेप: जहां सतही जल की कमी है, वहां भूजल से जुड़े वैज्ञानिक हस्तक्षेपों के माध्यम से 88.55 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को सिंचाई के दायरे में लाया गया है।

वाटरशेड विकास

यह घटक वर्षा आधारित (Rainfed) और बंजर या खराब हो चुकी जमीनों (Degraded Lands) की उत्पादक क्षमता को बढ़ाने के लिए एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन पर जोर देता है। इसके तहत मिट्टी की नमी को रोकना, जलभृतों (Aquifers) को पुनर्जीवित करना और वनीकरण शामिल है।

  • निवेश और लाभ: 2016-17 से इस घटक को ₹12,432.09 करोड़ की केंद्रीय सहायता दी गई है, जिससे 1.34 मिलियन (13.4 लाख) किसानों को लाभ हुआ है और प्राकृतिक संसाधनों का स्थायी प्रबंधन सुनिश्चित हुआ है।

प्रति बूंद अधिक फसल

यह घटक सीधे खेत के स्तर पर पानी के उपयोग की दक्षता को अधिकतम करने के लिए समर्पित है।

  • विकासक्रम: वर्ष 2015-16 से 2021-22 तक यह PMKSY का एक अभिन्न अंग था। वर्ष 2022-23 से इसे प्रधानमंत्री कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के हिस्से के रूप में संचालित किया जा रहा है, लेकिन इसका मूल विजन वही है।
  • तकनीक: यह मुख्य रूप से ड्रिप (टपक सिंचाई) और स्प्रिंकलर (छिड़काव सिंचाई) जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देता है।

सूक्ष्म सिंचाई तकनीक: दक्षता और वित्तीय सहायता का गणित

जहाँ HKKP और AIBP जैसी प्रणालियाँ बड़े स्तर पर पानी को खेतों के करीब लाने का बुनियादी ढांचा तैयार करती हैं, वहीं PDMC यह सुनिश्चित करता है कि उस पानी की एक-एक बूंद का कुशलतापूर्वक उपयोग हो।

  • ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation): इस तकनीक में पानी और आवश्यक पोषक तत्वों (फर्टिगेशन के माध्यम से) को सीधे पौधों के जड़ क्षेत्र (Root Zone) में बहुत ही नियंत्रित तरीके से पहुँचाया जाता है। इससे वाष्पीकरण और पानी का बहना पूरी तरह रुक जाता है।
  • स्प्रिंकलर सिंचाई (Sprinkler Irrigation): यह प्रणाली पाइपों और स्प्रे हेड्स के माध्यम से पानी को हवा में छिड़कती है, जिससे प्राकृतिक वर्षा का वातावरण बनता है। यह उबड़-खाबड़ जमीनों के लिए सर्वोत्तम है।

सरकार द्वारा वित्तीय सहायता की संरचना

आधुनिक तकनीकों को अपनाना छोटे किसानों के लिए आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण न हो, इसके लिए सरकार भारी सब्सिडी प्रदान करती है। योजना के नियमों के अनुसार, छोटे और सीमांत किसानों (Small and Marginal Farmers) को सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियाँ स्थापित करने के लिए 55% वित्तीय सहायता दी जाती है, जबकि अन्य सभी श्रेणियों के किसानों (Other Farmers) को 45% की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

इसके अतिरिक्त, इस तकनीक के प्रसार में तेजी लाने के लिए नाबार्ड (NABARD – राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) के तहत एक समर्पित माइक्रो इरिगेशन फंड (Micro Irrigation Fund) की स्थापना की गई है, जिससे राज्यों को रियायती दरों पर ऋण मिलता है।

आज स्थिति यह है कि PDMC योजना भारत के शुद्ध बोए गए क्षेत्र (Net Sown Area) के लगभग 7.98% हिस्से (110.92 लाख हेक्टेयर) को कवर कर चुकी है। हर साल लगभग 9.3 लाख किसानों को इसके तहत वार्षिक सहायता मिल रही है, जो ग्रामीण जीवन स्तर को सुधारने में मील का पत्थर साबित हो रही है।

चुनौतियाँ:

पारंपरिक तरीके से सिंचाई करने के कारण उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता था:

  • भारी मात्रा में पानी और अत्यधिक बिजली की खपत।
  • खेतों में मजदूरों (Labor) की बहुत ज्यादा जरूरत।
  • पानी का असमान वितरण, जिससे फसलों की वृद्धि एक समान नहीं होती थी और उत्पादकता कम रह जाती थी।

बदलाव का मोड़ (2016):

वर्ष 2016 में, उन्होंने PMKSY के तहत स्प्रिंकलर सिंचाई (छिड़काव प्रणाली) को अपनाया। इस एकल निर्णय ने उनके पूरे कृषि उद्यम को बदल कर रख दिया:

  1. उत्पादकता में उछाल: स्प्रिंकलर सिस्टम से पौधों की जड़ों का समान रूप से विकास हुआ और फसल की वृद्धि एक जैसी रही। इसके परिणामस्वरूप उनकी फसल की पैदावार में 25% से 30% तक की भारी वृद्धि दर्ज की गई।
  2. लागत में भारी कमी: पानी, बिजली और श्रम (Labour) की खपत में लगभग 50% की कमी आई। मजदूरों की आवश्यकता 50-60% तक घट गई, जिससे खेती की लागत बहुत नीचे आ गई।
  3. उर्वरक की बचत: इस तकनीक के साथ उर्वरक सीधे पानी के साथ संतुलित मात्रा में दिए गए, जिससे खाद की खपत घटकर पहले की तुलना में लगभग एक-चौथाई (1/4) रह गई।

परिणाम:

इन सब सुधारों के चलते वर्मा भाइयों को ₹60,000 से ₹70,000 प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ (Profit) होने लगा। उनकी इस शानदार सफलता को देखकर आसपास के गांवों के पड़ोसी किसान भी प्रेरित हुए और उन्होंने भी अपने खेतों में स्प्रिंकलर सिस्टम लगवाना शुरू कर दिया। यह केस स्टडी साबित करती है कि कैसे PMKSY का “प्रति बूंद अधिक फसल” का दृष्टिकोण केवल एक नारा नहीं, बल्कि किसानों की आय दोगुनी करने का व्यावहारिक माध्यम है।

निष्कर्ष: एक हरित और जल-सुरक्षित भविष्य की ओर

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) ने पिछले 10 वर्षों में यह साबित कर दिया है कि सतत विकास और आधुनिक तकनीक के मेल से भारतीय कृषि को एक नई दिशा दी जा सकती है। देश के 2.7 करोड़ से अधिक किसानों को मुख्यधारा से जोड़कर, बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर, और कमांड क्षेत्रों का आधुनिकीकरण करके इस योजना ने ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया है।

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, जहाँ पानी की एक-एक बूंद कीमती होती जा रही है, PMKSY जैसी योजनाएं केवल कृषि उत्पादन ही नहीं बढ़ा रहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण और जल को सुरक्षित भी कर रही हैं। यह नए भारत की एक ऐसी सिंचाई क्रांति है, जो ‘हर खेत को पानी’ देने और ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ उगाने के अपने संकल्प को निरंतर पूरा कर रही है।

Meenu Rautela

Meenunewwork@gmail.com

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