नई दिल्ली। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में हुई ताजा बगावत और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी के सांसदों के पाला बदलने के बाद अब उत्तर प्रदेश की सियासत में भी हलचल तेज हो गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बयानों ने राज्य में एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। दोनों ही नेताओं का दावा है कि समाजवादी पार्टी के कई सांसद और बड़े नेता जल्द ही पार्टी छोड़ सकते हैं।
इन दावों के बाद राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल तैरने लगा है कि क्या उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के भीतर वैसी ही बड़ी टूट संभव है, जैसी महाराष्ट्र या पश्चिम बंगाल के विपक्षी खेमों में देखने को मिली है? हालांकि, अगर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों, क्षेत्रीय समीकरणों और संसदीय ‘नंबर गेम’ (संसदीय गणित) का बारीकी से अध्ययन किया जाए, तो समाजवादी पार्टी के लोकसभा सांसदों में इस तरह की किसी बड़ी बगावत की संभावना बेहद कठिन नजर आती है।
राजभर और केशव मौर्य का दावा
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बुधवार को एक सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि बहुत जल्द समाजवादी पार्टी में भी बड़ी टूट होने जा रही है। राजभर के मुताबिक सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने उन सांसदों के नामों का ब्योरा दिया है जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होना चाहते हैं।
इसके बाद गुरुवार को राजभर ने अपने दावों को और हवा देते हुए कहा कि सपा के बागियों का नेतृत्व ‘बागी बलिया’ का लाल करेगा। राजनीतिक हल्कों में राजभर के इस बयान को सीधे तौर पर बलिया से सपा सांसद सनातन पांडेय की ओर इशारे के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, राजभर के इन दावों की हवा खुद समाजवादी पार्टी के सांसदों ने खारिज करते हुए निकाल दी है।
इन 3 वजहों से मुश्किल है सपा में टूट-
दलबदल कानून और सांसदों की संख्या
संसदीय नियमों के मुताबिक, किसी भी पार्टी के सांसदों को बिना अपनी सदस्यता गंवाए (दलबदल कानून से बचते हुए) एक नया गुट बनाने या किसी अन्य दल में विलय करने के लिए कुल सांसदों के दो-तिहाई (2/3) संख्या बल की आवश्यकता होती है। समाजवादी पार्टी के पास वर्तमान में लोकसभा में एक मजबूत संख्या बल है। ऐसे में दो-तिहाई सांसदों को एक साथ तोड़ना और उन्हें किसी दूसरी राह पर ले जाना वैधानिक रूप से बेहद जटिल है।
वैचारिक और क्षेत्रीय ढांचा
शिवसेना या टीएमसी की तुलना में समाजवादी पार्टी का संगठनात्मक ढांचा और वोट बैंक काफी अलग है। सपा का मुख्य आधार पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और विशेषकर यादव-मुस्लिम समीकरणों पर टिका है। उत्तर प्रदेश की जमीन पर सपा के टिकट पर जीतकर आए सांसदों के लिए अपने पारंपरिक और वफादार वोट बैंक को छोड़कर अचानक पाला बदलना आत्मघाती साबित हो सकता है, क्योंकि उनका जमीनी काडर अखिलेश यादव के नेतृत्व से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।
केंद्रीय नेतृत्व की मजबूत पकड़
मुलायम सिंह यादव के बाद अखिलेश यादव ने पार्टी के भीतर अपने नेतृत्व को पूरी तरह स्थापित कर लिया है। टिकट वितरण से लेकर सांगठनिक फैसलों तक पूरी कमान अखिलेश यादव के हाथों में केंद्रित है। पार्टी के भीतर फिलहाल ऐसा कोई समानांतर बड़ा चेहरा या असंतुष्ट गुट मौजूद नहीं है, जो पार्टी के भीतर इतनी बड़ी सेंधमारी कर सके।
सपा का रुख
समाजवादी पार्टी ने राजभर और भाजपा नेताओं के इन दावों को पूरी तरह से भ्रामक और मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने वाली ‘सस्ती राजनीति’ करार दिया है। सपा प्रवक्ताओं का कहना है कि पार्टी के सभी सांसद एकजुट हैं और उनके बीच किसी भी तरह के मतभेद की खबरें सिर्फ अफवाह मात्र हैं। फिलहाल, राजभर के बयानों ने यूपी की राजनीति का पारा जरूर चढ़ा दिया है, लेकिन धरातल के गणित और कानूनी पेचीदगियों को देखते हुए सपा में किसी ‘महाराष्ट्र जैसी स्क्रिप्ट’ का दोहराया जाना फिलहाल मुश्किल नजर आता है।



