अंतरराष्ट्रीय बाल कैंसर दिवस पर जानें बच्चों में कैंसर के 10 अहम संकेत

15 फरवरी को हर साल अंतरराष्ट्रीय बाल कैंसर दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य बच्चों में होने वाले कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाना और समय रहते पहचान व इलाज के महत्व को समझाना है।

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नयी दिल्ली: 15 फरवरी को हर साल अंतरराष्ट्रीय बाल कैंसर दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य बच्चों में होने वाले कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाना और समय रहते पहचान व इलाज के महत्व को समझाना है। आमतौर पर लोग कैंसर को बढ़ती उम्र से जोड़कर देखते हैं, लेकिन यह बीमारी बच्चों को भी प्रभावित कर सकती है। ऐसे में शुरुआती लक्षणों की पहचान और तुरंत उपचार बेहद जरूरी है, ताकि इलाज के बेहतर परिणाम मिल सकें और बच्चों की जीवन दर बढ़ सके।

भारत में हर साल 50,000 नए मामले

पुणे के सूर्या मदर एंड चाइल्ड सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के कंसल्टेंट पीडियाट्रिक हीमेटो-ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. संदीप बारटक्के के अनुसार, भारत में हर साल करीब 50,000 बच्चों में कैंसर का पता चलता है। इनमें सबसे आम ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) है, इसके बाद लिंफोमा और सीएनएस (सेंट्रल नर्वस सिस्टम) ट्यूमर आते हैं।

उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 70% बच्चे इलाज के बाद ठीक हो जाते हैं, जबकि पश्चिमी देशों में यह आंकड़ा करीब 90% तक है। इसका मुख्य कारण देर से पहचान और समय पर इलाज की कमी है।


बच्चों में कैंसर और बड़ों में कैंसर में क्या अंतर है?

बच्चों में होने वाला कैंसर जैविक और चिकित्सीय रूप से वयस्कों के कैंसर से अलग होता है। वयस्कों में कैंसर अक्सर लंबे समय तक धूम्रपान, मोटापा या प्रदूषण जैसे कारणों से होता है, जबकि बच्चों में कैंसर आमतौर पर बढ़ते ऊतकों — जैसे रक्त, लसीका तंत्र, मस्तिष्क, मांसपेशियों और हड्डियों — में विकसित होता है।

बच्चों में कैंसर अधिकतर जेनेटिक बदलावों के कारण होता है, न कि जीवनशैली से जुड़ी आदतों के कारण।


बच्चों में कैंसर के 10 संकेत जिन्हें नजरअंदाज न करें

माता-पिता को निम्नलिखित लक्षणों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:

  1. बार-बार बुखार आना जो लंबे समय तक ठीक न हो।
  2. असामान्य थकान या कमजोरी, बच्चा पहले की तरह सक्रिय न रहे।
  3. बार-बार नाक से खून आना या आसानी से चोट लगना और नीले निशान पड़ना।
  4. लगातार सिरदर्द या उल्टी, खासकर सुबह के समय।
  5. हड्डियों या जोड़ों में लगातार दर्द।
  6. गांठ या सूजन जो शरीर के किसी हिस्से में बनी रहे।
  7. अचानक वजन कम होना या भूख में कमी।
  8. आंखों में बदलाव, जैसे सफेद चमक दिखना या धुंधला दिखना।
  9. लंबे समय तक खांसी या सांस लेने में तकलीफ।
  10. लसीका ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स) में सूजन, जो कई हफ्तों तक बनी रहे।

समय पर जांच क्यों है जरूरी?

बच्चे अक्सर खेलते समय गिरते-पड़ते हैं या सामान्य संक्रमण से बीमार पड़ते हैं। लेकिन यदि कोई लक्षण लंबे समय तक बना रहे या बार-बार लौट आए, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें। शुरुआती जांच से बीमारी का पता जल्दी चल सकता है और उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है।

माता-पिता की सजगता और समय पर चिकित्सा सलाह बच्चों के जीवन को बचा सकती है।

Samiksha Mishra

samiksha.mishra1222@gmail.com

मैं कॉपीराइटर हूँ, जिसे कंटेंट के ज़रिए कहानियाँ गढ़ने और ब्रांड्स की आवाज को मजबूती देने का तीन वर्षों का पेशेवर अनुभव है। शब्दों की सटीकता, रचनात्मकता और पाठकों से जुड़ाव, यही मेरी लेखनी की पहचान है।

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