अपराधियों के लिए अब बचना नामुमकिन, पुलिस के हाथों में आया 'अभिज्ञान' तकनीक का अचूक हथियार

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क्या है अपराधियों को पकड़ने वाला ‘अभिज्ञान’ ऐप?

नई दिल्ली / ब्यूरो:

अपराध की दुनिया में एक बहुत पुरानी और मशहूर कहावत है—इंसान अपना नाम बदल सकता है, शहर बदल सकता है, यहाँ तक कि अपनी पहचान छिपाने की हर मुमकिन कोशिश कर सकता है… लेकिन जो चीज़ छिपाना सबसे मुश्किल होता है, वो हैं उसके उंगलियों के निशान।”

19 जून 2026 को भारत सरकार ने इसी अकाट्य सत्य को डिजिटल अमलीजामा पहनाते हुए देश की आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था में एक ऐतिहासिक अध्याय की शुरुआत की है। केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा लॉन्च किया गया “अभिज्ञान” (Abhigyan) ऐप भारत की पारंपरिक पुलिसिंग को कागज़ों, फाइलों और धूल खाती परछाइयों वाले रिकॉर्ड रूम से बाहर निकालकर रियल-टाइम डेटा और अत्याधुनिक बायोमेट्रिक्स के हाथ में सौंप रहा है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) द्वारा विकसित यह तकनीक भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों (Law Enforcement Agencies) के लिए एक ऐसा अभेद्य जाल साबित होने जा रही है, जिससे बच निकलना किसी भी शातिर अपराधी के लिए अब मुमकिन नहीं होगा। आइए इस खोजी रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि यह ‘अभिज्ञान’ ऐप क्या है, इसके पीछे का ‘केंद्रीय दिमाग’ कैसे काम करता है, और यह कैसे भारतीय न्याय प्रणाली की रूपरेखा को हमेशा के लिए बदलने वाला है।

क्या है ‘अभिज्ञान’ ऐप और यह कैसे काम करता है?

सरल शब्दों में कहें तो ‘अभिज्ञान’ फील्ड में तैनात पुलिस अधिकारियों के लिए एक स्मार्ट मोबाइल इंटरफेस है। यह कोई साधारण ऐप नहीं है जिसे गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सके; यह केवल अधिकृत सुरक्षा कर्मियों के लिए डिज़ाइन किया गया एक एन्क्रिप्टेड और सुरक्षित प्लेटफॉर्म है। यह सीधे तौर पर एक चलता-फिरता फॉरेंसिक पुलिस स्टेशन है।

पोर्टेबल और सुलभ तकनीक

अब तक पुलिस को किसी फिंगरप्रिंट की जांच करने के लिए बड़े और भारी वर्कस्टेशन या जिला मुख्यालय के फॉरेंसिक लैब पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन ‘अभिज्ञान’ ऐप ने इस पूरी प्रक्रिया को बेहद छोटा और पोर्टेबल बना दिया है। इसके जरिए सड़क पर गश्त कर रहा सिपाही या किसी नाके पर तैनात पुलिस अधिकारी अपने साथ एक छोटा (ब्लूटूथ या टाइप-सी से चलने वाला) फिंगरप्रिंट स्कैनर रख सकेगा, जो सीधे उनके स्मार्टफोन से कनेक्ट होगा।

ऑन-द-स्पॉट जांच की ताकत

मान लीजिए किसी रात नाकाबंदी के दौरान पुलिस को एक संदिग्ध कार या व्यक्ति मिलता है। वह व्यक्ति अपना नाम गलत बताता है या फर्जी आधार/पहचान पत्र पेश करता है। पारंपरिक पुलिसिंग में पुलिस के पास मौके पर यह जांचने का कोई तरीका नहीं होता था कि वह व्यक्ति सच बोल रहा है या झूठ। लेकिन अब, ‘अभिज्ञान’ ऐप की मदद से उस संदिग्ध के अंगूठे के निशान को मौके पर ही स्कैन किया जा सकेगा।

केंद्रीय डेटाबेस से सीधा जुड़ाव

यह ऐप इस फिंगरप्रिंट को स्कैन करते ही उसे हवा की गति से सीधे देश के केंद्रीय सर्वर से जोड़ देता है। यह सर्वर चंद सेकेंडों के भीतर उस फिंगरप्रिंट का मिलान देश भर के आपराधिक रिकॉर्ड से करता है। अगर वह व्यक्ति पहले कभी किसी भी राज्य में किसी भी अपराध में शामिल रहा है, तो चंद मिनटों के भीतर उसका पूरा आपराधिक इतिहास, पुराने मामले, दर्ज एफआईआर और अदालती रिकॉर्ड पुलिस अधिकारी की मोबाइल स्क्रीन पर लाइव हो जाएंगे।

बदलाव क्या है? पहले किसी संदिग्ध की पहचान की पुष्टि के लिए उसे पुलिस स्टेशन लाना पड़ता था, या कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था जिसमें कई दिन लग जाते थे। इस देरी का फायदा उठाकर कई बार बड़े अपराधी पुलिस की गिरफ्त से छूट जाते थे। अब डेटा सीधे पुलिस अधिकारी के हाथ में (मोबाइल पर) चौबीसों घंटे मौजूद रहेगा।

NAFIS: इस पूरे डिजिटल तंत्र का ‘केंद्रीय दिमाग’

यदि ‘अभिज्ञान’ ऐप को हम एक हाथ या जरिया मानें, तो NAFIS (National Automated Fingerprint Identification System) उसका मुख्य सर्वर, रीढ़ की हड्डी या केंद्रीय दिमाग है। ‘अभिज्ञान’ ऐप की पूरी ताकत इसी बैकएंड सिस्टम पर टिकी है।

[अभिज्ञान ऐप (फील्ड ऑफिसर)] ──(रियल-टाइम स्कैन)──> [NAFIS केंद्रीय सर्वर] ──> [देशभर के पुलिस रिकॉर्ड से मिलान]

NAFIS की शुरुआत और संचालन

राष्ट्रीय स्तर पर NAFIS को साल 2022 में चरणबद्ध तरीके से शुरू किया गया था। इसे पूरी तरह से NCRB (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) द्वारा प्रबंधित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के आपराधिक डेटा को एक सूत्र में पिरोना था।

एक एकीकृत और अभेद्य प्लेटफॉर्म

भारत में कानून व्यवस्था (Law and Order) राज्य का विषय है, जिसके कारण हर राज्य की पुलिस का अपना अलग सिस्टम होता था। NAFIS देश का पहला ऐसा एकीकृत प्लेटफॉर्म है जो अलग-अलग राज्यों की पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों (जैसे CBI, NIA, NCB) के फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड्स को एक जगह जोड़ता है। वर्तमान में इसमें देश भर के करोड़ों बायोमेट्रिक और आपराधिक रिकॉर्ड्स का एक विशाल और सुरक्षित जाल मौजूद है, जिसमें हर नए अपराध और गिरफ्तारी के साथ डेटा लगातार (Real-time) अपडेट होता रहता है। NAFIS हर अपराधी को एक यूनिक नेशनल फिंगरप्रिंट नंबर (NFN) देता है, जो उसकी ताउम्र पहचान बन जाता है।

फिंगरप्रिंट तकनीक और भारत का ऐतिहासिक कनेक्शन

यह जानकर कई लोगों को हैरानी हो सकती है कि आज दुनिया भर में जिस आधुनिक फिंगरप्रिंट पहचान प्रणाली (Fingerprint Identification) का इस्तेमाल किया जाता है, उसके शुरुआती प्रशासनिक और वैज्ञानिक प्रयोगों में भारत की बहुत बड़ी और ऐतिहासिक भूमिका रही है।

19वीं सदी के अंत में, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब तत्कालीन बंगाल क्षेत्र में पहली बार प्रशासनिक स्तर पर उंगलियों के निशानों से इंसानों की पहचान करने के प्रयोग शुरू हुए थे। साल 1897 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में दुनिया का पहला फिंगरप्रिंट ब्यूरो’ स्थापित किया गया था।

सर विलियम हर्शेल और सर फ्रांसिस गाल्टन जैसे ब्रिटिश विशेषज्ञों ने भारतीय पुलिस अधिकारियों—विशेष रूप से काजी अजीजुल हक और हेमचंद्र बोस—के साथ मिलकर एक ऐसी गणितीय प्रणाली विकसित की थी, जिससे लाखों फिंगरप्रिंट्स को वर्गीकृत (Classify) किया जा सके। इसी प्रणाली को बाद में ‘हेनरी क्लासिफिकेशन सिस्टम’ के नाम से जाना गया, जिसने दुनिया भर में फॉरेंसिक विज्ञान की नींव रखी।

इसलिए, जब भारत 2026 में ‘अभिज्ञान’ जैसी तकनीक ला रहा है, तो यह कोई आयातित या विदेशी विचार नहीं है। भारत इस विधा का जन्मदाता रहा है, और अब हम इसके सबसे आधुनिक, स्वदेशी, क्लाउड-बेस्ड और डिजिटल रूप को अपना रहे हैं।

भारतीय पुलिसिंग के लिए यह कितना बड़ा गेम-चेंजर है?

पारंपरिक पुलिसिंग की सबसे बड़ी कमजोरी हमेशा से इंटर-स्टेट पहचान (Inter-state Identification) रही है। भारत की भौगोलिक विशालता और अलग-अलग राज्यों की पुलिस प्रणालियों के बीच समन्वय की कमी का फायदा अपराधी दशकों से उठाते आए हैं। अगर कोई शातिर अपराधी उत्तर प्रदेश या दिल्ली में अपराध करके मुंबई, बेंगलुरु या कोलकाता भाग जाता था और वहां अपना नाम और हुलिया बदलकर रहने लगता था, तो उसे ढूंढना और उसके पुराने मामलों से जोड़ना लगभग नामुमकिन हो जाता था।

‘अभिज्ञान’ और NAFIS का यह आधुनिक कॉम्बिनेशन इस पूरी चुनौती और पुलिसिंग के ढर्रे को निम्नलिखित पांच तरीकों से बदल देगा:

क. फास्ट-ट्रैक पहचान और त्वरित कार्रवाई

रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, हवाई अड्डों या अंतर-राज्यीय सीमाओं पर संदिग्धों की तुरंत पहचान की जा सकेगी। यदि कोई घोषित अपराधी या भगोड़ा (Absconder) किसी दूसरे राज्य में किसी छोटे-मोटे मामले में भी पकड़ा जाता है, तो उसकी असली पहचान तुरंत उजागर हो जाएगी।

ख. संगठित अपराध और टेरर नेटवर्क पर प्रहार

आतंकवादी और संगठित अपराध करने वाले गिरोह अक्सर फर्जी दस्तावेजों के सहारे जीवित रहते हैं। ‘अभिज्ञान’ उनके बायोमेट्रिक्स को पकड़ेगा, जिसे बदला नहीं जा सकता। एक राज्य की पुलिस को दूसरे राज्य की पुलिस के रिकॉर्ड्स का एक्सेस मिलने से गैंगस्टर्स और स्लीपर सेल्स के नेटवर्क को ध्वस्त करना बेहद आसान हो जाएगा।

ग. वैज्ञानिक और अकाट्य चार्जशीट

भारतीय अदालतों में मुकदमों के लंबे समय तक खिंचने का एक बड़ा कारण गवाहों का मुकर जाना (Hostile Witnesses) या समय के साथ सबूतों का नष्ट हो जाना होता है। लेकिन अब, अदालतों में पेश की जाने वाली चार्जशीट (आरोप पत्र) पारंपरिक गवाहों के बजाय ठोस वैज्ञानिक, डिजिटल और फॉरेंसिक आधार पर तैयार होगी।

घ. दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) में सुधार

दुनिया भर के विकसित देशों में Evidence-based Policing (साक्ष्य-आधारित पुलिसिंग) का पालन किया जाता है। अदालत में जब फॉरेंसिक एविडेंस (वैज्ञानिक सबूत) पेश किए जाते हैं, तो जजों के लिए सटीक फैसला सुनाना आसान होता है। ‘अभिज्ञान’ के आने से भारत में भी अपराधियों को सजा मिलने की दर में भारी सुधार होने की उम्मीद है।

ङ. अज्ञात शवों और लापता लोगों की पहचान

हर साल देश में हजारों ऐसे शव मिलते हैं जिनकी शिनाख्त नहीं हो पाती। इसके अलावा लाखों लोग लापता हो जाते हैं। ‘अभिज्ञान’ ऐप के जरिए पुलिस अज्ञात शवों के फिंगरप्रिंट लेकर राष्ट्रीय डेटाबेस से मिलान कर सकती है, जिससे उनके परिजनों तक पहुंचने और मौतों के पीछे के रहस्य को सुलझाने में बड़ी मदद मिलेगी।

5. सुरक्षा बनाम निजता (Security vs Privacy) का बड़ा सवाल

विज्ञान और तकनीक का एक नियम है—तकनीक जितनी शक्तिशाली और प्रभावी होती है, वह प्रशासन से उतनी ही बड़ी जवाबदेही और कानून के कड़े दायरे की मांग भी करती है। जहां एक तरफ ‘अभिज्ञान’ ऐप अपराधियों के मन में खौफ पैदा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों के मन में कुछ गंभीर सवाल और चिंताएं भी पैदा हो रही हैं।

चुनौती का क्षेत्रमुख्य चिंता और सवालसंभावित समाधान / सुरक्षा तंत्र
कानूनी दायराक्या पुलिस किसी भी आम नागरिक को रोककर उसका फिंगरप्रिंट ले सकती है?Criminal Procedure (Identification) Act, 2022 के कड़े नियमों का पालन।
डेटा का दुरुपयोगफील्ड स्तर पर किसी अधिकारी द्वारा व्यक्तिगत रंजिश या डेटा लीक की संभावना।ऐप में सख्त लॉगिंग (Logging) और केवल ‘रीड-ओनली’ एक्सेस की व्यवस्था।
नागरिक अधिकारआम नागरिकों की निजता (Privacy) का हनन होने का खतरा।भारत के नए DPDP एक्ट (Digital Personal Data Protection Act) के तहत कड़े दंड के प्रावधान।

कानूनी सीमाएं और नागरिक अधिकार

भारत में लागू Criminal Procedure (Identification) Act, 2022 कुछ विशेष कानूनी परिस्थितियों, गंभीर अपराधों के मामलों या मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही पुलिस को बायोमेट्रिक रिकॉर्डिंग करने और उसे स्टोर करने का अधिकार देता है। ऐसे में मैदान (फील्ड) स्तर पर इस तकनीक का उपयोग कब, कहाँ और किन परिस्थितियों में किया जाएगा, इसकी सीमाएं अत्यंत स्पष्ट होनी चाहिए। ऐसा न होने पर पुलिस द्वारा आम जनता को बेवजह परेशान किए जाने के मामले सामने आ सकते हैं।

डेटा सुरक्षा की अभेद्य दीवार की आवश्यकता

चूंकि यह डेटा क्लाउड और सर्वर पर उपलब्ध होगा, इसलिए इसकी साइबर सुरक्षा (Cyber Security) सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। किसी भी आम नागरिक या संदिग्ध का डेटा डार्क वेब पर लीक न हो या इसका गलत इस्तेमाल न हो, इसके लिए देश के डेटा संरक्षण कानूनों के तहत एक अत्यंत मजबूत, एन्क्रिप्टेड और ऑडिटेड सुरक्षा तंत्र की सख्त जरूरत होगी।

निष्कर्ष: सिर्फ आधुनिकता नहीं, बेहतर न्याय की उम्मीद

भविष्य की योजनाओं के अनुसार, ‘अभिज्ञान’ ऐप और NAFIS के इस मॉडल को आने वाले समय में Crime Scene Forensics, Digital Evidence और ICJS (Inter-operable Criminal Justice System) के पूरे इकोसिस्टम से जोड़ा जाएगा। इसका मतलब यह है कि पुलिस, फॉरेंसिक लैब, अदालतें और जेलें—सभी एक ही डिजिटल हाईवे पर होंगे, जिससे भारतीय न्याय प्रणाली की गति कई गुना बढ़ जाएगी।

लेकिन अंततः, इस पूरी तकनीक की असली जीत सिर्फ जांच को तेज करने, फाइलों का वजन कम करने या अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजने में नहीं है। इस डिजिटल क्रांति की असली सफलता इस बात संतुलन में छिपी है कि—

  • किसी भी बेगुनाह, गरीब या समाज के हाशिए पर मौजूद व्यक्ति पर बेवजह शक न किया जाए और न ही उसकी निजता का हनन हो।
  • सही अपराधी तक कानून के हाथ जल्द से जल्द, बिना किसी मानवीय पूर्वाग्रह या राजनीतिक दबाव के पहुंचें।
  • और सबसे जरूरी, देश के आम आदमी का भारत की न्याय व्यवस्था और खाकी पर भरोसा मजबूत हो।

आने वाले समय में भारत की पुलिसिंग कितनी डिजिटल, हाई-टेक या एआई-संचालित (AI-powered) होगी, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि इस बदलाव के बाद हमारा कानून कितना सटीक, निष्पक्ष, मानवीय और सही फैसला लेता है। यही अंतिम कसौटी तय करेगी कि हम तकनीक के दम पर सिर्फ आधुनिक बन रहे हैं या सच में एक बेहतर, सुरक्षित और न्यायप्रिय समाज की ओर बढ़ रहे हैं।

Meenu Rautela

Meenunewwork@gmail.com

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