विश्व शरणार्थी दिवस: बेघर होने का ‘संकट’ और उम्मीद के बीच जूझती आधी दुनिया

युद्ध, हिंसा और जलवायु परिवर्तन के कारण इतिहास के सबसे बड़े विस्थापन 'संकट' के मुहाने पर खड़ी है वैश्विक आबादी; जानिए सरहदों के आर-पार की यह महा-गाथा।

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नई दिल्ली: इंसान का घर सिर्फ ईंट, गारे और सीमेंट से बना एक भौतिक ढांचा नहीं होता। घर असल में उसकी संस्कृति, उसकी स्मृतियों, उसके पुरखों की विरासत और उसके बच्चों के भविष्य का एक सुरक्षित कोना होता. है। लेकिन ज़रा ठहरिए और आंखें बंद करके उस भयावह मंजर की कल्पना कीजिए, जब आधी रात को गोलियों की तड़तड़ाहट और बमों के धमाकों के बीच आपकी नींद खुले। आपके पास सोचने के लिए एक पल भी न हो, और आपको अपने रोते हुए बच्चों का हाथ पकड़कर, सब कुछ पीछे छोड़कर, बस एक जोड़ी कपड़ों में किसी अनजान दिशा की ओर भागना पड़े। न कोई ठिकाना, न रास्ते का पता, और न ही यह उम्मीद कि अगली सुबह का सूरज आप देख भी पाएंगे या नहीं।

यह किसी सिनेमा की काल्पनिक या डरावनी पटकथा नहीं है, बल्कि इस वक्त दुनिया के नक्शे पर मौजूद करोड़ों शरणार्थियों की कड़वी, नग्न और रूह को कंपा देने वाली हकीकत है।

संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हर साल 20 जून को ‘विश्व शरणार्थी दिवस’ (World Refugee Day) मनाया जाता है। यह दिन उन लाखों-करोड़ों लोगों के अदम्य साहस, उनके अटूट संघर्ष, उनकी सिसकियों और उनके धैर्य को सम्मान देने के लिए समर्पित है, जिन्हें युद्ध, राजनीतिक हिंसा, धार्मिक उत्पीड़न, मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन और विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपना वतन, अपनी मातृभूमि छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। यह दिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह याद दिलाने का अवसर है कि सरहदों के खेल में जब राजनीति उलझती है, तो उसकी सबसे भारी कीमत आम इंसानों को अपनी पहचान खोकर चुकानी पड़ती है।

इतिहास की कड़वी कड़ियां: क्यों और कैसे शुरू हुआ यह सफर?

विश्व शरणार्थी दिवस की जड़ें आज से ढाई दशक पहले के वैश्विक घटनाक्रमों से जुड़ी हुई हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया ने विस्थापन की जो विभीषिका देखी थी, उसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद, संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दिसंबर 2000 में एक विशेष प्रस्ताव पारित किया गया। इस प्रस्ताव के तहत तय हुआ कि वर्ष 2001 से हर साल 20 जून को औपचारिक रूप से विश्व शरणार्थी दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

यह साल बेहद खास था, क्योंकि यह शरणार्थियों की कानूनी स्थिति से संबंधित 1951 के संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (1951 Refugee Convention) की 50वीं वर्षगांठ का भी वर्ष था। इस ऐतिहासिक कन्वेंशन ने ही पहली बार अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में यह तय किया था कि ‘शरणार्थी’ कौन है और उन्हें किसी भी सभ्य समाज में क्या-क्या बुनियादी अधिकार मिलने चाहिए।

यूएनएचसीआर (UNHCR) के चश्मे से: कौन है शरणार्थी?

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त के वैधानिक मानदंडों के अनुसार, हर वह व्यक्ति शरणार्थी की श्रेणी में आता है:

  • जो अपने मूल देश से बाहर है और नस्ल, धर्म, राष्ट्रीयता, किसी विशेष सामाजिक समूह की सदस्यता, या राजनीतिक विचारधारा के कारण उत्पीड़न के वास्तविक डर से जी रहा है।
  • जो अपने देश में जारी किसी सशस्त्र संघर्ष, गृहयुद्ध या व्यापक हिंसा के कारण अपनी जान बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने पर मजबूर हुआ है।
  • जिसे अपने देश की सरकार सुरक्षा देने में पूरी तरह नाकाम रही हो या खुद वहां की सरकार ही उसके उत्पीड़न का कारण बन चुकी हो।

इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य केवल साल में एक बार आंकड़ों की नुमाइश करना नहीं है, बल्कि दुनिया की सोई हुई अंतरात्मा को जगाना है। यह दिन वैश्विक ताकतों से यह सवाल करता है कि जब तकनीक और विकास के मोर्चे पर दुनिया इतनी आगे निकल चुकी है, तब इंसानों को शरणार्थी शिविरों के तंबुओं में कीड़े-मकोड़ों की तरह जिंदगी गुजारने पर क्यों मजबूर होना पड़ रहा है?

वैश्विक परिदृश्य: विस्थापन का आधुनिक महा-संकट

अगर हम वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें, तो जबरन विस्थापन (Forced Displacement) का ग्राफ डराने वाले स्तर पर पहुंच चुका है। शीत युद्ध के दौर के बाद से लेकर आज तक, दुनिया ने कभी भी इतनी बड़ी संख्या में लोगों को बेघर होते नहीं देखा। दुनिया के अलग-अलग कोनों में सुलगती जंग की आग ने करोड़ों जिंदगियों को स्वाहा कर दिया है।

प्रमुख संकटग्रस्त क्षेत्र और उनकी ज़मीनी हकीकत

1. यूक्रेन और गाजा का अंतहीन संघर्ष: यूरोप के मुहाने पर जारी यूक्रेन युद्ध ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के सबसे बड़े शरणार्थी संकट को जन्म दिया। लाखों महिलाओं और बच्चों को रातों-रात पोलैंड, रोमानिया और अन्य यूरोपीय देशों में शरण लेनी पड़ी। वहीं दूसरी ओर, गाजा पट्टी में जारी भीषण सैन्य कार्रवाइयों ने पूरे इलाके को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है। वहां आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने ही देश के भीतर ‘आंतरिक रूप से विस्थापित’ (Internationally Displaced Persons) होकर बुनियादी मानवीय सहायता के लिए तरस रहा है।

2. सूडान और उप-सहारा अफ्रीका का गृहयुद्ध: अफ्रीका महाद्वीप का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय से सैन्य तख्तापलट और कबीलाई हिंसा की आग में जल रहा है। सूडान में जारी आंतरिक सैन्य संघर्ष ने लाखों नागरिकों को चाड, मिस्र और दक्षिण सूडान की सीमाओं की तरफ भागने पर मजबूर कर दिया है। भूखमरी, पानी की किालत और चिकित्सा सुविधाओं का अभाव इन शरणार्थियों की नियति बन चुका है।

3. अफगानिस्तान का मानवाधिकार संकट: सत्ता परिवर्तन के बाद से अफगानिस्तान में जो सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां बनीं, उसने देश के बुद्धिजीवियों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को देश छोड़ने पर विवश कर दिया। पाकिस्तान और ईरान की सीमाओं पर लाखों अफगान नागरिक आज भी अनिश्चित भविष्य के साये में जी रहे हैं, जहां उनके पास न तो नागरिक अधिकार हैं और न ही सम्मानजनक आजीविका।

4. म्यांमार का रोहिंग्या संकट: दक्षिण-पूर्व एशिया में म्यांमार के राखाइन प्रांत से उजड़े रोहिंग्या समुदाय की दास्तां आधुनिक इतिहास के सबसे क्रूरतम विस्थापनों में से एक है। अपनी नागरिकता और बुनियादी अधिकारों से महरुम किए गए लाखों रोहिंग्या शरणार्थी आज बांग्लादेश के कॉक्स बाजार जैसे विशालकाय और तंग शरणार्थी शिविरों में अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं।

जलवायु परिवर्तन: अदृश्य दुश्मन जो बना रहा है ‘क्लाइमेट रिफ्यूजी’

अब तक दुनिया विस्थापन के पीछे केवल बंदूकों, मिसाइलों और तानाशाहों को ही जिम्मेदार मानती थी, लेकिन अब एक नया और बेहद खतरनाक आयाम जुड़ गया है—जलवायु परिवर्तन (Climate Change)। पर्यावरण वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि आने वाले दशकों में भू-राजनीतिक संघर्षों से कहीं ज्यादा लोग पर्यावरण की मार के कारण विस्थापित होंगे।

  • समुद्र का बढ़ता जलस्तर: छोटे द्वीपीय देश और तटीय इलाके धीरे-धीरे समुद्र के पानी में समा रहे हैं। बांग्लादेश के तटीय जिलों से लेकर प्रशांत महासागर के द्वीपों तक, लोग अपनी जमीनें खो रहे हैं।
  • अतिवादी मौसमी घटनाएं: बेमौसम और भीषण बाढ़, सालों-साल चलने वाला सूखा, और लगातार आने वाले चक्रवातों ने कृषि प्रधान देशों की कमर तोड़ दी है। जब जमीन अनाज उगाना बंद कर देती है, तो भुखमरी से बचने के लिए इंसानों के पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

इन लोगों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अभी भी वह कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है जो युद्ध के शरणार्थियों को मिलता है, जिससे इनकी स्थिति और भी ज्यादा नाजुक और चिंताजनक हो जाती है।

चुनौतियों का अंतहीन चक्रव्यूह: सीमा पार करने के बाद का नरक

एक शरणार्थी की असली परीक्षा किसी तरह रेंगते हुए, गोलियों से बचते हुए या समुद्र की लहरों को पार करके किसी दूसरे देश की सीमा में दाखिल होने के साथ खत्म नहीं होती। असल में, उनका संघर्ष उस नए देश की धरती पर कदम रखते ही एक नए और ज्यादा जटिल रूप में शुरू होता है।

1. बुनियादी मानवाधिकारों के लिए दैनिक जंग: शरणार्थी शिविरों की तस्वीरें दूर से जितनी सहानुभूति पैदा करती हैं, अंदर की हकीकत उतनी ही डरावनी होती है। प्लास्टिक के तंबुओं के नीचे तड़पती गर्मी और ठिठुरती ठंड में जिंदगी गुजारनी पड़ती है। स्वच्छ पेयजल का अभाव, शौचालय की बदतर व्यवस्था और कुपोषण के कारण महामारियों का खतरा हमेशा बना रहता है।

2. पहचान और कानूनी शून्यता का संकट: बिना वैध दस्तावेजों के किसी दूसरे देश में होना एक व्यक्ति को कानूनी रूप से अदृश्य बना देता है। वे न तो बैंक खाता खोल सकते हैं, न कानूनी रूप से नौकरी कर सकते हैं, और न ही अपने बच्चों का किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करा सकते हैं। यह कानूनी शून्यता उन्हें स्थानीय नियोक्ताओं के हाथों शोषण का आसान शिकार बना देती है, जहां उन्हें बेहद कम मजदूरी पर बंधुआ मजदूरों की तरह काम करना पड़ता है।

3. भाषा, संस्कृति और सामाजिक स्वीकार्यता की दीवार: एक नई भाषा को सीखना और पूरी तरह से अलग सांस्कृतिक परिवेश में खुद को ढालना मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ देने वाला होता है। कई बार मेजबान देशों के स्थानीय नागरिकों में यह डर बैठ जाता है कि शरणार्थी उनके संसाधनों, नौकरियों और संस्कृति पर कब्जा कर लेंगे। यह डर धीरे-धीरे जेनोफोबिया (Xenophobia – प्रवासियों के प्रति नफरत) और नस्लीय भेदभाव का रूप ले लेता है।

4. महिलाओं और मासूम बच्चों की मर्मांतक स्थिति: विस्थापन की सबसे भारी और अमानवीय कीमत महिलाओं और बच्चों को चुकानी पड़ती है।

यूएनएचसीआर के आंकड़े बताते हैं कि कुल शरणार्थी आबादी में लगभग आधी संख्या बच्चों की है। इनमें से लाखों बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा; उनका बचपन शरणार्थी शिविरों की धूल में ही दफन हो जाता है।”

अकेली महिलाएं और युवतियां मानव तस्करी (Human Trafficking), यौन शोषण और घरेलू हिंसा के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील होती हैं। उनके पास न तो सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होते हैं और न ही न्याय मांगने के लिए कोई कानूनी मंच।

भारत और शरणार्थी संरक्षण की महान और गौरवशाली परंपरा

जब पूरी दुनिया शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएं सील कर रही थी और कटीले तार लगा रही थी, तब भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास मानवता के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहा था। ‘अतिथि देवो भव’ (अतिथि भगवान के समान होता है) और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया ही एक परिवार है) के शाश्वत सिद्धांतों को भारत ने केवल किताबों में नहीं रखा, बल्कि अपनी विदेश नीति और सामाजिक ताने-बाने में जिया है।

एक अद्वितीय और मानवीय दृष्टिकोण

यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य है कि भारत ने 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन और इसके 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इसके पीछे भारत की अपनी रणनीतिक और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताएं रही हैं। लेकिन इसके बावजूद, शरणार्थियों के प्रति भारत का मानवीय ट्रैक रिकॉर्ड दुनिया के कई विकसित और हस्ताक्षरकर्ता देशों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध और अनुकरणीय रहा है।

भारत ने अपने इतिहास में कई बार बड़े पैमाने पर शरणार्थियों को न केवल सुरक्षित पनाह दी, बल्कि उन्हें भारतीय समाज का एक सम्मानित हिस्सा बनने का अवसर भी दिया:

  • तिब्बती शरणार्थी (1959): जब तिब्बत में धार्मिक और सांस्कृतिक दमन बढ़ा, तब भारत ने परम पावन दलाई लामा और उनके हजारों अनुयायियों का खुले दिल से स्वागत किया। आज हिमाचल प्रदेश का धर्मशाला इसका जीवंत उदाहरण है, जहां तिब्बती संस्कृति सुरक्षित और जीवंत है।
  • 1971 का बांग्लादेशी शरणार्थी संकट: यह आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े मानवीय राहत अभियानों में से एक था। जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने कत्लेआम मचाया, तब भारत ने अपनी सीमित आर्थिक क्षमताओं के बावजूद लगभग एक करोड़ शरणार्थियों के लिए अपने बॉर्डर खोल दिए और उन्हें भोजन और आश्रय दिया।
  • श्रीलंकाई तमिल: श्रीलंका में चले लंबे और खूनी गृहयुद्ध के दौरान जान बचाकर भागने वाले हजारों तमिल नागरिकों को भारत के दक्षिणी राज्यों में सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से बसाया गया।
  • अफगान नागरिक: अफगानिस्तान में जब-जब राजनीतिक उथल-पुथल हुई, भारत ने वहां के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों, सिखों, हिंदुओं और अन्य नागरिकों को हमेशा एक सुरक्षित आशियाने का अहसास कराया।

भारतीय न्यायपालिका ने भी संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत की धरती पर मौजूद हर व्यक्ति को, चाहे वह भारत का नागरिक हो या विदेशी शरणार्थी, सम्मान के साथ जीने और कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्राप्त है।

सहायता के पात्र नहीं, विकास के भागीदार: दृष्टिकोण बदलने का समय

आधुनिक अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि अब समय आ गया है जब दुनिया को शरणार्थियों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। उन्हें हमेशा एक ‘बोझ’ या सिर्फ ‘दया और खैरात के पात्र’ के रूप में देखना बंद करना होगा।

शरणार्थी अपने साथ सिर्फ अपनी बेबसी लेकर नहीं आते, बल्कि वे अपने साथ विविध प्रकार के कौशल (Skills), कला, बौद्धिक क्षमता और काम करने का जज्बा भी लेकर आते हैं। यदि मेजबान देश दूरदर्शी नीतियां अपनाएं और उन्हें निम्नलिखित अवसर प्रदान करें, तो स्थितियां पूरी तरह बदल सकती हैं:

  • समावेशी शिक्षा और प्रशिक्षण: युवा शरणार्थियों को तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
  • श्रम बाजार में प्रवेश: उन्हें कानूनी रूप से काम करने की अनुमति देने से वे स्थानीय अर्थव्यवस्था में करदाता (Taxpayers) की भूमिका निभा सकते हैं।
  • उद्यमिता को बढ़ावा: कई शरणार्थियों ने अपनी कड़ी मेहनत के बल पर नए स्टार्टअप और व्यवसाय शुरू किए हैं, जिससे स्थानीय नागरिकों के लिए भी रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं।

जब हम किसी शरणार्थी को आत्मनिर्भर बनने का अवसर देते हैं, तो हम वास्तव में एक इंसान को उसकी खोई हुई गरिमा वापस लौटा रहे होते हैं।

स्थायी समाधान के लिए वैश्विक शक्तियों को उठाने होंगे ठोस कदम

विश्व शरणार्थी दिवस केवल एक दिन की संवेदनशीलता और सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इस संकट के स्थायी और दीर्घकालिक समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र और दुनिया की महाशक्तियों को अपनी राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। इसके लिए एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है:

1. संघर्षों का शांतिपूर्ण और कूटनीतिक समाधान: जब तक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध और हथियारों की होड़ बंद नहीं होगी, तब तक नए शरणार्थी बनते रहेंगे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अपनी आंतरिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को छोड़कर गृहयुद्धों को रोकने के लिए प्रभावी और निष्पक्ष मध्यस्थता करनी होगी।

2. मानवाधिकारों की जमीनी बहाली: वैश्विक बिरादरी को उन तानाशाही और दमनकारी शासनों पर कड़ा आर्थिक और राजनयिक दबाव बनाना होगा जो अपने ही देश के नागरिकों, अल्पसंख्यकों और जनजातीय समूहों को प्रताड़ित करते हैं।

3. ‘ग्लोबल कॉम्पैक्ट ऑन रिफ्यूजियों’ का कड़ाई से पालन: वर्ष 2018 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत ‘ग्लोबल कॉम्पैक्ट ऑन रिफ्यूजियों’ के सिद्धांतों को धरातल पर उतारना होगा। इसके तहत अमीर और विकसित देशों को शरणार्थियों को बसाने की जिम्मेदारी का एक बड़ा हिस्सा उठाना चाहिए, ताकि विकासशील और गरीब मेजबान देशों पर आर्थिक बोझ को कम किया जा सके।

4. पर्यावरण कोष का सही इस्तेमाल: जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए पेरिस समझौते के तहत तय किए गए पर्यावरण फंड को उन विकासशील देशों तक पहुंचाना होगा जो इसके सबसे बड़े शिकार बन रहे हैं, ताकि वे अपनी बुनियादी संरचना को मजबूत कर सकें और पलायन को रोका जा सके।

मानवता, सहानुभूति और समावेशन का अंतिम संदेश

आखिरकार, विश्व शरणार्थी दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि राष्ट्रीयताएं, पासपोर्ट और वीजा के कड़े नियम इंसानों ने ही बनाए हैं, लेकिन कुदरत ने हम सबको एक समान बनाया है। किसी भी व्यक्ति का शरणार्थी होना उसकी अपनी पसंद नहीं, बल्कि उसकी मजबूरी और नियति का क्रूर खेल होता है।

हर शरणार्थी की आंखों के पीछे एक बिखरा हुआ परिवार, एक अधूरा छूटा हुआ सपना, और अपने बच्चों के लिए एक बेहतर व सुरक्षित भविष्य की तड़पती हुई आकांक्षा होती है। आज जब दुनिया के कई हिस्सों में नफरत, संकीर्ण राष्ट्रवाद और दीवारें खड़ी करने की राजनीति हावी हो रही है, तब शरणार्थियों के प्रति सहानुभूति, करुणा और समावेशन की भावना को मजबूत करना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साझा, ईमानदार और मानवीय प्रयास ही यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि इस धरती पर विस्थापित हो चुके करोड़ों लोगों को फिर से एक छत, एक नाम, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का अधिकार मिल सके। मानवता की असली परीक्षा इस बात में नहीं है कि हम कितने शक्तिशाली हैं, बल्कि इस बात में है कि हम अपने सबसे कमजोर और असहाय इंसानों के आंसू पोंछने के लिए कितने तत्पर हैं।

Basant Kumar

kumarbasantjha87@gmail.com

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