MSME: भारत की आर्थिक प्रगति का आधार

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। दिल्ली से लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक, ये उद्यम न केवल रोजगार के करोड़ों अवसर पैदा कर रहे हैं, बल्कि भारत को ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की ओर ले जाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। सरकारी सुधारों, डिजिटलीकरण और नई नीतियों के साथ, यह क्षेत्र अब पहले से कहीं अधिक सशक्त और प्रतिस्पर्धी बन चुका है।

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दिल्ली: दिल्ली की हलचल भरी सड़कों से लेकर भारत के हर छोटे-बड़े गांव तक, ‘एमएसएमई’ (MSME) शब्द आज केवल एक नीतिगत शब्द नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आजीविका का माध्यम बन चुका है। जून 2026 की एक दोपहर, जब हम भारत की आर्थिक तस्वीर पर नजर डालते हैं, तो सबसे पहले जो नाम उभरकर आता है, वह है—सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन जुलाहों, कारीगरों, महिला उद्यमियों और युवाओं की कहानी है जो अपने छोटे व्यवसायों से पूरे देश की तकदीर बदल रहे हैं।

एमएसएमई सेक्टर आज भारत का सबसे जीवंत और गतिशील क्षेत्र बन चुका है। चाहे वह ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योग हो या शहरी क्षेत्रों में स्टार्टअप, यह पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) भारत की विकास गाथा का असली इंजन है। यह क्षेत्र समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को अवसर प्रदान करता है।

MSME का विस्तृत ऐतिहासिक सफर: विरासत से वर्तमान तक

भारत में लघु उद्योगों का इतिहास बहुत पुराना और गौरवशाली है। भारत कभी ‘विश्व गुरु’ और आर्थिक महाशक्ति माना जाता था, जिसका मुख्य कारण उसके कारीगर और दस्तकार थे। ढाका का मलमल हो या कश्मीर की शॉल, भारत के हस्तशिल्प की पूरी दुनिया में मांग थी।

1. औपनिवेशिक काल का प्रभाव:

आजादी से पहले, ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों ने भारत के पारंपरिक कुटीर उद्योगों—जैसे हथकरघा, मिट्टी के बर्तन और हस्तशिल्प—को योजनाबद्ध तरीके से नष्ट कर दिया। अंग्रेज कच्चा माल सस्ते में ले जाते थे और वहां से तैयार माल लाकर भारत के बाजारों में महंगे दामों पर बेचते थे, जिससे हमारे स्थानीय कारीगर बेरोजगार और दरिद्र हो गए।

2. स्वतंत्रता के बाद का पुनर्निर्माण (1947-1990):

आजादी मिलने के बाद, भारत सरकार ने छोटे उद्योगों के महत्व को समझा। 1951 के ‘औद्योगिक नीति संकल्प’ ने पहली बार लघु उद्योगों (Small Scale Industries) को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का आधार माना। 1954 में ‘लघु उद्योग विकास संगठन’ (SIDO) की स्थापना हुई। ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ में छोटे उद्योगों को मुख्य स्थान दिया गया ताकि गांवों में ही रोजगार पैदा हो सके।

3. उदारीकरण और वैश्वीकरण (1991 के बाद):

1990 के दशक में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था खोली। इस दौरान भारतीय एमएसएमई के सामने वैश्विक कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करने की कठिन चुनौती आई। कई इकाइयां बंद हुईं, लेकिन जो टिके रहे, उन्होंने नवाचार को अपनाया।

4. विधायी और संरचनात्मक बदलाव (2006-2026):

वर्ष 2006 में ‘MSMED एक्ट’ का आना मील का पत्थर साबित हुआ। इसके बाद 2007 में अलग मंत्रालय बना। 2020 और फिर 2025 में एमएसएमई की परिभाषा बदली गई ताकि टर्नओवर और निवेश के आधार पर अधिक से अधिक कंपनियां सरकारी सुरक्षा कवच के दायरे में आ सकें। आज, 2026 में, यह क्षेत्र ‘औपचारिक अर्थव्यवस्था’ (Formal Economy) का पर्याय बन चुका है।

तुलनात्मक विश्लेषण: कल की चुनौतियां और आज का सामर्थ्य

आधारऐतिहासिक स्थिति (अतीत)वर्तमान परिदृश्य (2026)
दृष्टिकोणअस्तित्व बचाना ही प्राथमिकता थीवैश्विक बाजारों में नेतृत्व करना लक्ष्य है
परिभाषानिवेश के आधार पर बहुत ही संकुचितनिवेश और टर्नओवर (दोनों) आधारित, व्यापक
पहुंचबैंकों से ऋण लेना एक जटिल प्रक्रिया थीडिजिटल क्रेडिट असेसमेंट मॉडल से सरल ऋण
तकनीकपारंपरिक उपकरण और मैनुअल कार्यएआई, ऑटोमेशन और डिजिटल ई-कॉमर्स
बाजारकेवल स्थानीय मंडियों तक सीमितवैश्विक निर्यात और सरकारी पोर्टल (GeM)

आज का एमएसएमई सेक्टर अतीत की जंजीरों से निकलकर आधुनिक युग में प्रवेश कर चुका है। कल हम केवल ‘उपभोक्ता’ थे, आज हम ‘निर्माता’ हैं।

विकास का वास्तविक इंजन

जनवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार, यह क्षेत्र भारत की जीडीपी में 31.1% का योगदान दे रहा है। यह सिर्फ एक प्रतिशत नहीं है, यह करोड़ों परिवारों की आय है। विनिर्माण उत्पादन में 35.4% की हिस्सेदारी यह बताती है कि भारत का माल दुनिया में बन रहा है। निर्यात में 48.58% की हिस्सेदारी इसे भारत की वैश्विक व्यापार शक्ति का केंद्र बनाती है। कृषि के बाद, एमएसएमई ही वह क्षेत्र है जो सबसे अधिक 38.9 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा है।

वर्ष 2025-26: एक स्वर्णिम अध्याय

पिछले साल एमएसएमई के लिए ‘परिवर्तन का वर्ष’ रहा:

  • डिजिटल औपचारिकरण: ‘उद्यम पंजीकरण पोर्टल’ और ‘उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म’ पर 8.7 करोड़ से अधिक पंजीकरण हो चुके हैं।
  • ऋण में सुगमता: सीजीटीएमएसई (CGTMSE) के तहत गारंटी सीमा को बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये किया गया, जिससे अब एमएसएमई को बिना गारंटी के बड़ा कर्ज मिल रहा है।
  • खादी का परचम: खादी और ग्रामोद्योग की बिक्री 1.27 लाख करोड़ रुपये के पार पहुँच गई है, जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
  • शिकायत निवारण में नवाचार: ‘एमएसएमई समाधान’ और ‘चैंपियंस’ पोर्टल पर शिकायतों का 99.72% समाधान एक क्रांतिकारी बदलाव है।

सशक्तीकरण के स्तंभ: प्रमुख सरकारी योजनाएं

सरकार की नीतियां आज सीधे ‘उद्यमी’ (Udyami) की जरूरतों को समझकर बनाई जा रही हैं:

  1. पीएम विश्वकर्मा: 18 पारंपरिक व्यवसायों के कारीगरों के लिए यह योजना वरदान है। महज दो वर्षों में 30 लाख लाभार्थियों का लक्ष्य पूरा करना सरकार की तत्परता दिखाता है। कौशल प्रशिक्षण से लेकर टूलकिट तक, यह योजना कारीगरों को आधुनिक बाजार से जोड़ रही है।
  2. एमएसएमई चैंपियंस योजना: ‘जीरो डिफेक्ट जीरो इफेक्ट’ (ZED) मॉडल अपनाकर ये कंपनियां वैश्विक मानकों की ओर बढ़ रही हैं। आज 6.68 लाख से ज्यादा उद्यम प्रमाणित हो चुके हैं।
  3. स्व-निर्भर भारत (SRI) फंड: इक्विटी सपोर्ट की कमी अब विकास में बाधक नहीं है। बजट 2026-27 में 2,000 करोड़ का अतिरिक्त फंड इस क्षेत्र में निवेश का विश्वास बढ़ाता है।
  4. RAMP योजना: विश्व बैंक के सहयोग से, यह राज्य और केंद्र के बीच एक सेतु है, जिससे 55 लाख से अधिक एमएसएमई लाभान्वित हुए हैं।
  5. पीएमईजीपी (PMEGP): इस योजना ने 10.84 लाख से अधिक micro-units को खड़ा किया है, जिसने 97 लाख से अधिक परिवारों को आजीविका दी है।

निष्कर्ष: भविष्य की ओर कदम

एमएसएमई की यह यात्रा ‘एंटरप्राइज से एम्पावरमेंट’ तक की एक गौरवशाली गाथा है। आज जब हम ‘विकसित भारत 2047’ की बात करते हैं, तो एमएसएमई वह आधारशिला है जिस पर यह महान राष्ट्र खड़ा होगा। यह केवल व्यापार करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के सपनों की उड़ान है। प्रौद्योगिकी, डिजिटल साक्षरता और समावेशी नीतियों के साथ, एमएसएमई क्षेत्र न केवल भारत को आत्मनिर्भर बना रहा है, बल्कि विश्व के आर्थिक मानचित्र पर भारत को एक ‘ग्लोबल पावरहाउस’ के रूप में स्थापित कर रहा है।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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