नई दिल्ली। केंद्र सरकार का क्विक कॉमर्स कंपनियों को 10 मिनट डिलीवरी के वादे से दूर रहने का निर्देश देना और कंपनियों का उस पर सहमत होना एक सराहनीय और समयबद्ध कदम है। 13 जनवरी को श्रम मंत्री मनसुख मांडविया के हस्तक्षेप के बाद ब्लिंकिट जैसी प्रमुख कंपनियों ने तुरंत अपने ऐप और विज्ञापनों से यह दावा हटा लिया, जबकि अन्य प्लेटफॉर्म भी ऐसा करने की तैयारी में हैं। यह फैसला गिग वर्कर्स की सुरक्षा और कार्य-जीवन संतुलन को प्राथमिकता देने का प्रतीक है, जो देश की तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों के लिए राहत की बात है। क्विक कॉमर्स का मॉडल पिछले कुछ वर्षों में चमत्कारिक रूप से उभरा है। ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट जैसी कंपनियां ‘डार्क स्टोर्स’ के जरिए महज तीन किलोमीटर के दायरे में सामान पहुंचाने का दावा करती थीं, लेकिन भारतीय सड़कों की वास्तविकता इससे कोसों दूर है। ट्रैफिक जाम, सुरक्षा गार्डों की पूछताछ, बहुमंजिला इमारतों में लिफ्ट का इंतजार और प्रतिकूल मौसम। ये सब मिलकर डिलीवरी को 10 मिनट में पूरा करना लगभग असंभव बनाते हैं। कंपनियां आपसी प्रतिस्पर्धा में इस ‘जल्दबाजी’ को ब्रांडिंग का हिस्सा बना चुकी थीं, जिससे डिलीवरी पार्टनर्स पर लगातार दबाव बढ़ता गया। तेज रफ्तार में सड़क दुर्घटनाओं का खतरा, शारीरिक थकान और मानसिक तनाव ये सभी मुद्दे गिग वर्कर्स के लिए जीवन मरण का सवाल बन गए थे। दिसंबर 2025 में क्रिसमस और न्यू ईयर ईव पर देशभर में दो लाख से अधिक गिग वर्कर्स ने हड़ताल की, जिसमें 10 मिनट डिलीवरी मॉडल को खत्म करने की मांग प्रमुख थी।
इस हड़ताल ने सरकार और समाज का ध्यान आकर्षित किया। संसद में आप सांसद राघव चड्ढा जैसे नेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाया। सरकार का यह फैसला हड़ताल की सफलता और श्रमिकों की आवाज का परिणाम है। इससे न केवल डिलीवरी वर्कर्स को तत्काल राहत मिलेगी, बल्कि यह संकेत भी देता है कि विकास की रफ्तार मानवीय मूल्यों से ऊपर नहीं हो सकती। हालांकि, यह कदम केवल शुरुआत है। 10 मिनट के वादे हटने से दबाव थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन गिग वर्कर्स की मूल समस्याएं कम पारिश्रमिक, लंबी कार्य अवधि, कोई निश्चित न्यूनतम वेतन, दुर्घटना बीमा की कमी और सामाजिक सुरक्षा का अभाव बनी हुई हैं। कई वर्कर्स कुछ महीनों बाद ही काम छोड़ देते हैं, क्योंकि ‘जितना काम, उतना पैसा’ का मॉडल उन्हें आर्थिक रूप से अस्थिर रखता है। कंपनियां लाखों-करोड़ों का मुनाफा कमा रही हैं, लेकिन वर्कर्स को उचित हिस्सा नहीं मिल पाता।सौभाग्य से, नवंबर 2025 से प्रभावी हुए नए श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) ने गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को पहली बार कानूनी मान्यता दी है। कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020 के तहत असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा कवरेज मिलने का प्रावधान है, जिसमें स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ, भविष्य निधि और जीवन बीमा शामिल हैं। एग्रीगेटर्स को अपने टर्नओवर का 1-2 प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान देना होगा। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसका प्रभावी क्रियान्वयन ही असली परीक्षा होगी।सरकार को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि ये प्रावधान कागजी नहीं रहें। ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन, यूनिवर्सल अकाउंट नंबर और डिजिटल ट्रैकिंग जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना जरूरी है। साथ ही, न्यूनतम प्रति किलोमीटर दर, मासिक न्यूनतम आय (जैसे 40,000 रुपये की मांग), दुर्घटना पर मुआवजा और कार्यस्थल सुरक्षा के मानक तय करने की जरूरत है। कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी—उनका कारोबार इन श्रमिकों के बिना संभव नहीं। मुनाफे का एक हिस्सा वर्कर्स की भलाई में लगाना उनका नैतिक दायित्व है।असंगठित क्षेत्र के सभी कामगारों—चाहे वे निजी सुरक्षा गार्ड हों, घरेलू कामगार हों या डिलीवरी पार्टनर्स—को सामाजिक सुरक्षा, समय पर भुगतान और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों का अधिकार है। पिछले कानूनों में कई नियम कागजों तक सीमित रहे, लेकिन अब बदलाव का समय है। सरकार, कंपनियां और समाज मिलकर काम करें, तो ‘श्रमेव जयते’ का नारा सार्थक होगा। यह न केवल गिग वर्कर्स की जीत है, बल्कि भारत की समावेशी विकास यात्रा की मजबूती भी।



