नई दिल्ली: वाराणसी में 2 दिसंबर 2025 से काशी तमिल संगमम 4.0 की शुरुआत होने जा रही है। यह संगमम एक ऐसे रिश्ते का जश्न है जो सदियों से भारतीय कल्पना में बसा हुआ है। दो प्रान्तों के पुराने रिश्तों को नए ओज के साथ आगे बढ़ाने के लिए यह सम्मलेन मनाया जाएगा। इस बार संगमम की थीम है- “लेट्स लर्न तमिल- तमिल करकलम” यानी तमिल भाषा सीखना और भाषाई एकता को बढ़ावा देना।
तमिल प्रतिनिधि आयेंगे बनारस
संगमम का मुख्य उद्देश्य उत्तर और दक्षिण भारत के बीच भाषा, संस्कृति, विरासत और परंपराओं का आदान-प्रदान बढ़ाना है। शिक्षा मंत्रालय के नेतृत्व में चल रहे इस कार्यक्रम में IIT मद्रास, BHU, कई केंद्रीय मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार मिलकर हिस्सा ले रहे हैं। इस बार तमिलनाडु से 1,400 से ज्यादा प्रतिनिधि वाराणसी पहुंचेंगे, जिनमें छात्र, शिक्षक, कारीगर, महिलाएं, लेखक, मीडिया प्रोफेशनल्स और आध्यात्मिक विद्वान शामिल हैं।
तीन पहलों से बढ़ेगा समन्वय
इस वर्ष के आयोजन की तीन मुख्य पहलें हैं। पहली पहल है तमिल करकलम, जिसके तहत वाराणसी के स्कूलों में तमिल भाषा की पढ़ाई शुरू की जाएगी। इसके लिए 50 प्रशिक्षित तमिल शिक्षक तैनात किए जाएंगे, जो 1,500 छात्रों को बेसिक स्पोकन तमिल सिखाएंगे। इससे उत्तर भारत के छात्रों को तमिल भाषा और संस्कृति को समझने का नया अवसर मिलेगा।
दूसरी बड़ी पहल है तमिल कारपोम, यानी उत्तर प्रदेश के 300 कॉलेज छात्रों के लिए तमिलनाडु का स्टडी टूर। 10 बैचों में छात्र तमिलनाडु के प्रमुख विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक स्थलों का दौरा करेंगे। CICT चेन्नई से ओरिएंटेशन के बाद छात्र IIT मद्रास, पॉन्डिचेरी यूनिवर्सिटी, शास्त्र यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थानों में भाषा व संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। इससे छात्रों को तमिलनाडु की विरासत को करीब से समझने का मौका मिलेगा।
तीसरी पहल है ऋषि अगस्त्य वाहन अभियान (SAVE), जो 2 दिसंबर को तेनकासी से शुरू होकर 10 दिसंबर को काशी पहुंचेगा। यह यात्रा उन सभ्यतागत मार्गों को दर्शाती है जो ऋषि अगस्त्य से जुड़े हुए हैं और जिनके माध्यम से तमिलनाडु ने भारतीय ज्ञान परंपराओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह अभियान चेर, चोल, पांड्या, पल्लव और विजयनगर साम्राज्यों की सांस्कृतिक विरासत को भी आगे बढ़ाता है।

2022 से हुई काशी तमिल संगमम की शुरुआत
काशी तमिल संगमम की शुरुआत 2022 में हुई थी। पहले संस्करण (KTS 1.0) में 2,500 प्रतिनिधि शामिल हुए थे और वाराणसी, प्रयागराज व अयोध्या में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए थे। दूसरे संस्करण (KTS 2.0) में 1,435 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और प्रधानमंत्री के भाषण का पहली बार लाइव तमिल अनुवाद किया गया। तीसरे संस्करण (KTS 3.0) की थीम ऋषि अगस्त्य रही, जिसमें महाकुंभ 2025 के दौरान काशी और प्रयागराज की यात्रा भी शामिल थी।
अब KTS 4.0 भाषा, शिक्षा और युवाओं की भागीदारी को केंद्र में रखकर एक नए रूप में सामने आ रहा है। इस साल का आयोजन रामेश्वरम में एक भव्य समापन समारोह के साथ खत्म होगा, जो उत्तर से दक्षिण तक सांस्कृतिक यात्रा के पूर्ण होने का प्रतीक माना जाएगा।
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काशी और तमिल संबंधों का इतिहास
एक प्रसिद्ध किंवदंती के अनुसार, राजा पराक्रम पांड्य ने काशी की यात्रा से लौटते समय भगवान की इच्छा से एक शिवलिंग स्थापित किया, जिसके कारण उस स्थान का नाम शिवकाशी पड़ा। पराक्रम पांड्य ने 15वीं शताब्दी में मदुरै क्षेत्र पर शासन किया और पांड्य राजाओं ने ही तेनकासी में काशी विश्वनाथर मंदिर बनवाया, जिसे दक्षिण भारत का “दक्षिण काशी” भी कहा जाता है। तमिलनाडु में काशी नाम से सैकड़ों शिव मंदिर मौजूद हैं, जो दोनों क्षेत्रों के धार्मिक संबंधों को और मजबूत करते हैं। बाद में, अधिवीर राम पांडियन ने 19वीं शताब्दी में तेनकासी में एक और शिव मंदिर का निर्माण कराया। तमिल संत कुमारा गुरुपारा ने भी काशी से प्रेरित होकर ‘काशी कलमबागम’ नामक व्याकरण-आधारित काव्य संग्रह की रचना भी की, जो काशी–कांची के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों का साहित्यिक प्रमाण माना जाता है।




