उज्बेकिस्तान का जलवायु तूफान: तीन गुना तेज गर्मी, सूखे की मार से पानी-खेती पर खतरा

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट उज्बेकिस्तान का पर्यावरणीय बदलाव एटलस ने इस हकीकत को बेनकाब किया

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नई दिल्ली: कल्पना कीजिए, एक ऐसा देश जहां गर्मी इतनी बेरहम हो गई हो कि वैश्विक औसत से तीन गुना तेज रफ्तार से तापमान चढ़ रहा हो। उज्बेकिस्तान में यही हो रहा है कि पिछले 60 सालों में यहां का औसत तापमान 1.6 डिग्री सेल्सियस ऊपर कूद चुका है, और ये सिर्फ नंबर्स नहीं, बल्कि सूखे की चपेट में फंसी फसलें, सिकुड़ते जल स्रोत और बर्बाद होते खेत हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट ‘उज्बेकिस्तान का पर्यावरणीय बदलाव एटलस’ ने इस हकीकत को बेनकाब किया है। खासकर अरल सागर के आसपास ये बढ़ोतरी 1.8 से 2.5 डिग्री तक पहुंच गई है, जो आने वाले दशकों में भयानक बाढ़-सूखे का अलार्म बजा रही है। गूगल ट्रेंड्स पर ‘Uzbekistan Heatwave Crisis’ सर्च 400% उछल चुका है कि मिडिल ईस्ट से एशिया तक लोग ये पूछ रहे हैं, क्या ये हमारा भविष्य है?

सूखे का कहर: बारिश गायब, ग्लेशियर खतरे में

उज्बेकिस्तान के मैदानी इलाकों में बारिश तो जैसे भूल ही गई हो सालाना औसत महज कुछ इंच। नतीजा? ये देश दुनिया के टॉप 20 सबसे सूखाग्रस्त इलाकों में शुमार है। रिपोर्ट चेताती है कि क्लाइमेट चेंज इस जल युद्ध को और भयावह बना देगा। 2050 तक ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना बांधों को खाली कर देगा, और गर्म-सूखे मौसम में नदियों का बहाव 25-50% तक लुढ़क सकता है। सिंचाई पर निर्भर कृषि अर्थव्यवस्था के लिए ये विनाशकारी होगा खेत सूखेंगे, किसान बेरोजगार। लेकिन उम्मीद की किरण भी है: लोकल गवर्नेंस को मजबूत करना, पड़ोसी देशों से पानी शेयरिंग बढ़ाना और स्मार्ट वाटर मैनेजमेंट से ये संकट टाला जा सकता है। UNEP यूरोप के डायरेक्टर आर्नोल्ड क्रेइलहुबर ने कहा, “उज्बेकिस्तान गर्मी, सूखे और जमीन के खराब होने की चपेट में है ये वैश्विक चेतावनी है।

चरागाहों का संकट: 60% इलाकों में घास का टोटा

देश के विस्तार वाले चरागाह अब बंजर पड़ रहे हैं। 60 फीसदी क्षेत्रों में घास-फूस की पैदावार 20-30% तक गिर चुकी है। इससे पशुपालन प्रभावित हो रहा है, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही। एटलस की सलाह साफ है। सस्टेनेबल ग्रेजिंग यानी घुमंतू चराई के बजाय रोटेशनल सिस्टम अपनाएं, जहां जमीन को रिकवर होने का मौका मिले। ओवरग्रेजिंग रोकने के लिए कम्युनिटी-लेड प्रोग्राम्स चलाएं, ताकि ये हरी चादरें फिर से लौटें।

हरियाली की जंग: सूखे में भी पेड़ों का जादू

सूखे के बीच भी उज्बेकिस्तान ने कमाल कर दिखाया। वन कवर पिछले दशकों में 20% से ज्यादा फैल चुका है। 2021 में लॉन्च ‘यशिल मकॉन’ (ग्रीन लिविंग) मिशन के तहत एक अरब पेड़ लगाने का टारगेट सेट किया गया, जिससे शहरों में ग्रीनरी 7.6% से कूदकर 30% हो जाएगी। ये न सिर्फ कार्बन सोखेगा, बल्कि जैव विविधता बढ़ाएगा और क्लाइमेट रेजिलिएंस देगा। रिपोर्ट बताती है कि प्राकृतिक आपदाओं बाढ़, भूकंप, सूखे से सालाना 92 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है, जो GDP का 0.2% है। और हां, भूकंप के खतरे में उज्बेकिस्तान ग्लोबल नंबर टू है, लेकिन मजबूत साइंस सेटअप से रिस्क असेसमेंट हो रहा है।

आगे का रास्ता: एकजुट होकर लड़ें, वरना सब हारेंगे

ये रिपोर्ट चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है कि उज्बेकिस्तान को जलवायु योद्धा बनना होगा। पानी बचाओ, खेती को क्लाइमेट-स्मार्ट बनाओ, और इंटरनेशनल पार्टनरशिप्स को मजबूत करो। वरना, अगले 20-30 सालों में पानी की लड़ाई, फसल फेलियर और लाइवलीहुड क्राइसिस सबका साया मंडराएगा। ग्लोबल साउथ के लिए ये केस स्टडी है। भारत से तुर्की तक, सबको सबक। #UzbekistanClimateAlert हैशटैग पर X और इंस्टा पर बहस गरम है; लोग शेयर कर रहे हैं अपनी ग्रीन स्टोरीज। आप क्या सोचते हैं? लोकल लेवल पर क्या कदम उठा सकते हैं? कमेंट्स में बताएं और इस स्टोरी को फॉरवर्ड करें जागरूकता ही हथियार है।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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