पेशावर/इस्लामाबाद: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा (KP) प्रांत के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने गाजा शांति समझौते को लेकर संघीय सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई वाले ‘गाजा बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) समझौते पर पाकिस्तान के हस्ताक्षर करने को अफरीदी ने “मुस्लिम उम्माह” (वैश्विक मुस्लिम समुदाय) के साथ बड़ा विश्वासघात करार दिया है।
“शहबाज और असीम मुनीर ने फलस्तीनियों का सौदा किया”
एक जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि अपनी राजनीतिक कुर्सी बचाने और निजी हितों को साधने के लिए इन नेताओं ने गाजा के निर्दोष लोगों के खून का सौदा कर लिया है। उन्होंने मांग की कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर देश की जनता को विश्वास में लिया जाना चाहिए था।
इमरान खान का बचाव और “जियोनिस्ट एजेंट” का पलटवार
अफरीदी ने जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि इमरान खान कभी भी फलस्तीन या कश्मीर के सम्मान के साथ समझौता नहीं करते। उन्होंने कहा:
“पिछले 26 सालों से इमरान खान को ‘जियोनिस्ट एजेंट’ (यहूदी एजेंट) कहा जाता रहा, लेकिन आज दुनिया ने देख लिया कि असली एजेंट कौन है। शहबाज शरीफ और असीम मुनीर ने ट्रंप के समझौते पर दस्तखत करके साबित कर दिया कि वे किसके इशारों पर काम कर रहे हैं।”
‘सड़क आंदोलन’ की चेतावनी
पीटीआई (PTI) के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार ने अब सीधे तौर पर इस्लामाबाद को चुनौती दी है। मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी कि अगर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को तुरंत रिहा नहीं किया गया और इस तरह के एकतरफा फैसले बंद नहीं हुए, तो जनता सड़कों पर उतरने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि इमरान खान ने उन्हें पहले ही ‘स्ट्रीट मूवमेंट’ (सड़क आंदोलन) शुरू करने का निर्देश दे दिया है और वे पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं।
समझौते पर पाकिस्तान में क्यों है बवाल?
दरअसल, स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (WEF) के दौरान पाकिस्तान ने ट्रंप के नेतृत्व वाले उस ‘शांति बोर्ड’ का समर्थन किया है, जिसका उद्देश्य गाजा में युद्ध के बाद की व्यवस्था को संभालना है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस बोर्ड के जरिए अमेरिका और उसके सहयोगी क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं, जो फलस्तीन की संप्रभुता के खिलाफ है।



